पर्यावरण संरक्षण के लिये सार्थक प्रयत्न : आचार्य डाॅ. लोकेशमुनि - Live Aaryaavart

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सोमवार, 3 जून 2019

पर्यावरण संरक्षण के लिये सार्थक प्रयत्न : आचार्य डाॅ. लोकेशमुनि

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पर्यावरण के प्रति लोगों को संवेदनशील बनाने, उसकी रक्षा करने एवं उसे बचाने के उद्देश्य से हर वर्ष 5 जून 2019 को विश्व पर्यावरण दिवस मनाया जाता है। पिछले कुछ समय से दुनिया में पर्यावरण के विनाश को लेकर काफी चर्चा हो रही है। मानव की गतिविधियों के कारण पृथ्वी एवं प्रकृति के वायुमंडल पर जो विषैले असर पड़ रहे हैं, उनसे राजनेता, वैज्ञानिक, धर्मगुरु और सामाजिक कार्यकर्ता भी चिंतित हैं। इस वर्ष अहिंसा विश्व भारती देश के प्रमुख धर्मगुरुओं को एक मंच पर लाकर पर्यावरण संरक्षण का एक महाअनुष्ठान मुम्बई में इसी दिन आयोजित कर रहा है, जिसमें विश्व के प्रख्यात धर्मगुरु जग्गी वासुदेव, स्वामी रामदेव, अहिंसा विश्व भारती के संस्थापक आचार्य डाॅ. लोकेशमुनि, ब्रह्मकुमारी बी.के. शिवानी सहित अनेक देश-विदेश के विशिष्ट व्यक्तित्व पर्यावरण संरक्षण के महाकुंभ में एक नयी रोशनी को अवतरित करेंगे। धर्मगुरुओं की प्रेरणा से इस विश्वास और संकल्प को सचेतन किया जायेगा कि पर्यावरण पर मंडरा रहे खतरों के लिये न केवल सावधान किया जायेगा, बल्कि अब तक जो नहीं हुआ, उसे क्रियान्वित करने एवं जागरूकता का माहौल निर्मित करने का सार्थक प्रयत्न किया जायेगा। क्योंकि इसके पीछे तीव्र प्रयत्न, नियोजित कार्यक्रम और गहरी लगन है। पर्यावरण विशेषज्ञों की मानें तो वातावरण में फैल रहे प्रदूषण के कारण समूची मानव जाति पर एक बड़ा संकट मंडरा रहा है। अगर इसपर समय रहते रोक न लगाई गई तो इसके और भी हानिकारक प्रभाव होंगे और सम्पूर्ण मानव जाति का अस्तित्व संकट में आ जायेगा। एक आम इंसान को भी इसका अहसास होने लगा कि मनुष्य ने प्रकृति को हर दृष्टिकोण से नुकसान पहुंचाया है। जंगलों की अंधाधुंध कटाई हो रही है, वाहनों से रोजाना हजारों-लाखों टन धुआं निकल रहा है जो हवा को प्रदूषित कर रहा है। कारखाने नदियों में जहरीला कचरा बहा रहे हैं तो कुछ बड़े राष्ट्र समुद्र में परमाणु परीक्षण करके उसे विषाक्त बना रहे हैं। मनुष्य के स्वार्थ का ही दुष्परिणाम है कि प्रकृति का संतुलन बिगड़ने लगा है। 

