दुमका : मीड डे मील के नाम पर होती रही लूट - Live Aaryaavart

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मंगलवार, 24 अप्रैल 2018

दुमका : मीड डे मील के नाम पर होती रही लूट

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पढि़ये धोबाचापड़ से लौटकर अमरेन्द्र सुमन की रिपोर्ट  : दिवाकालीन  पहाडि़या कल्याण प्राथमिक विद्यालय, धोबाचापड़ के बच्चों को पता नहीं " मीड डे मील" क्या है  ?  आदिम जनजाति पहाड़िया  बच्ची  सोनामुनी कुमारी, पार्वती कुमारी, लखीन्द्र देहरी, बाबूराम देहरी, राजू देहरी, शिबू देहरी, जीतू देहरी, पवन देहरी, माला देहरी, पार्वती देहरी, रासमुनी देहरी को यह भी  पता नहीं कि मीड डे मील के तहत बच्चों को भोजन में क्या-क्या चीजें प्राप्त होती हैं। मीड डे मील की किस व्यवस्था के तहत लागू है ? प्रतिदिन बच्चों को यह मिलनी चाहिए या फिर सप्ताह अथवा महीनें में एक मर्तबा ? विद्यालय में पढ़ने वाले बच्चों के अनुसार प्रभारी शिक्षक मुनमुन माल्टो ने अपने कार्यकाल में मीड डे मील के निमित्त चूल्हा तक जलने नहीं दिया। बच्चों ने विद्यालय के रसोई में कभी धुआँ तक उठते हुए नहीं देखा।  किसी को कुछ भी पता नहीं कि विद्यालय में बच्चों के लिये क्या-क्या सरकारी सुविधाएँ प्राप्त है ? क्षत-विक्षत दीवारों के बीच गाँव का ही इन्टर पास विद्यार्थी देवेन्द्र देहरी बच्चों में जला रहा शिक्षा का अलख। वह चाहता है आदिम जनजाति पहाडि़या समाज के बच्चे समाज की मुख्यधारा से जुड़ें। साढ़े तीन-चार लाख रुपये वेतन सहित मीड डे मील के नाम पर तकरीबन तीन लाख रुपये विद्यालय के प्रभारी शिक्षक मुनमुन माल्टो ने गड़क लिये। आसनसोल (पश्चिम बंगाल) में प्रभारी शिक्षक मुनमुन माल्टो ने बना रखा है अपना आशियाना। जाँच के दायरे में आने के डर से शिक्षक माल्टो ने विशिष्ट पदाधिकारी, पहाडि़या कल्याण, दुमका को मोटी रकम अदा कर  शिकारीपाड़ा प्रखण्ड अन्तर्गत पहाडि़या विद्यालय इन्दरबनी में करवा रखा है अपना स्थानान्तरण करवा लिया। बीडीओ गोपीकान्दर ने विद्यालय की सघन जाँच की बात कही। उन्होनें कहा डीसी दुमका से की जाऐगी शिक्षक के विरुद्ध शिकायत। दोषी पर होगी कार्रवाई। सीपीएम नेता एहतेशाम अहमद ने सरकारी व्यवस्था पर उठाया सवाल। कहा दुर्गम पहाडि़यों के बीचोंबीच बसे आदिम जनजाति पहाडि़या, घटवाल व संताल गाँवों में विकास की किरणें आज भी हैं कोसो दूर। 
                 
जिले के तमाम विद्यालयों में मीड डे मील देने की सरकारी व्यवस्था के बाद भी बच्चों को इससे दूर रखना कितना  न्यायसंगत है, भले ही अवाम को इसकी पूरी जानकारी हो किन्तु शिक्षको को इस बात का कोई इल्म नहीं ? आदिम जनजाति पहाडि़या, घटवाल व संताल बहुल गाँव के बच्चों के निवाले जो शिक्षक खुद ही गड़क जाते हों, ऐसे शिक्षकों की सजा क्या होनी चाहिए ? चारों ओर पहाड़ से घिरे आदिम जनजाति बाहुल्य गाँव धोबाचापड़ की कहानी सरकारी व्यवस्था पर कई सवाल छोड़ जाती है। जो गाँव मुख्य सड़क के संपर्क से मीलों दूर हो, उस गाँव के विद्यालय की शिक्षा व्यवस्था क्या होगी सहर्ष ही समझा जा सकता है। जीवन जीने की तमाम