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रविवार, 16 सितंबर 2018

बिहार : JNU छात्र संघ चुनाव में आरएसएस-भाजपा की फासिस्ट साजिश को छात्रों ने दिया करारा जवाब: माले

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पटना 16 सितंबर 2018, जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय छात्र संघ चुनाव में भाजपा व संघ गिरोह की तमाम साजिशों के बावजूद यूनाइटेड लेफ्ट की ऐतिहासिक जीत हुई है. इस ऐतिहासिक जीत पर भाकपा-माले ने जेएनयू की छात्र जनता को तहे दिल से शुक्रिया अदा किया है. भाकपा-माले के बिहार राज्य सचिव कुणाल ने आज प्रेस बयान जारी करके उक्त बातों की जानकारी दी. उन्होंने कहा कि अध्यक्ष पद पर आइसा के एन साई बालाजी ने एबीवीपी के प्रत्याशी को 1179 वोट से, महासचिव के पद पर एसएफआई के एजाज ने एबीवीपी के प्रत्याशी को 1579, उपाध्यक्ष के पद पर डीएसएफ की सारिका ने एबीवीपी के प्रत्याशी को 1193 और संयुक्त सचिव के पद पर एआईएसफ के अमूथा ने एबीवीपी के प्रत्याशी को 757 वोट से एकतरफा शिकस्त दी है. सभी सीटों पर यूनाईटेड लेफ्ट के प्रत्याशियों ने हाल के दिनों में सबसे बड़ी मार्जिन से जीत हासिल की है. काउंसिलर की 22 में 18 सीटों पर भी यूनाईटेड लेफ्ट ने जीत हासिल की है. जो दिखलाता है कि जेएनयू ने आरएसएस और भाजपा के फासिस्ट एजेंडा को पूरी तरह खारिज कर दिया है और उसे मुंहतोड़ जवाब दिया है. जब से मोदी सरकार केंद्र में आई है जेएनयू जैसे शिक्षण संस्थानों को बर्बाद करने अभियान चल रहा है. कभी वहां के छात्रों को देशद्रोही कहके प्रताड़ित किया जाता है और कभी उनकी सीटों व फंड में भारी कटौती कर दी जाती है. वह सिर्फ इसलिए कि जेएनयू का पूरा मिजाज वामपंथी है और आरएसएस व भाजपा को यह नागवार गुजरता है. जाहिर है जो पार्टी मनुस्मृति को ही देश का संविधान बनाने पर आमदा हो, उसको विरोध की कोई आवाज कैसे पसंद होगी? इस छात्र संघ चुनाव में तो एबीवीपी ने हद कर दी, फिर भी जेएनयू के छात्रों ने बहुत ही धैर्य से संघियों की अशिष्टता का जवाब दिया. एसआईएस जिसे तथाकथित रूप से एबीवीपी का गढ़ माना जाता रहा है, वहां इस बार के चुनाव में पहले ही दौर में एबीवीपी को एहसास हो गया कि उसका यह गढ़ भी ढह चुका है. उसके बाद हंगामा, मार-पीट, खासकर वामपंथी कार्यकर्ताओं के साथ अभद्रता, इलेक्शन कमीशन के सदस्यों को धमकी, बाहर से गुंडों को आयातित कर आदि प्रयासों के जरिए एबीवीपी ने काउंटिंग की प्रक्रिया को बाधित किया. लगभग 12 घंटे काउंटी की प्रक्रिया बाधित रही. एबीवीपी की इस गुंडई के खिलाफ जब हजारो छात्र कैंपस में उतर आए तब कहीं जाकर एबीवीपी पीछे हटा. जाहिर सी बात है एबीवीपी जैसे संगठन को लोकतंत्र में तनिक भी यकीन नहीं है.

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