आज विश्व के सामने ग्लोबल वार्मिंग जैसी समस्याएं चुनौती के रूप में खड़ी है। औद्योगिक गैसों के लगातार बढ़ते उत्सर्जन और वन आवरण में तेजी से हो रही कमी के कारण ओजोन गैस की परत का क्षरण हो रहा है। इस अस्वाभाविक बदलाव का प्रभाव वैश्विक स्तर पर हो रहे जलवायु परिवर्तनों के रूप में दिखलाई पड़ता है। सार्वभौमिक तापमान में लगातार होती इस वृद्धि के कारण विश्व के ग्लेशियर पिघलने लगे हैं। ग्लेशियरों के तेजी से पिघलने का प्रभाव महासागर में जलस्तर में ऐसी ही बढ़ोतरी होती रही तो महासागरों का बढ़ता हुआ क्षेत्रफल और जलस्तर एक दिन तटवर्ती स्थल भागों और द्वीपों को जलमग्न कर देगा। इसका नतीजा समुद्र के किनारे बसे शहरों को भुगतना पड़ रहा है। इनसे वहां रहने वाले हजारों-लाखों लोगों का जीवन प्रभावित हो रहा है। चूंकि प्रकृति मनुष्य की हर जरूरत को पूरा करती है, इसलिए यह जिम्मेदारी हरेक व्यक्ति की है कि वह प्रकृति की रक्षा के लिए अपनी ओर से भी कुछ प्रयास करे।  पेड़-पौधें मनुष्य को स्वच्छ वायु और ऑक्सीजन प्रदान करते हैं, साथ ही जलवायु सुधार, जल संरक्षण, मिट्टी के संरक्षण और वन्य जीवन की सुरक्षा करते हंै। इसलिए पेड़-पौधों की रक्षा करना हमारा कर्तव्य है। प्राकृतिक आपदाओं से बचाव के लिए पर्यावरण संरक्षण पर जोरे देने की आवश्यकता है। यह पर्यावरण हमंे क्या नहीं देती? वर्तमान समय में पर्यावरण के समक्ष चुनौती बढ़ती जनसंख्या की है। धरती की कुल आबादी आज आठ अरब के निकट पहुंच चुकी हैं। बढ़ती आबादी पर्यावरण पर उपलब्ध संसाधनों पर अधिक दबाव डालती है, जिससे वसुंधरा की प्राकृतिक क्षमता प्रभावित होती है। बढ़ती जनसंख्या की आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए पर्यावरण के शोषण की सीमा आज चरम पर पहुंच रही है। जलवायु परिवर्तन के खतरे को कम से कम करना सबसे बड़ी चुनौती है। आज हमारा पर्यावरण अपना प्राकृतिक रूप खोता जा रहा है। विश्व में बढ़ती जनसंख्या, औद्योगिकीकरण एवं शहरीरकरण में तेजी से वृद्धि के साथ-साथ पर्यावरण प्रदूषण की समस्या भी विकराल होती जा रही है।

प्रदूषित पर्यावरण ने अनाज और फलों को भी प्रभावित किया हैं। एक तरफ तो अनियंत्रित प्रकृति ने पैदावार पर असर डाल रही है तो दूसरी ओर फलों एवं अनाजों को बेस्वाद एवं अस्वास्थ्यकर कर रही है। आज आवश्यक हो गया है कि व्यक्ति ही नहीं समुदायों, राष्ट्रों और संपूर्ण विश्व, पर्यावरण के प्रति अपनी नीतियों और उनके क्रियान्वयन में एक संवेदनशीलता लाएं। विश्व के विभिन्न भागों में पर्यावरण के प्रति सजगता धीरे-धीरे बढ़ती हुई दिखाई देने लगी है और लोग पर्यावरण के दुष्परिणामों से होने वाली समस्याओं को समझने लगे हैं। लेकिन इस जनभावना को देखते हुए सरकारें इसी पर्यावरण के स्वास्थ्य की कीमत पर भौतिक एवं आर्थिक विकास को जारी रखती है या अपनी प्राथमिकताओं पर पुनर्विचार करती है, यह एक गंभीर एवं चिन्तनीय विषय है। आधुनिक समाज में एक स्वस्थ संतुलित जीवन को एक नागरिक अधिकार के रूप में देखा जाने लगा है। औद्योगिक राष्ट्र यह भी स्वीकार करने लगे हैं कि पारिस्थितिकी दृष्टि से गैर जिम्मेदार होना आर्थिक रूप से भी फायदे का सौदा नहीं है। आज जरूरत इस बात की है कि सरकारें पर्यावरण के विभिन्न घटकों के महत्व को समझकर पर्यावरण कानूनों को सख्ती से लागू कराने में अपनी महती भूमिका अदा करे।  प्लास्टिक इस समय का प्रमुख विषाक्त प्रदूषक है। एक गैर विघटित पदार्थ होने तथा जहरीले रसायन से बना होने के कारण यह पृथ्वी, हवा और पानी को प्रदूषित करता है। आज हम दूर दराज गांव से महानगर तक प्लास्टिक कचरे की सर्वव्यापकता से त्रस्त है जगह-जगह पाॅलीथीन की थैलियों और प्लास्टिक बोतल वातावरण को प्रदूषित कर रही है इस दृश्य के रचियता हम लोग ही हैं। पर्यावरण की भयावह होती तस्वीर और पारिस्थितिकी असंतुलन की समस्या का पर्यावरण के प्रति एक सजग नागरिक का दायित्व निभाना होगा।