संघर्ष भरी संभावनाओं के बीच भी जब अपने ही समाज के बीच के व्यक्ति से लोग छले जाते हों, तो फिर किसपर किया जाऐगा विश्वास ? यह अन्याय नही ंतो और क्या कहा जाऐगा ? जिले के गोपीकान्दर प्रखण्ड अन्तर्गत गाँव धोबाचापड़ (पंचायत ओड़मो) के दिवाकालीन पहाडि़या उत्क्रमित प्राथमिक विद्यालय के छात्रों की दर्द भरी कहानी सुनकर कोई भी पसीज सकता है ? उप राजधानी दुमका से तकरीबन 50 किमी (दुमका-पाकुड़ मार्ग) की दूरी पर गोपीकान्दर प्रखण्ड के धोबाचापड़ गाँव (पंचायत ओड़मो) में पदस्थापित शिक्षक मुनमुन माल्टो ने पूर्णिमा के चाँद की तरह अपने पूरे कार्यकाल में विद्यालय में उपस्थित दर्शायी। इस शिक्षक ने न तो विद्यालय के बच्चों में शिक्षा का कभी अलख जगाया और न ही फटेहाल जिन्दगी जी रहे बच्चों को मीड डे मील का एक भी निवाला हजम करने दिया।  प्रतिमाह 35-40 हजार रुपये वतौर वेतन प्राप्त करते रहने के बाद भी  विद्यालय के सर्वांगिण विकास व आधारभूत संरचनाओं के नाम पर प्रतिवर्ष प्राप्त होने वाली राशियों का दुरुपयोग पूरी निष्ठा से वे करते रहे। सीपीएम नेता एहतेशाम अहमद के अनुसार पिछले ढाई वर्षों के दौरान साढ़े तीन से चार लाख रुपये बैठे-बैठे उन्होनें प्राप्त कर लिये। शिक्षक मुनमुन माल्टो के विरुद्ध ग्रामवासियों का आक्रोश परवान पर है। ढाई वर्ष के अपने कार्यकाल में विद्यालय के प्रभारी श्री माल्टो ने बच्चों को एक भी दिन मीड डे मील से परिचय नहीं कराया। शिक्षक खुशी-खुशी इस बात को स्वीकारता भी है और यह भी कहता हैं कि प्रतिमाह 12 से 15 हजार रुपये मीड डे मील के नाम पर राशि की निकासी वे करते रहे। श्री माल्टो को इस बात का कोई अफसोस नहीं कि ढाई वर्षों तक विरादरी के बच्चों के निवाले वे छिनते रहे। वे कहते हैं अकेले एकमात्र वे ऐसा करने वाले नहीं हैं। धोबाचापड़ ग्रामवासी लक्ष्मण देहरी, मंगला देहरी, बुधन देहरी, सुखदेव देहरी, मंजू देहरी, खुदिया मराण्डी, सहदेव राय, पिंटू राय, के अनुसार उनके बच्चे पढ़-लिखकर कुछ बनना चाहते हैं। ग्रामीणों की वैसी कोई आमद नहीं की पहाड़ से निकलकर समतल भूमि पर वशोवाश कर वे अपना जीवनस्तर सुधार सकें, वे कहते हैं, बच्चों के शिक्षा के लिये जो भी सरकारी व्यवस्था है उसका लाभ भी उनके बच्चों को प्राप्त नहीं होता। सारी व्यवस्था का लाभ शिक्षक उठा ले जाते हैं, जिनकी प्रतिनियुक्ति इस विद्यालय में होती रही है। ढाई वर्षों के कार्यकाल में विद्यालय के प्रभारी शिक्षक मुनमुन माल्टो ने यदा-कदा ही अपना दर्शन गाँव में दिया होाग। गरीब, अनपढ़, गंवार होने की वजह से ग्रामवासियों को यह भी पता नहीं होता कि शिक्षकों की जबावदेही क्या है ? शिक्षा के नाम पर जिस गाँव के विद्यालय में शिक्षकों की गाहे-बगाहे ही उपस्थिति हो ? विद्यालय में कुर्सी-टेबुल तक उपलब्ध न हो, उस विद्यालय में बच्चोें को शिक्षा कैसे दी जा सकती है ? पहाडि़या कल्याण के नाम पर विद्यालयों में जिस तरह की सुविधा होनी चाहिए, शिक्षकों द्वारा उसे गड़क लिया जाना एक बड़े अपराध से कम नही है। दुर्गम पहाडि़यों के बीच बसे ऐसे गाँव के बच्चे क्या मुख्य धारा से कभी जुड़ पाऐगें ? उप