बिहार : एनपीआर में ट्रांसजेंडर कॉलम शामिल किये जाने पर खुशी की लहर - Live Aaryaavart

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शनिवार, 29 फ़रवरी 2020

बिहार : एनपीआर में ट्रांसजेंडर कॉलम शामिल किये जाने पर खुशी की लहर

एक मुलाकात में विभागीय अधिकारियों से इसकी पूरी समीक्षा करने को कहा है नीतीश कुमार ने।साथ ही थर्ड जेंडर का सर्वे कराने को भी कहा।रेशमा प्रसाद ने किन्नरों के लिए दो फीसदी आरक्षण तथा टोला सेवकों की तरह अनुमंडल स्तर पर नियुक्ति की भी मांग की।
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पटना, मुख्यमंत्री नीतीश कुमार और पूर्व मुख्यमंत्री तेजस्वी यादव से मधुर मिलन से सीएए, एनसीआर और एनपीआर पर महत्वपूर्ण निर्णायक निर्णय लिया गया है।बिहार राज्य किन्नर कल्याण बोर्ड की सदस्य व दोस्तानासफर, बिहार की सचिव रेशमा प्रसाद ने कहा है कि नेशनल पॉपुलेशन रजिस्टर (एनपीआर) में ट्रांसजेंडर  कॉलम शामिल किये जाने पर ट्रांसजेंडर समुदाय में खुशी की लहर है। उन्होंने कहा कि बिहार विधानसभा में पारित प्रस्ताव की भूरी भूरी प्रशंसा किन्नर/ट्रांसजेंडर समुदाय करती है। मुख्यमंत्री नीतीश कुमार एवं प्रतिपक्ष के नेता तेजस्वी यादव काे दिल से धन्यवाद दोस्तानासफर देती है। सरकार के द्वारा लाए गए प्रस्ताव का समर्थन विपक्ष के द्वारा मिला है।  रेशमा प्रसाद ने बताया कि ट्रांसजेंडर समुदाय के लिए पूरे भारत में बिहार पहला प्रस्ताव लाया है तथा नेशनल पॉपुलेशन रजिस्टर में ट्रांसजेंडर समुदाय को जेंडर कॉलम में ट्रांसजेंडर शामिल करने का है।2011 में अदर ऑप्शन का कॉलम था | उच्चतम न्यायालय के आदेश तथा भारत सरकार के द्वारा पारित ट्रांसजेंडर बिल के उपरांत बिहार भारत का पहला राज्य है जहां पर नेशनल पॉपुलेशन रजिस्टर में ट्रांसजेंडर कॉलम जोड़ने का प्रस्ताव पारित विधानसभा से हुआ हुआ दोस्तानासफर पूर्व में  बिहार सरकार के जनगणना विभाग को पत्र लिख चुका था।एक मुलाकात में विभागीय अधिकारियों से इसकी पूरी समीक्षा करने को कहा है नीतीश कुमार ने।साथ ही थर्ड जेंडर का सर्वे कराने को भी कहा।रेशमा प्रसाद ने किन्नरों के लिए दो फीसदी आरक्षण तथा टोला सेवकों की तरह अनुमंडल स्तर पर नियुक्ति की भी मांग की।

1931 के बाद से नहीं हुई जाति आधारित जनगणना
पिछले साल जनवरी में एक कार्यक्रम मेंनीतीश ने कहा था,‘‘किस जाति के लोगों की संख्या कितनी है, यह मालूम होना चाहिए। देश में आबादी के अनुरूप आरक्षण का प्रावधान हो। 1931 के बाद देश में जाति आधारित जनगणना नहीं हुई। अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और धर्म के आधार पर जनगणना हुई है। इसी तर्ज पर 2021 में सभी जातियों की जनगणना होनी चाहिए।’’नीतीश कुमार ने सबसे पहले 1990 में जाति आधारित जनगणना कराने की मांग की थी। उन्होंने इसके लिए तब के प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह को भी पत्र लिखा था। बिहार विधानसभा में 18 फरवरी 2019 को 2021 में जाति आधारित जनगणना कराए जाने का प्रस्ताव पारित किया गया था।

क्यों हो रही जाति आधारित जनगणना की मांग?
केंद्र सरकार हर 10 साल पर जनगणना कराती है। जनगणना के मौजूदा फॉर्मेट में यह तो पता चल जाता है कि देश में किस धर्म के कितने लोग हैं और अनुसूचित जाति-अनुसूचित जनजाति के लोगों की संख्या क्या है। लेकिन यह पता नहीं चलता कि सामान्य, पिछड़ा और अति पिछड़ी जाति के लोगों की संख्या कितनी है। जाति आधारित जनगणना हुई तो यह पता चलेगा कि इनकी संख्या कितनी है। नीतीश का कहना है कि इसके आधार पर सरकार को विकास की दौड़ में पीछे रह गए तबके के लिए अलग से योजनाएं बनाने में मदद मिलेगी। जाति आधारित जनगणना का संबंध आरक्षण से भी है। नीतीश कुमार की मांग रही है कि देश में आबादी के अनुरूप आरक्षण का प्रावधान हो। वर्तमान में पिछड़ी जातियोंको 27%आरक्षण मिलता है। यह पता चलने पर कि पिछड़ी जातियों में किस जाति के लोगों की संख्या कितनी है और उनकी सामाजिक-आर्थिक स्थिति कैसी है। उनके लिए खास योजना बनाई जा सकती है।

जनगणना 2011: बिहार में 82% हिंदू, इसमें 51% आबादी ओबीसी की 2011 की जनगणना के मुताबिक,बिहार की जनसंख्या 10.38 करोड़ थी। इसमें 82.69% आबादी हिंदू और 16.87% आबादी मुस्लिम समुदाय की थी। हिंदू आबादी में 17% सवर्ण, 51% ओबीसी, 15.7% अनुसूचित जाति और करीब 1 फीसदी अनुसूचित जनजाति है। मोटे-मोटे तौर पर यह कहा जाता है कि बिहार में 14.4% यादव समुदाय, कुशवाहा यानी कोइरी 6.4%, कुर्मी 4% हैं। सवर्णों में भूमिहार 4.7%, ब्राह्मण 5.7%, राजपूत 5.2% और कायस्थ 1.5% हैं।

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