बेगूसराय : तेरा चेहरा विद्रूप है का सफ़लतम् मंचन - Live Aaryaavart

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शनिवार, 9 मार्च 2019

बेगूसराय : तेरा चेहरा विद्रूप है का सफ़लतम् मंचन

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अरुण कुमार (आर्यावर्त) बेगूसराय (लाभरचक) आई०टी०आई० सभागार में मुक्तिबोध की रचना "तेरा चेहरा विद्रूप है" का नाट्य रूपांतर श्री दीपक सिन्हा का सफल मंचन युवा नाट्य निर्देशक मोहित मोहन के निर्देशन में हुआ।नाट्य प्रदर्शन का उद्घाटन श्री अवधेश सिन्हा (वरिष्ठ रंगकर्मी) श्री दीनानाथ सुमित्र (जनकवि) श्री सीताराम (वरिष्ठ चित्रकार) श्री दीपक सिन्हा एवं हरि शंकर गुप्ता ने संयुक्त रुप से दिप प्रज्वलित कर किया।अतिथियों का स्वागत आहूति नाट्य अकादमी के सचिव श्री रामानुज प्रसाद सिंह नेचादर व जयशंकर प्रसाद की पुस्तक भेंट कर किया।श्री सीताराम ने अपने सम्बोधन में अकादमी को बधाई दिया,एवं ग्रामीण क्षेत्र के दर्शकों से अपील किया कि वे नाटक देखें।उन्होंने कहा कि आहूति नाट्य अकादमी प्रारंभ से ही नायें युवा निर्देशकों को अवसर प्रदान करती है एवं अपने नाट्य प्रदर्शन से उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर पहुँचाने का कार्य करती है।आहुति के कई नाटकों का मंचन भारत-रंग महोत्सव में प्रदर्शित हो चुका है।हम आज के नाटक के कलाकारों कोशुभकामना देते हैं कि वे रंग-मंच के उच्च शिखर पर अपना नाम रौशन करें।कार्यक्रम को संबोधित करते हुए यूआ रंगकर्मी हरिशंकर गुप्ता,दीपक सिन्हा ने बेगूसराय के रंगमंच को बिहार का सांस्कृतिक राजधानी बतलाया।मुख्य अतिथि श्री अवधेश सिन्हा ने अपने सम्बोधन में बेगूसराय के अभिनेता को पढ़ने की सलाह देते हुए कहा कि अध्यन करने से ही सृजन क्षमता का विकास होता है।आप पढ़ें आगे बढ़ें आज का नाटक "मुक्तिबोध"की रचना का नाट्य रूपांतरण कर जो मंच पर लाने का प्रयास किया गया है वह सराहनीय है।इस नाटक के कथा में दर्शकों के समक्ष औरतों के जीवन की कड़वी सच्चाई कोरखा है।प्रस्तुत नाटक कथ्य पितृसत्ता और मध्य वर्ग के स्त्री विमर्श को लेकर है।मध्य वर्ग के व्यक्ति आर्थिक तंगी को लेकर हमेशा से परेशान रहा है।कम आमदनी में बेहतर तरीके से अव्यवहारिक कानून का सिखन्चा कसता है।सर्वटे कि पत्नी प्रमिला काफी हद तक अपने पति के बनाये नियम के साथ चलने की कोशिश करती है,पर आखिर में थक हार जाती है।तब वह अपने पति के दोस्त यानी लेखक के पास पहुँच कर सवाल-जवाब करती है।वह भावुक होती है और विद्रोहित भी होती है।वह पितृसत्ता के खिलाफ सवाल खड़ा करती है और अंततः स्वयं रास्ते की तालाश करने की हिम्मत जुटाती है।वस्तुतः यह नाटक मुक्तिबोध की कहानी और कविता के आधार पर मध्यवर्ग की चुनौतियों को केंद्रित कर दीपक सिन्हा ने लिखा है।कई जगहों पर नाटककार ने अपने हिस्से के संवाद और कविताओं को जोड़कर नाटक तैयार किया है और पुरुष स्त्री के कई अनछुई पहलुओं को उजागर करने की कोशिश की है।यथार्थवादी शैली का यह नाटक मध्यवर्ग के कई संदर्भो को रेखांकित करने में सफलता हासिल करेगा।नाटक में पत्नी की भूमिका प्रसिद्ध युवा अभिनेत्री अंकिता सिन्हा,सर्वटे -मोहित मोहन,सुमंजय की भूमिका मेसचिन कुमार और पुत्र की भूमिका में राहुल कुमार ने जीवंत अभिनय किया।मंच परिकल्पना व निर्माण मदन द्रोण, कुन्दन कुमार,सचिन ने किया।वस्त्र विन्यास एवं रूप सज्जा-अंकिता सिन्हा,सचिन कुमार,मोहित मोहन,प्रकाश परिकल्पना रवि वर्मा,मकसूदन, साउंड डिजाइन सोनी कुमारी,रुपेश आदि ने अपनी सहभागिता निभाई।

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