विशेष : अयोध्या में राममंदिर के वजूद को नकारना कितना सही - Live Aaryaavart

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शनिवार, 28 सितंबर 2019

विशेष : अयोध्या में राममंदिर के वजूद को नकारना कितना सही

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सर्वोच्च  न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई ने सभी पक्षों से आग्रह किया है कि वह अयोध्या मामले में 18 अक्टूबर तक अपनी दलीलें पूरी कर लें । उनका तर्क है कि इस मामले का फैसला लिखने में एक माह लगेगा। उनकी राय का उभयपक्षों द्वारा स्वागत किया जाना चाहिए। सदियों पुराने इस विवाद का हल तो निकलना ही चाहिए।अयोध्या विवाद पर विद्वान न्यायाधीशों का फैसला क्या होगा,यह देखने वाली बात होगी लेकिन मुस्लिम पक्ष की ओर से अयोध्या में राम मंदिर के वजूद को नकारने संबंधी जो दलीलें दी गई है, उससे कई सवालों का जन्म हुआ है और इन सवालों के जवाब लोगों को मिलने ही चाहिए। मुस्लिम पक्ष कभी कहता है कि राम चबूतरा ही जन्मस्थान है और दूसरे ही दिन अपनी ही कही बात से मुकर जाता है। अब सवाल उठता है कि मुस्लिम पक्ष की किस बात को सही माना जाए। मुस्लिम पक्ष का तर्क है कि 1528 में बाबर ने अयोध्या में मस्जिद बनवाई थी। उसकी यह भी दलील थी कि 22 नवंबर 1949 तक वहां न तो कोई मंदिर था और न ही कोई मूर्ति थी।मुस्लिम पक्ष पहले कहता था कि अयोध्या में खाली जमीन पर मस्जिद बनाई गई थी। अब उसका तर्क है कि जिस जगह पर मस्जिद बनाई गई थी। उस जगह के नीचे भी एक मस्जिद थी। देश को बरगलाने का यह खेल आखिर कब तक चलता रहेगा? मुस्लिम पक्ष को तो पुरातात्विक सबूतों पर भी भरोसा नहीं है। सर्वोच्च न्यायालय को भी यह कहना पड़ा है कि भारतीय पुरातत्व विभाग की रिपोर्ट सामान्य राय नहीं है। इसे देश के दिमागदार लोगों ने तैयार किया है। 
  
सभी धर्मग्रंथों में इस बात का जिक्र है कि मनु ने अयोध्या नगरी सरयू के तट पर बसाई थी। मनु सूर्य के पुत्र थे। इस नाते इस वंश को सूर्यवंश कहा जाता है। महाराज दशरथ सूर्यवंश में उत्पन्न अयोध्या के 66 वें शासक थे। अयोध्या मंदिरों, मठों और आश्रमों का शहर है। मस्जिद तो वहां थी ही नहीं। जब हजरत मोहम्मद ने 613 ईस्वी में उपदेश देना आरंभ किया। इस्लाम का जन्म तभी से माना जाता है। मतलब कुल 1406 साल  पुराना इस्लाम धर्म है और उसके अनुयाइयों का दावा यह है कि अयोध्या में राम मंदिर था ही नहीं। मनु से मानव जाति का उद्भव होता है। मनु सतयुग में पैदा हुए। सतयुग की आयु 17,28,000 वर्ष थी, जिसमें एक सामान्य व्यक्ति 1 लाख साल तक जी सकता था। त्रेतायुग 4,32,000 वर्षों का था, जिसमें एक सामान्य इंसान 10,000 साल तक जी सकता था। द्वापर युग 8,64,000 वर्षों का था, जिसमें व्यक्ति 1000 साल तक जी सकता था जबकि कलियुग 432000 वर्ष का है। इसमें एक आत्मा का जन्म 45 बार होता है और उसकी उम्र 100 साल तक की होगी। ऐसे में अयोध्या का रहस्य जानने के लिए कई जन्म लेना होगा। अतीत की गहराई में जाना होगा। भगवान राम का जन्म त्रेता युग में हुआ था। सारे धर्मग्रंथ इसकी गवाही देते हैं। बाल्मीकि उनके समकालीन ऋषि थे उन्होंने भी अपने ग्रंथ रामायणम में इस बात का जिक्र किया है। हजरत मोहम्मद कलियुग में पैदा हुए थे और उनके अनुयायी न अंग्रेजों के दौर में प्रकाशित गजेटियर को मानते हैं और न ही यह बताने को तैयार हैं कि बाबरनामा जो बाबर की डायरी है,उसके साढ़े पांच महीनों यानी 3 अप्रैल 1528 से 17 सितंबर 1528 तक के दिनों के पन्ने गायब क्यों हैं? मुस्लिम पक्ष को शायद इसमें भी कोई साजिश नजर आए।
   
