बिहार वाटर डेवलपमेंट सोसाइटी के द्वारा बालश्रम एवं बाल तस्करी पर कार्यशाला संपन्न - Live Aaryaavart

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शनिवार, 30 नवंबर 2019

बिहार वाटर डेवलपमेंट सोसाइटी के द्वारा बालश्रम एवं बाल तस्करी पर कार्यशाला संपन्न

1991 की जनगणना के अनुसार देश में बाल-मजदूरी करने वाले बच्चों की कुल संख्या 11.28 मिलियन थी। जबकि एनएसएसओ के 1999-2000 सर्वेक्षण प्रतिवेदन के अनुसार यह संख्या 10.40 मिलियन थी। इसके अंतर्गत यह प्रस्तावित है कि जोखिम भरे उद्योग में कार्यरत बच्चों का क्रमिक रूप पुनर्वास कार्य प्रारंभ हो। जोखिम भरे व्यवसायों में काम करने वाले बच्चों का सर्वेक्षण कर, उन्हें वहाँ से हटाकर विशेष स्कूलों (पुनर्वास-सह-कल्याण केन्द्र) में दाखिला दिलाया जाए ताकि सरकारी स्कूली व्यवस्था की मुख्यधारा से उन्हें जोड़ा जा सके। 10 वीं योजनावधि की रणनीति के अंतर्गत उन्हें व्यावसायिक प्रशिक्षण प्रदान करने की भी योजना है।अपनी कम्पनी पर दबाव डालें कि बच्चों के स्थान पर वयस्कों की नियुक्त करें।
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बाढ़,30 नवम्बर। गैर सरकारी संस्था बिहार वाटर डेवलपमेंट सोसाइटी के तत्वावधान में संत जोसेफ विद्यालय में एक दिवसीय प्रखंड स्तरीय कार्यशाला 30 नवंबर को संत जोसेफ विद्यालय में आयोजित किया गया। इस बात की जानकारी बाल श्रम एवं मानव-तस्करी निषेध परियोजना के समन्वयक विपिन सिंह ने दी है। प्रखंड स्तरीय कार्यशाला के मुख्य अतिथि श्रम प्रवर्तन पदाधिकारी श्रृंजन कुमार सिन्हा ने कहा कि हमलोग बाल श्रम को खत्म करने का प्रयास करते हैं। उन्होंने कहा कि अपने देश के समक्ष बालश्रम की समस्या एक चुनौती बनती जा रही है। सरकार ने इस समस्या से निपटने के लिए कई कदम भी उठाये हैं। समस्या के विस्तार और गंभीरता को देखते हुए इसे एक सामाजिक-आर्थिक समस्या मानी जा रही है जो चेतना की कमी, गरीबी और निरक्षरता से जुड़ी हुई है। इस समस्या के समाधान हेतु समाज के सभी वर्गों द्वारा सामूहिक प्रयास किये जाने की आवश्यकता है। वर्ष 1979 में भारत सरकार ने बाल-मज़दूरी की समस्या और उससे निज़ात दिलाने हेतु उपाय सुझाने के लिए 'गुरुपाद स्वामी समिति' का गठन किया था। समिति ने समस्या का विस्तार से अध्ययन किया और अपनी सिफारिशें प्रस्तुत की। उन्होंने देखा कि जब तक गरीबी बनी रहेगी तब तक बाल-मजदूरी को हटाना संभव नहीं होगा। इसलिए कानूनन इस मुद्दे को प्रतिबंधित करना व्यावहारिक रूप से समाधान नहीं होगा। ऐसी स्थिति में समिति ने सुझाव दिया कि खतरनाक क्षेत्रों में बाल-मजदूरी पर प्रतिबंध लगाया जाए तथा अन्य क्षेत्रों में कार्य के स्तर में सुधार लाया जाए। समिति ने यह भी सिफारिश की कि कार्यरत बच्चों की समस्याओं को निपटाने के लिए बहुआयामी नीति बनाये जाने की जरूरत है। 'गुरुपाद स्वामी समिति' की सिफारिशों के आधार पर बाल-मजदूरी (प्रतिबंध एवं विनियमन) अधिनियम को 1986 में लागू किया गया था। इस अधिनियम के द्वारा कुछ विशिष्टिकृत खतरनाक व्यवसायों एवं प्रक्रियाओं में बच्चों के रोजगार पर रोक लगाई गई है और अन्य वर्ग के लिए कार्य की शर्त्तों का निर्धारण किया गया। इस कानून के अंतर्गत बाल श्रम तकनीकी सलाहगार समिति के आधार पर जोखिम भरे व्यवसायों एवं प्रक्रियाओं की सूची का विस्तार किया जा रहा है।

