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रविवार, 28 जुलाई 2019

बिहार : आमलोगों से शिक्षा छीन लेनेे वाली है शिक्षा नीति 2019, सरकार इसे वापस ले: माले

मेडिकल संस्थानों की स्वायत्ता पर हमला व मेडिकल में निजीकरण को बढ़ावा दे रही हैै मोदी सरकार.इसका हर स्तर पर विरोध होना चाहिए, बिहार विधानसभा इसके खिलाफ प्रस्ताव पारित करे.
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पटना , भाकपा-माले के राज्य सचिव कुणाल ने कहा है कि चुनाव जीतने के महज एक सप्ताह के अंदर मोदी सरकार द्वारा लाई गई शिक्षा नीति 2019 का प्रारूप पूरी तरह से दलितों-गरीबों-कमजोर वर्गों व आमलोगों की पहुंच से शिक्षा को छीनकर काॅरपोरेटों व विदेशी विश्वविद्यालयों के हवाले करने का प्रयास है, जिसका हर स्तर पर विरोध होना चाहिए. यह शिक्षा के संवैधानिक दायित्व को पूरा करने की दिशा से पूरी तरह विश्वासघात है और शिक्षा को एक खरीद-बिक्री की वस्तु में तब्दील करने की कवायद है. सरकार ने पहले इस प्रारूप पर विचार-विमर्श के लिए महज एक महीने का समय दिया था, लेकिन देशव्यापी प्रतिरोध आंदोलन के बाद समय सीमा को 31 जुलाई तक बढ़ाया गया है फिर भी यह बहुत कम है. इतने कम समय में 650 पेजों के प्रारूप को पढ़ना और उसके निहितार्थ को समझना एक मुश्किल काम है. सरकार इस जनविरोधी शिक्षा नीति को जैसे-तैसे पास कर देना चाहती है. प्रारूप में अन्य संवैधानिक संस्थाओं की तरह शैक्षणिक संस्थाओं को भी कमजोर कर दिया गया है. यहां तक कि केंद्रीय मंत्रिमंडल की भी कोई भूमिका नहीं रह जाएगी. शिक्षा सीधे प्रधानमंत्री के जिम्मे आ जाएगी और वे ही इसका संचालन करेंगे. जाहिर सी बात है कि इसके जरिए भाजपा-आरएसएस शिक्षा के क्षेत्र में हर प्रकार की स्वायत्ता को खत्म कर अपने घोर दकियानूसी-अंधविश्वासी शिक्षा नीति को और इसके जरिए फासीवादी एजेंडे को थोपना चाहते हंै. प्रारूप में स्कूली शिक्षा को पूरी तरह से नष्ट कर देने की योजना शामिल है. दसवीं की जगह आठवीं का बोर्ड गठन का प्रस्ताव है. मतलब अब अधिकांश बच्चे आठवीं पढ़ने के बाद ही स्कूल छोड़ देने के लिए मजबूर हो जाएंगे. प्रारूप में निजी स्कूलों को खुली छूट दी गई है. इसमें शिक्षा के अधिकार 2009 के प्रावधानों का भी हनन है और सामाजिक न्याय के उसूलों का भी इससे खात्मा हो जाएगा. ऐसी शिक्षा नीति देश की जनता के हितों के खिलाफ है. इसलिए भाकपा-माले शिक्षा नीति के इस प्रारूप को वापस लेने के लिए व्यापक स्तर पर विरोध की आवाज को बुलंद करने का आह्वान करती है. भाकपा-माले विधायक विधानसभा में भी इस प्रश्न को उठाएंगे. उसी तरह, मेडिकल के क्षेत्र में भी सरकार कुचक्र कर रही है और उसकी स्वायत्ता को नष्ट कर रही है. जनवरी 2019 में भारत सरकार ने मेडिकल काउंसिल आफ इंडिया जैसी स्वायत्त संस्था को खत्म करने के उद्देश्य से एनएमसी (नेशनल मेडिकल कमीशन) का अध्यादेश लेकर आई. इसे 17 जून 2019 को लोकसभा में एक बार फिर इंट्रोड्यूस किया गया. इसे लेकर पूरे देश में चिकित्सकों में व्यापक आक्रोश दिख रहा है.  हम इस बिल के जरिए मेडिकल संस्थानों की स्वायत्ता को नष्ट करने व उसमें निजीकरण की प्रक्रिया को बढ़ावा देने के प्रयासों का विरोध करते हैं और ऐसे अध्यादेशों के खिलाफ बड़ी एकजुटता कायम करने का आह्वान करते हैं.

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