पूर्णिया : अमौर क्षेत्र में फारसी का अलख जगाने वाले उर्दू के शिक्षाविद मुंशी अब्दुस शमद के निधन पर शोक - Live Aaryaavart

Breaking

प्रबिसि नगर कीजै सब काजा I ह्रदय राखि कौसलपुर राजा II, हरिजन जानि प्रीति अति गाढ़ी। सजल नयन पुलकावलि बाढ़ी॥, मंगल भवन अमंगल हारी I द्रवहु सुदसरथ अजिर बिहारी II, हरि अनंत हरि कथा अनंता I कहहि सुनहि बहुबिधि सब संता II, दीन दयाल बिरिदु संभारी । हरहु नाथ मम संकट भारी।I, माता पिता की सेवा करें....बुजुर्गों का ख्याल रखें...अपनी प्रतिभा और आचरण से देश का नाम रौशन करें...

रविवार, 1 सितंबर 2019

पूर्णिया : अमौर क्षेत्र में फारसी का अलख जगाने वाले उर्दू के शिक्षाविद मुंशी अब्दुस शमद के निधन पर शोक

condolance-purnia
पूर्णिया (आर्यावर्त संवाददाता) : अमौर विधानसभा क्षेत्र के सभी 41 पंचायतों में घूम घूम कर फारसी का अलख जगाने वाले उर्दू के शिक्षाविद मुंशी अब्दुस शमद का लंबी बीमारी के कारण मंगलवार की शाम निधन हो गया। जैसे ही उनके निधन की खबर सोशल मीडिया व मोबाइल द्वारा अमौर सहित आसपास के क्षेत्रों में फैलने लगी लोगों का हुजूम उनके अंतिम दर्शन को उनके निवास फकीरटोली में आना शुरू हो गया। इस मशहूर शख्सियत के बारे में बताते हुए उनके बड़े पुत्र मंजर नवाज ने कहा कि उनके पिता ने अपना सारा जीवन ही फारसी के नाम कर दिया था। जनवरी 1941 में फकीरटोली में जन्मे इस शख्स ने अपनी शुरुआती तालीम अपने गाव में ही ली। फिर, फारसी के प्रति उनकी चाहत इस कदर बढ़ी कि इस क्षेत्र में ऊंची तालीम के लिए बिहार के साथ बंगाल में भी तालीम लिया। मुंशी में तालिम लेकर वे जब घर आए तो शायद एक भी दिन वे घर में चैन से नही बैठे जैसे क्षेत्र में मुस्लिम छात्रों को फारसी की बेहतरीन तालीम देने का उन्होंने पक्का इरादा कर लिया हो। अमौर के अलग अलग क्षेत्रों में घूम घूम कहीं छह माह तो कही एक वर्ष रुककर फारसी का अलख जगाया। पुत्र नवाज ने बताया कि फारसी के साथ उनका लगाव ही था जो दीनी तालीम देने के बाद जो थोड़े फुर्सत के समय उनके पास बचता लिखने में गुजर देते थे। उन्होंने अपमे इस जीवन के दास्तान और फारसी के पहचान को क्षेत्र में कायम रखने के लिए 160 पन्नों की दीवाने अमजद नामक किताब भी लिखी। पर फारसी का चलन धीरे धीरे कम होने से उसने इसे प्रकाशित करने का तत्काल इरादा छोड़ दिया। फारसी में महारथ हासिल करने वाले इस शख्स से क्षेत्र में न जाने कितनों ने तालीम ली होगी। इनमें से एक समाजसेवी मो अफरोज आलम ने बताया कि उनके गाव में बाकायदा मदरसे में रहकर उन्होंने एक साल तक हम सभी को ऐसी तालीम दी। जो आजकल कम ही देखने को मिलती है। इस मशहूर शख्सियत के निधन ने क्षेत्र में फारसी का चिराग ही मानो बुझ गया हो। वो अपने पीछे दो पुत्र पांच पुत्री सहित पोते पोती सहित बारह सदस्यों का भरा पूरा परिवार छोड़ कर गए हैं।

कोई टिप्पणी नहीं:

Loading...