पर्यावरण के निरंतर बदलते स्वरूप ने निःसंदेह सोचने पर मजबूर किया है कि महज परंपराओं के रूप में विश्व पर्यावरण दिवस मानने से मानव आबादी अपने कर्तव्यों से छुटकारा नहीं पा सकती। सही मायनों में पर्यावरणीय कसौटियों पर खरे उतरने वाले कामों को करके एवं जागरूकता का माहौल निर्मित करके ही पर्यावरण दिवस की सार्थकता को सिद्ध कर सकेंगे। अहिंसा विश्व भारती का प्रयास इस दिशा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने जा रहा है। इसमें जन-जन की सहभागिता अपेक्षित है। पर्यावरण हम सभी को सतर्क कर रहा है कि अगर हमने पर्यावरण का सोच-समझकर इस्तेमाल नहीं किया तो हमारे पास कुछ भी नहीं बचेगा। पर्यावरण से जुड़े कुछ तथ्य हमें चेतावनी दे रहे हैं- जैसे सेंटर फॉर साइंस एंड एनवायरमेंट की रिपोर्ट की मानें तो भारत की गंगा और यमुना नदियों को दुनिया की 10 सबसे प्रदूषित नदियों में शुमार किया गया है। एक रिपोर्ट के अनुसार दुनिया के 20 सबसे ज्यादा प्रदूषित शहरों में अकेले 13 शहर सिर्फ भारत में हैं। अगर एक टन कागज को रिसाइकल किया जाए तो 20 पेड़ों और 7000 गेलन पानी को बचाया जा सकता है। यही नहीं इससे जो बिजली बचेगी उससे 6 महीने तक घर को रोशन किया जा सकता है। क्या आप जानते हैं कि जो टॉयलेट पेपर हम इस्तेमाल करते हैं उसके लिए हर साल करीब 27,000 पेड़ काटे जाते हैं। पर्यावरण का प्रदूषण सिर्फ किसी समुदाय विशेष या राष्ट्र विशेष की समस्या न होकर एक सार्वभौमिक चिंता का विषय बन गया है। परिस्थितिकीय असंतुलन हर प्राणी को प्रभावित करता है अतः यह जरूरी हो जाता है कि विश्व के सभी नागरिक पर्यावरण समस्याओं के सृजन में अपनी हिस्सेदारी को पहचाने और इन समस्याओं के समाधान के लिए अपना-अपना सहयोग दें। आज विश्व में पर्यावरण में असंतुलन गंभीर चिंता का विषय बन गया है जिस पर अब विचार नहीं ठोस पहल की आवश्यकता है अन्यथा जलवायु परिवर्तन, गर्माती धरती और पिघलते ग्लेशियर मानव जीवन के अस्तित्व को खतरे में डाल देंगे।

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