दृष्टिकोण की सामंजस्यता के संदर्भ में वर्ष 1987 में राष्ट्रीय बाल-मजदूरी नीति तैयार की गई। इस नीति के तहत जोखिम भरे व्यवसाय और प्रक्रियाओं में कार्यरत बच्चों के पुनर्वास कार्य पर ध्यान केन्द्रित किये जाने की जरूरत बताई गई। एक दिवसीय प्रखंड स्तरीय कार्यशाला के संचालक शिक्षक अरविन्द कुमार ने कहा कि बाल मज़दूरी की समस्या के समाधान के क्षेत्र में 'एम.वी. फाउंडेशन द्वारा एक अलग दृष्टिकोण विकसित किया गया है। यह संस्थान स्कूल छोड़े हुए, नामांकन से वंचित तथा अन्य कार्यरत बच्चों के लिए संयोजन पाठ्यक्रम (ब्रिज कोर्स) चला रहा है तथा उनकी उम्र के अनुरूप औपचारिक शिक्षा पद्धति के अंतर्गत स्कूल में नामांकन करा रहा है। यह पद्धति काम करने वाले बच्चों को स्कूल की ओर लाने में काफी हद तक सफल रहा है और इसे आँध्र प्रदेश सरकार के साथ प्रथम, सिनी - आशा,लोक जुम्बिश जैसी गैर सरकारी संस्थाओं ने भी अपनाया है। यूनीसेफ के अनुसार बच्चों का नियोजन इसलिए किया जाता है, क्योंकि उनका आसानी से शोषण किया जा सकता है। बच्चे अपनी उम्र के अनुरूप कठिन काम जिन कारणों से करते हैं, उनमें आम तौर पर गरीबी पहला है। लेकिन इसके बावजूद जनसंख्या विस्फोट, सस्ता श्रम, उपलब्ध कानूनों का लागू नहीं होना, बच्चों को स्कूल भेजने के प्रति अनिच्छुक माता-पिता (वे अपने बच्चों को स्कूल की बजाय काम पर भेजने के इच्छुक होते हैं, ताकि परिवार की आय बढ़ सके) जैसे अन्य कारण भी हैं। और यदि एक परिवार के भरण-पोषण का एकमात्र आधार ही बाल श्रम हो, तो कोई कर भी क्या सकता है। बाल श्रम उन्मूलन के लिए राष्ट्रीय बाल श्रम परियोजना कार्यक्रम के तहत 1.50 लाख बच्चों को शामिल करने हेतु 76 बाल श्रम परियोजनाएं स्वीकृत की गयी हैं। करीब 1.05 लाख बच्चों को विशेष स्कूलों में नामांकित किया जा चुका है। श्रम मंत्रालय ने योजना आयोग से वर्तमान में 250 जिलों की बजाय देश के सभी 600 जिलों को राष्ट्रीय बाल श्रम परियोजना में शामिल करने के लिए 1500 करोड़ रुपये देने को कहा है। 57 खतरनाक उद्योगों, ढाबा और घरों में काम करनेवाले बच्चों (9-14 साल की उम्र के) को इस परियोजना के तहत लाया जायेगा। सर्व शिक्षा अभियान जैसी सरकारी योजनाएं भी लागू की जा रही हैं। सातवीं पंचवर्षीय योजनावधि के दौरान 14 अगस्त, 1987 को राष्ट्रीय बाल श्रम नीति को मंत्रिमंडल द्वारा मंजूर किया गया। इस नीति का उद्देश्य बच्चों को रोजगार से हटाकर उन्हें समुचित रूप से पुनर्वास कराना था। इस तरह जिन क्षेत्रों में बाल श्रम अधिक है उन क्षेत्रों में इसके प्रभाव को कम करना है।

