मार्क्स के विचार अर्थव्यवस्था केे किसी भी रूप के लिए प्रासंगिक : मेघनाद - Live Aaryaavart

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शनिवार, 16 जून 2018

मार्क्स के विचार अर्थव्यवस्था केे किसी भी रूप के लिए प्रासंगिक : मेघनाद

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पटना 16 जून, लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स एमेरिटस प्रोफेसर लॉर्ड मेघनाद देसाई ने आज कहा कि क्रांतिकारी विचारक कार्ल मार्क्स के विचार अर्थव्यवस्था के किसी भी रूप के लिए प्रासंगिक है। लॉर्ड देसाई ने यहां एशियाई विकास शोध संस्थान (आद्री) की ओर से ‘कार्ल मार्क्स-जीवन, विचार, प्रभाव: द्विशतवार्षिकी पर एक आलोचनात्मक परीक्षण’ विषय पर आयोजित पांच-दिवसीय अंतराष्ट्रीय सम्मेलन के पहले दिन अपने व्याख्यान में कहा कि पूंजी का संग्रहण हमेशा स्वामियों के हाथ में होता है, जो मजदूर वर्ग के साथ टकराव की स्थिति को उत्पन्न करता है। उन्होंने कहा कि ऐसी परिस्थिति में एक बहुत बड़े वर्ग की बुनियादी जरूरते पूरी नहीं की जा रही हैं। ऐसे में मार्क्स के विचार अर्थव्यवस्था के किसी भी रूप के लिए प्रासंगिक हैं। प्रो. देसाई ने कहा कि मार्क्स मानते थे कि सभी भगवान लोगों की कल्पना के उपज हैं लेकिन उन्हीं लोगों ने उन्हें शासन करने की भी अनुमति दे दी। उन्होंने कहा कि पहले यूरोप में रहने वाले मजूदरों की हालत दास जैसी थी और उस समय वह गवर्नेंस की बात कह भी नहीं सकते थे। उनके पास धन नहीं होने के कारण उन्हें वोट देने का भी अधिकार नहीं था। उन्होंने कहा कि पिछले 25 साल में अर्थव्यवस्था की धूरी दुनिया का पूर्वी क्षेत्र बनता जा रहा है लेकिन यह अधिक दिनों तक नहीं रहेगा क्योंंकि इसकी प्रकृति गतिशील है।

लॉर्ड देसाई ने कहा कि मार्क्स मानते थे कि मानवीय संबंधों में तकनीकी एवं गुणात्मक बदलाव आते हैं। इससे एक नये शासक वर्ग का जन्म होता है। उन्होंने कहा कि पूंजी निर्माण में पूंजीपतियों की कोई भूमिका नहीं होती और जो मुनाफा वह कमाते हैं, वह उसके योग्य नहीं हैं। उन्होंने कहा कि संसाधन सीमित हैं और संसाधनों के आदान-प्रदान से उनका मूल्य निर्धारित होता है। जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के अवकाश प्राप्त प्रोफेसर एवं दिल्ली विश्वविद्यालय के कुलपति दीपक नैयर ने कहा कि वैश्वीकरण बहुआयामी परिघटना थी, जो वस्तुओं और सेवाओं तथा पूंजी के प्रवाह तक ही सीमित नहीं था बल्कि इसका विस्तार विचारों, प्रौद्योगिकी और सूचनाओं के आदान-प्रदान तक भी रहा है। उन्होंने कहा कि ऐतिहासिक रूप से वैश्वीकरण एक भंगुर प्रक्रिया रही है जिसमें समय-समय पर उतार-चढ़ाव आते रहे हैं। श्री नैयर ने कहा कि वैश्वीकरण के लिए ऐसे वर्चस्व की जरूरत होती है, जो विश्व व्यवस्था की सुरक्षा और स्थिरता सुनिश्चित कर सके। अभी यह भूमिका संयुक्त राज्य अमेरिका द्वारा निभाई जा रही है। उन्होंने कहा कि वर्ष 2008 की आर्थिक मंदी के दौरान वैश्वीकरण को यूरोपीय देशों के साथ-साथ अमेरिका में भी बड़ा धक्का लगा है, जहां डोनाल्ड ट्रंप का उभार दिखा है। उन्होंने कहा कि विकसित देशों में बेरोजगारी की ऊंची दर देखी गई है जबकि सर्वाधिक धनी और धनी होते गये हैं। इस दौरान असमानता काफी तेजी से बढ़ने का परिणाम राष्ट्रवाद का उभार है। यूरोपीय संघ में बने रहने या नहीं रहने के लिए ब्रिटेन में कराया गया जनमत संग्रह इसका ज्वलंत उदाहरण है।

प्रसिद्ध समाजवादी दीपंकर गुप्ता ने कहा कि मार्क्स ने कभी भी हिंसा का समर्थन नहीं किया लेकिन वह दुनिया के मजदूरों की विजय अवश्य चाहते थे। वह साम्यवादी घोषणापत्राें में न तो साम्यवादियों द्वारा राजनीतिक दलों के निर्माण के पक्ष में थे और न ही उन्होंने उनके अपने तबकाई सिद्धांतों के निर्माण को स्वीकृति प्रदान की। मार्क्स ने कहा था कि महिलाओं को सामाजिक क्रांति में केंद्रीय भूमिका निभानी चाहिए। उन्होंंने वस्तुतः सामाजिक परिवर्तन में महिलाओं की अग्रणी भूमिका का सिद्धांत प्रतिपादित किया। आद्री के निदेशक प्रोफेसर प्रभात पी. घोष ने कहा कि मार्क्स के विचार आज भी विभिन्न क्षेत्रों के विद्वानों का ध्यान इसलिए आकर्षित करते हैं कि मार्क्सवादी प्रविधि के अनेक तत्वों ने विश्लेषण को ऐसी शक्ति प्रदान की है जो मार्क्स के पहले मौजूद नहीं थी। इस मौके पर आद्री के सदस्य सचिव डाॅ. शैबाल गुप्ता ने कहा, “सम्मेलन में हमलोग मार्क्स को ही याद नहीं कर रहे हैं बल्कि उनके विचारों से मजदूर वर्ग को मिली ताकत और वैश्विक अर्थव्यवस्था को समझने उनके वैज्ञानिक दृष्टिकोण को याद कर रहे हैं।” उन्होंने कहा कि मार्क्स के विचार मानव समाज को नयी चेतना प्रदान करता है।
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