राजधानी दुमका के गोपीकान्दर प्रखण्ड में विकास कार्यों की क्या स्थिति है, इस बात की जानकारी प्रखण्ड के विभिन्न पंचायतों के पहाडि़या, घटवाल, संताल व अन्य वंचित तबकों के ग्रामों के भ्रमण से प्राप्त किया जा सकता है। पहाड़ी क्षेत्र होने की वजह से उपरोक्त ग्रामों में न तो पीने के पानी की कोई व्यवस्था है और न ही शिक्षा, सिचाई, सड़क की ही व्यवस्था मौजूद है। वर्ष 2000 में बिहार से अलग हुए झारखण्ड के 15 वर्ष बीत गए। इन पन्द्रह वर्षों के कालखंड में राज्य के नेताओं व ब्यूरोक्रेट्स ने विकास के नाम पर इस राज्य को पूरा लूटा। इस विद्यालय में पढ़ने वाले बच्चे तो काफी हैं किन्तु पढ़ाने वाला यह कहकर अपना पल्ला झाड़ता रहा कि स्कूल काफी अंदर है जहाँ प्रतिदिन पहुँचना टेढ़ी खीर है जबकि जो शिक्षक हैं वे भी ऐसे ही पहाड़ों से आच्छादित गाँव से आते हैं। आदिम जनजाति पहाडि़या समुदाय का शिक्षक ही शोषण करता रहा अपनी बिरादरी का। झारखण्ड शिक्षा परियोजना के तत्वावधान में इन दिनों स्कूल चलें कार्यक्रम चलाया जा रहा है किन्तु कई ऐसे प्रखण्ड हैं जहाँ के जंगल-पहाड़ों के बीच बसे गाँवों में इसका कोई असर नहीं देखा जा रहा। ड्राॅपआउट बच्चों को स्कूल से जोड़ने की कवायद शहरी क्षेत्रों मे भले ही दिखती हो किन्तु सुदूर देहात में ऐसा कोई कार्यक्रम देखने को नहीं मिलता। सीपीएम नेता एहतेशाम अहमद का मानना है सरकारी व्यवस्था और व्यवस्थापक जबतक सुदूरवर्ती गाँवों में खुद भ्रमण नहीं करेगें, वैसे गाँवों का विकास मात्र कल्पना ही साबित होगा। पहाडि़या नेता देवेन्द्र देहरी सरकार की वर्तमान व्यवस्था पर सवालिया निशान खड़ा करते हुए कहते है- पहाडि़या कल्याण के नाम पर प्रतिवर्ष विशिष्ट पदाधिकारी पहाडि़या कल्याण को भारी राशि का आवंटन प्राप्त होता है किन्तु तमाम राशियाँ आॅफिस में ही संचिकाओं की पूर्णाहुति के बाद समाप्त कर दी जाती है। पहाड़ों पर बसने वाले कोरी कल्पना के साथ ही अपना जीवन गुजार लेते हैं। पहाडि़या नेता देवेन्द्र देहरी के अनुसार धोबाचापड़ में विद्यालय का जर्जर भवन अपने अस्तित्व की कहानी तो बयां करता है किन्तु जिस विद्यालय में खिड़की-किवाड़ी तक मयस्सर न हो, टेबुल-कुर्सी और विद्यार्थियों के बैठने के लिये बैंच तक की व्यवस्था न हो उस विद्यालय में पढ़ाई की क्वालिटी क्या होगी किसी से छुपा नहीं है। जिन शिक्षकों को देश के नौनीहालों को संवारने की जिम्मेवारी सौंपी जाती है वे अपनी रोटी सेंक रहे हैं। उन्हें क्या मतलब बच्चे पढ़े या नहीं ? उप राजधानी दुमका के नये डीसी मुकेश कुमार  से इन गाँववासियों को काफी उम्मीदें हैं। पूरी इमानदारी से वर्तमान डीसी ने जिले की विधि-व्यवस्था पर अपनी पैनी नजर रखी है। भ्रष्टाचारियों पर काफी कुछ अंकुश लगा है। शोषकों के विरुद्ध आवाजें उठने लगी हैं। चाहे पदाधिकारी हो या फिर कर्मचारी। हर सरकारी कर्मी में इस बात का भय तो अवश्य बना हुआ है कि उनके विरुद्ध शिकायतों का परिणाम उन्हें अवश्य भुगतना होगा तथापि कुछ ढीठ किस्म के लोग अपने भ्रष्ट आचरण से बाज नहीं आ रहे। 
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