अब जरा अयोध्या के इतिहास पर गौर करें तो भगवान श्रीराम के जल समाधि लेने के पश्चात अयोध्या कुछ काल के लिए उजाड़-सी हो गई थी, लेकिन उनकी जन्मभूमि पर बना महल वैसा ही था। भगवान श्रीराम के पुत्र कुश ने एक बार पुन: राजधानी अयोध्या का पुनर्निर्माण कराया। इस निर्माण के बाद सूर्यवंश की अगली 44 पीढ़ियों ने यहां राज्य किया। सूर्यवंशी अंतिम अयोध्या नरेश बृहद्बल की मृत्यु महाभारत युद्ध में अभिमन्यु के हाथों हुई थी। महाभारत के युद्ध के बाद अयोध्या उजड़-सी गई, मगर श्रीराम जन्मभूमि का  वजूद फिर भी बना रहा। कहते हैं कि ईसा के लगभग 100 वर्ष पूर्व उज्जैन के चक्रवर्ती सम्राट विक्रमादित्य अयोध्या में एक भव्य मंदिर के साथ ही कूप, सरोवर, महल आदि बनवाए। कहते हैं कि उन्होंने श्रीराम जन्मभूमि पर काले रंग के कसौटी पत्थर से 84 स्तंभों पर विशाल मंदिर बनवाया था। भारतीय पुरातत्व विभाग ने खुदाई में विवादित स्थल से स्तंभ मिलने का भी जिक्र किया है। सर्वोच्च न्यायालय में इस पर भी बहस हो रही है। अंगेज इतिहासकार भी मानते हैं कि बाबर के सिपहसालार मीर बाकी ने राम मंदिर को तोड़कर वहां मस्जिद बनवाई थी। यह सत्य किसी से छिपा नहीं है कि मुगलकाल में हिंदू मंदिर बड़ी तादाद में तोड़े गए थे। नमूना देखना हो तो वाराणसी की ज्ञानवापी मंदिर और मथुरा में श्रीकृष्ण जन्मभूमि से लगी मस्जिद को देख लें।

इतिहासकार रामशरण शर्मा 'सांप्रदायिक इतिहास और राम की अयोध्या' में लिखते हैं कि एक भित्तिचित्र में यह दर्शाया गया है कि किस तरह बाबर के सैनिक राम के इस कल्पित मंदिर को ध्वस्त कर रहे हैं और हिंदुओं का क़त्लेआम कर रहे हैं। इस भित्ति चित्र के नीचे लिखा है कि बाबर के सिपाहियों ने अयोध्या में राम मंदिर पर हमला करते समय 75 हजार हिंदुओं को मौत के घाट उतार दिया और उनके रक्त को गारे की तरह इस्तेमाल कर बाबरी मस्जिद खड़ी की। इस भििित्त चित्र पर लिखे शब्दों में कितनी सच्चाई है, यह बहस—मुबाहिसे का विषय हो सकता है लेकिन बिना आग के धुआं उठने की कल्पना भी नहीं की जा सकती है। पूर्व आइपीएस किशोर कुणाल ने अपनी पुस्तक 'अयोध्या रीविज़िटेड' में लिखा है कि मंदिर को 1528 में नहीं, बल्कि 1660 में अयोध्या में मंदिर औरंगजेब के गवर्नर फिदाई खान ने गिरवाया था। अगर  राम  मंदिर औरंगजेब के कार्यकाल में  तोड़ा गया तो वह बाबरी मस्जिद कैसे हो सकती है? कुछ विद्वानों का ऐसा मत है कि अयोध्या में इस मंदिर का निर्माण इब्राहिम लोधी ने करा दिया था तो भी यह मस्जिद बाबर के नाम से नहीं जानी जा सकती। बहुत पहले क बाबरी मस्जिद का नाम  मस्जिद—ए— जन्मस्थल हुआ करता था। अयोध्या बाबर की जन्मस्थली तो थी नहीं। वह तो भगवान राम की जन्मस्थली थी।  राम अयोध्या के राजा थे। अयोध्या राम की है।वहां की इंच—इंच भूमि राम की थी फिर उनकी भूमि पर कब्जे का क्या औचित्य है? अयोया की भूमि का कोई भी टुकड़ा  बाबर या उसके समर्थकों का नहीं हो सकता। अयोध्या की भौगालिक पृष्ठभूमि को देखें तो जिस जगह पर रामजन्मभूमि बताई जा रही है। उसी से सटा हुआ महाराज दशरथ का महल है। 1986 में  बाबरी मस्जिद परिसर का ताला खोलने का आदेश देने वाले फ़ैज़ाबाद के ज़िला जज केएम पांडेय ने अपनी किताब ‘वॉयस ऑफ कॉन्शस’ में लिखा है कि मंदिर के भीतर और बाहर पत्थरों पर जो बातें उकेरी गई हैं, उससे यह बात पुख्ता होती है कि बाबर ने अयोध्या का दौरा किया था और मंदिर का ध्वंस किया था। मंदिर के ही अवशेषों का इस्तेमाल कर मस्जिद  बनाई गई थी। ब्रिटिश इतिहासकार विलियम अर्सकाइन ने 1854 में अपनी किताब ‘ए हिस्ट्री ऑफ इंडिया अंडर द टू फ़र्स्ट सॉवरेन्स ऑफ़ द हाउस ऑफ तैमूर, बाबर एंड हुमायूं’ में लिखा है कि बाबर अयोध्या में एक पखवाड़े तक रहा और वह वहां पर इमारतें बनाने की गतिविधियों में शामिल रहा।
  
