बिहार : वासभूमि स्वामित्व कानून निर्माण के लिए राज्य स्तरीय सम्मेलन - Live Aaryaavart

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रविवार, 10 मार्च 2019

बिहार : वासभूमि स्वामित्व कानून निर्माण के लिए राज्य स्तरीय सम्मेलन

आजादी के 71 सालों में आबादी का बड़ा भाग यदि जीवन की सबसे बुनियादी जरूरतों में शामिल वास की भूमि से भी बडी आबादी वंचित रह गयी है । उन्हें इसके लिए सामाजिक तिरस्कार का सामना करना पड रहा है । जो किसी भी दृष्टिकोण से मानवीय नहीं कहा जा सकता है । बिहार की आबादी में बहुत बडा हिस्सा ऐसे लोगों का है जिसके सर पर एक अदद छत के लिए भूमि नहीं है ।  

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पटना,10 मार्च। स्थानीय मिलर उच्च विद्यालय, वीरचंद पटेल पथ, पटना में दलित अधिकार मंच द्वारा ‘‘वासभूमि स्वामित्व कानून निर्माण के लिए राज्य स्तरीय सम्मेलन’’ का आयोजन संपन्न हुआ । सम्मेलन में बिहार के विभिन्न जिलों के सामाजिक संगठनों के प्रतिनिधियों के अलावे अभिवंचित समुदाय के 10 हजार भूमिहीनों ने भाग लिया ।  सम्मेलन में शामिल प्रतिनिधियों ने संबोधित करते हुए कहा कि आवास की वैकल्पिक व्यवस्था के बगैर सडक, रेलवे मार्ग, तटबंध, श्मशान में बसे लोगों को अपने घरों से बेदखल कर दिया जाना, निःसंदेह मानवाधिकार का उल्लंघन है । आजादी के 71 सालों में आबादी का बड़ा भाग यदि जीवन की सबसे बुनियादी जरूरतों में शामिल वास की भूमि से भी बडी आबादी वंचित रह गयी है । उन्हें इसके लिए सामाजिक तिरस्कार का सामना करना पड रहा है । जो किसी भी दृष्टिकोण से मानवीय नहीं कहा जा सकता है । बिहार की आबादी में बहुत बडा हिस्सा ऐसे लोगों का है जिसके सर पर एक अदद छत के लिए भूमि नहीं है ।

बिहार में अनुसूचित जाति एवं जनजाति की 65.55 प्रतिशत आबादी है । जिसमें 1 करोड 16 लाख 52 हजार 296 परिवारों के पास जमीन नहीं है । गैर सरकारी आंकडों के अनुसार आवासीय गृहविहीन परिवारों की बिहार में संख्या 35 लाख है। भूमि सामाजिक प्रतिष्ठा का विषय रहा है । बिहार में सामाजिक न्याय एवं न्याय के साथ विकास की सरकार बिते तीस सालों से भी अधिक रही है, किन्तु इन भूमिहीनों को आत्म सम्मान के बजाय सरकारी उपेक्षा एवं सामाजिक हिकारत मिली है । लाखों की तादाद में आवासीय भूमिहीनों को सरकार से महज वासभूमि के लिए नारे लगाते हुए प्रखंड से लेेकर राजधानी की सडकों पर देखा जा सकता है । इन आवासीय भूमिहीनों को कभी अतिक्रमण के नाम परतो कभी साफ-सफाई के नाम पर हटाने, उजाडने का प्रयास भी होता रहता है । ये घर से बेघर होते रहते हैं ।

 बिहार राज्य आवासीय भूमि अधिकार अधिनियम 2019 सभी ग्रामीण गरीब परिवारों को आवास के लिए कम से कम 10 डिसमिल भूमि का अधिकार देता है । नियमानुसार यह अधिकार समय सीमा के अन्दर योजना बद्व तरीेके से जबावदेही पूर्वक एक निश्चित समय -सीमा में पूरे किए जाने पर भी बल देता है । गौरतलब है कि देश की आजादी के बाद बिहार भूमि सुधार कानून बनाने बाला पहला राज्य है । अनेक कानून भी बनाए गए । लेकिन सामाजिक भेदभाव एवं छूआछूत से पीडित अभिवंचित समुदाय के गरीब एवं खेतीहर मजदूरों के आज तक वासभूमि के लिए कानून नहीं बनाया? असमान भूस्वामित्व की वजह से महिला, दलित, आदिवासी एवं समाज के अन्य पिछडे समुदायों को भेदभाव का शिकार होना पडता है। माननीय सवोच्च न्यायालय ने अपने आदेशों में यह रेखांकित किया है कि किसी भी व्यक्ति के सर के उपर छत होना उसका मानवाधिकार है । यह व्यक्ति का मूलभूत अधिकार है जो उसके सम्मान के साथ जीवन जीने की परिस्थिति का निर्माण करता है । बिहार सरकार भी यह स्वीकार करती है । सरकार यह मानती है कि मकान एवं खाद्य सुरक्षा के लिए भूमि का होना नितांत जरूरी है । भारतीय संविधान भी पहचान एवं आत्मसम्मान से जीवन जीने की गारंटी देता है । 

दलित अधिकार मंच की मांग 
1. राज्य में वास की भूमि स्वामित्व कानून बनाये जाएं । 
2. भूदान एवं सीलिंग की जमीन की समीक्षा कर शेष जमीन दलित भूमिहीनों को वितरित की जाए । 
3. सभी जमीनों का मालिकाना अधिकार परिवार के वयस्क महिला सदस्य के नाम पर दी जाए। 
4. दलित एवं आदिवासियों पर होने वाले अत्याचारों की घटनाओं पर प्रभावी ढंग से रोक लगायी जाए। 
5. एससीएसपी/टीएसपी के तहत प्राप्त होने वाले निधि को कानून बना कर इसके नियोजन, आवंटन तथा सही इस्तेमाल की रूप-रेखा बनाई जाए। 

मुख्य अतिथी मानव अधिकार कार्यकर्ता संदीप चाचरा , प्रदेश अध्यक्ष श्री कपिलेश्वर राम , संचालनकर्ता सौरभ कुमार , महासचिव दीपचंद दास , वरिष्ठ सदस्या सुमित्रा जी, राज्य संचालन विनय ओहदार, भोजन का अधिकार से रूपेश जी, एकता परिषद के प्रदीप प्रियदर्शी, असंगठित क्षेत्र कामगार संगठन के पंकज श्वेताभ, फादर अन्तु, विधासागर, योगेन्द्र, नारायण, धंनजय जी, विमला जी, डा. शरद जी एवं अन्य गणमान्य लोग मौजूद थे। 

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