कानूनी कार्य योजना – विभिन्न श्रम कानूनों के अंतर्गत बाल श्रम से संबंधित कानूनी प्रावधानों को कठोरतापूर्वक एवं प्रभावी ढंग से क्रियान्वयन को सुनिश्चित करना।
सामान्य विकास कार्यक्रम पर ध्यान देना – जहाँ तक संभव हो विभिन्न मंत्रालयों/विभागों द्वारा बाल श्रमिकों के कल्याण के लिए चलाए जा रहे विकास कार्यक्रमों का उपयोग करना।
परियोजना आधारित कार्य योजना – जिन क्षेत्रों में बाल-श्रमिकों का प्रभाव अधिक है उन क्षेत्रों में कार्यरत बच्चों के लिए योजनाएँ बनाना। 10वीं योजनावधि के दौरान श्रम नीति के अंतर्गत व्यापक दृष्टिकोण को अपनाया जाएगा।

शिक्षा एवं कौशल विकास केन्द्र की किशोरी बालिकाओं ने बाल श्रम रोकने एवं बालिका शिक्षा पर नाटक प्रस्तुत किया।1991 की जनगणना के अनुसार देश में बाल श्रमिकों की संख्या लगभग 1.1 करोड़ थी। संसाधनों की कमी और सामाजिक चेतना और जागरूकता के वर्तमान स्तर को ध्यान में रखते हुए सरकार ने 10वीं पंचवर्षीय योजनावधि के अंत तक देश से बाल-श्रम समाप्त करने की समय-सीमा निर्धारित की है। इस योजना के अंतर्गत उन सभी बच्चों को शामिल किया है जिनकी उम्र 14 से कम है और जो काम कर रहे हैं।बाल-मजदूरी रोकने के लिए आप क्या कर सकते हैं?जब किसी बच्चे को शोषित होते हुए देखें, तो उसकी व्यक्तिगत मदद करें। बच्चों की सुरक्षा के लिए कार्यरत संगठनों के लिए स्वेच्छा से समय निकालें।व्यावसायिक प्रतिष्ठानों से कहें कि यदि वे बच्चों का शोषण बन्द नहीं करते हैं तो उनसे कुछ भी नहीं खरीदेंगे।बाल-श्रम से मुक्त हुए बच्चों के पुनर्वास और शिक्षा के लिए कोष जमा करने में मदद करें।आपके किसी रिश्तेदारों या परिजनों के यहां बाल-श्रमिक है, तो आप सहजता पूर्वक चाय-पानी ग्रहण करने से मना करें और इसका सामाजिक बहिष्कार करें।अपने कर्मचारियों के लिए जागरूकता कार्यक्रम आयोजित करके बाल-श्रम की समस्या के बारे में सूचित करें और उन्हें प्रोत्साहित करें कि वे अपने बच्चों को नियमित रूप से स्कूल भेजें। सरकार के द्वारा एवं मानव-तस्करी निषेध परियोजना के अंतर्गत संचालित  कार्यशाला में लगभग 80 से अधिक बच्चों एवं महिलाओं ने भाग लिया। संत जोसेफ विद्यालय में आयोजित कार्यशाला में परियोजना समन्वयक विपिन सिंह के साथ स्टाफ श्रीकांत, वीरेन्द्र, रेखा, कुसुम, ज्योति एवं पूजा ने भाग लिया।

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