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शनिवार, 3 नवंबर 2018

विचार : शिप्रकाश भारद्वाज की कलम से। : "मेरी मम्मी को मत जलाओ"....................।

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बेगूसराय (अरुण शाण्डिल्य) जिसकी कामयाबी रोकी नहीं जा सकती,उसकी बदनामी शुरू की जा सकती है।कुछ ऐसा ही संस्कार हमारा हो गया है।पिछले कुछ दिनों से प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक और सोशल मीडिया में BRDAV Public School के खिलाफ फैलाये गए सनसनी ने बाल मन पर गहरा असर डाला है। परसों विद्यालय गेट पर विद्यालय प्रधान और पूर्व म्यूजिक टीचर का सांकेतिक अर्थी जलाया गया और नारेबाजी की गई।छुट्टी के समय प्राइमरी विंग की बच्ची अर्थी देखते ही रोना शुरू कर दी,मेरी मम्मी को मत जलाओ,कारण,उस बच्ची ने सच में अपनी मम्मी को खो दिया है।यह दृश्य देखते ही उसे अपने घर की घटना याद आ गयी। आखिर न्यायालय और police की व्यवस्था क्यों की गई है।अगर कुछ गलत हुआ है तो सिर्फ मीडिया ट्रायल और character assassination कर संस्थान को बर्बाद करने का अधिकार कुछ लोगों को कैसे दिया जा सकता है। बिहार ही नहीं पूरे देश में one of the best schools for girls, बालिका विद्यापीठ ,लखीसराय गंदी राजनीति को भेंट चढ़ गया।नुकसान बिहार की हज़ारों बेटियों का हुआ।आज उन्हें बिहार से बाहर जाना पड़ रहा है।शिव प्रकाश भारद्वाज कहते हैं:- St. Paul's School,Begusarai का मैं student रहा हूँ।आज पूरे विश्व में S Abishai सर के students अपनी पहचान बनाये हुए हैं।1980 से 1997 तक बरौनी रिफाइनरी टाउनशिप में एक बेहतरीन स्कूल का संचालन सर ने किया,लेकिन गंदी राजनीति का शिकार बन सर को विद्यालय G D College के पास लाना पड़ा।1997 से 2004 तक सफल संचालन के बाद फिर गंदी राजनीति का शिकार बनाकर उन्हें हटा दिया गया।नतीजा सबों के सामने है। कुछ माह पूर्व सरस्वती शिशु मंदिर,Bataha, Rosera को भी गंदी राजनीति का शिकार होना पड़ा।आखिर कब तक यह चलता रहेगा... One of the best neuro surgeons of Bihar, Dr Ramesh Chandra के साथ ज़्यादती हुई।उनका अपहरण हुआ।पटना छोड़कर अमेरिका चले गए।11 करोड़ की आबादी वाले राज्य में रोज accidents हो रहे हैं।Extremely talented doctors की जरूरत पड़ती है।उस वक़्त पछताने के अलावा कुछ नज़र नहीं आता।व्यापारियों को भगाने का नतीजा सबों के सामने है।बेगूसराय के व्यापारी बाहर जा अरबों का काम कर रहे हैं और हज़ारों के लिए रोज़गार सृजन किया है।रोज़गार सृजनकर्ता को यूँ ही दुत्कारने का परिणाम कभी मुम्बई,कभी गुजरात में दिखता है। विजय बाबू,यमुना बाबू,सच्चिदानंद बाबू,भुवनेश्वर बाबू सरीखे शिक्षकों को सब याद करते हैं लेकिन जिनके बच्चों का admission नहीं हुआ वो पानी पी पी कर कोसते भी हैं।यह मानव स्वभाव है।कुछ आज भी वैसा ही हो रहा है।मैं कोई judge नहीं हूँ,एक शिक्षक हूँ।हर रोज़ समाज के गंदगी को बच्चों के द्वारा बताए गए बातों से जान पाता हूँ।राह चलते बेटियों पर गंदे comments किये जाते हैं।घर में तू तू मैं मैं के बीच पल रहे बच्चे भयभीत रहते हैं।कुछ बातें हमारे अधिकार क्षेत्र से बाहर हैं लेकिन बच्चों पर पड़ रहे प्रभाव से बिल्कुल वाकिफ़ हूँ।यही depression और anti social personality को जन्म दे रहा है।सिर्फ पुलिस बल पर परिवर्तन आना होता तो कब का आ चुका होता।जीवन के हर क्षेत्र में इतनी गिरावट आयी है कि सभी परेशान है।समस्या की चर्चा में हम सब आगे है।निवेदन है समाधान का हिस्सा बनें। वैसे भी culture of appreciation से आमजन बहुत दूर हो गए हैं।Culture of criticism आजकल fashion में है।
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