सच तो यह है कि यह मामला 1885 से अदालत में है। उस समय संत रघुवरदास ने वहां राम मंदिर निर्माण की तत्कालीन अंग्रेज सरकार से इजाजत मांगी थी। राम मंदिर तोड़े जाने का गुरु गोविंद सिंह ने भी विरोध किया था। वे तो अयोया जाकर लड़े भी थे। मुस्लिम पक्ष की दलील है कि 23 दिसंबर, 1949 को  कुछ हिंदुओं ने मस्जिद के केंद्रीय स्थल पर कथित तौर पर भगवान राम की मूर्ति रख दी। इसके बाद उस स्थान पर हिंदू नियमित रूप से पूजा करने लगे। मुसलमानों ने नमाज पढ़ना बंद कर दिया। व्र्श 1950 से रामा का मुकदमा अदालत में विचाराधीन है। 2010 में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा था कि अयोध्या का 2.77 एकड़ का क्षेत्र तीन हिस्सों में समान बांट दिया जाए। एक हिस्सा सुन्नी वक्फ बोर्ड, दूसरा निर्मोही अखाड़ा और तीसरा रामलला विराजमान को मिले। हाईकोर्ट के इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में 14 याचिकाएं दाखिल की गई थीं।
  
सवाल यह नहीं कि 22 नवंबर 1949 तक अयोध्या में विवादित स्थल पर राम मंदिर था या नहीं था बल्कि असल सवाल तो यह है कि 1528 में जब बाबरी मस्जिद बनाई गई तब वहां मंदिर था या नहीं था। इस सवाल को नजरंदाज नहीं किया जाना चाहिए। इसमें संदेह नहीं कि अदालत गुण—दोष के आधार पर निर्णय करती है। वह आस्था से प्रभावित नहीं होती। वह साक्ष्यों की रोशनी में ही निर्णय करती है लेकिन यह एक ऐसा मामला है जिसमें तथ्य कम और आस्था ज्यादा है। यह बेहद संवेदनशील मामला है। इसमें संदेह नहीं कि मुगलकाल में हिंदुओं की भावना से खिलवाड़ हुआ था। सदियों पूर्व जो गलती मुगलों से हुई थी। इस देश के मुसलमान बंधु चाहते तो उसका सुधार—परिष्कार कर सकते थे लेकिन सच तो यह है कि वह इतिहास की गलतियों को बनाये रखने में ही अपना  हित समझ रहे हैं। अब यह इस देश की सबसे बड़ी अदालत के नीर—क्षीर विवेक का मामला है कि वह इस संवेदनशील मुद्दे को कैसे लेती है और उसका निर्णय क्या होता है? इसमें शक नहीं कि आस्थागत मामले में निर्णय करना कठिन होता है। अदालत की दुविधा को समझा जा सकता है। राम अयोध्या में जन्मे, यह तो ठीक है, लेकिन कहां जन्मे, इसे न  तो आज का विज्ञान सिद्ध कर सकता है और न ही पुरातत्व। अयोध्या का लाखों साल पुराना इतिहास है। इस बीच अयोध्या कई बार उजड़ी और कई बार बसी है लेकिन सरयू प्रमाण है। संवत 1680 जो मुगल शासक अकबर का काल था, से कुछ पहले गोस्वामी तुलसीदास ने लिखा था कि 'उत्तर दिसि सरयू बह पावन। अवधपुरी मम पुरी सुहावन।' तब से आज तक सरयू की स्थिति में कोई खास परिवर्तन नहीं हुआ है।
  
उम्मीद की जानी चाहिए कि इस बार देश  की सबसे बड़ी अदालत नीर—क्षीर विवेक करेगी। कम से कम वह विवादित स्थल  की भूमि को तीन हिस्से में नहीं बांटेगी। साधुवाद देना चाहिए कि अदालत ने लीक से हटकर इस मामले में मध्यस्थता का भी प्रयास किया लेकिन जहां पूर्वाग्रही जड़ता हो, वहां मध्यस्थों की नहीं चलती।  यह एक ऐसा विवाद है जिसके हल होने में ही मानव मात्र की भलाई है। हम इस विवाद को पीढ़ियों को हस्तांतरित नहीं कर सकते। अदालत भी इस बार तटस्थ है। सरकार भी तटस्थ है। सबकी नजर सुनवाई खत्म होने और अदालती के भावी निर्णय पर है। यह निर्णय देश का भविष्य तय करेगा। इसलिए बहुत ही सावधानी बरतने और सूझ—बूझ का परिचय देने की जरूरत है।  





-सियाराम पांडेय 'शांत'- 

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