विशेष आलेख : कोरोना के दौर में आम्बेडकर और भी प्रासंगिक - Live Aaryaavart

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मंगलवार, 14 अप्रैल 2020

विशेष आलेख : कोरोना के दौर में आम्बेडकर और भी प्रासंगिक

  • -    “इस बायो-पॉलिटिक्स के साथ आने वाले आर्थिक मार को गाँव कैसे झेलेंगे।“ - प्रो. बद्रीनारायण
  • -    जब सामाजिक जीवन कुछ दिनों के लिए बंद है ऐसे में साइबर स्पेस नया सोशल स्पेस है।
  • -    राजकमल प्रकाशन समूह के फेसबुक लाइव में आम्बेडकर के विचारों से लेकर बिज्जी और भाषा की प्रासंगिकता एवं उसके राजनीतिकरण पर मौलिक चर्चाओं का हुआ आयोजन
  • -    गीतकार राजशेखर ने सुनाएं फ़िल्मी किस्से तो पुष्पेश पंत ने साझा किए कबाबों के किस्से   
corona-and-ambedkar
सरकार ने जरूरी कदम उठाते हुए लॉकडाउन को आगे बढ़ाने का फैसला किया है। यह समय भी बीत जाएगा। लोगों की परेशानियां ख़त्म होंगी। हम जहाँ हैं वहाँ रहकर ही अपने हिस्से की लड़ाई लड़ेंगे। लेकिन, जरूरी है कि हम याद रखें कि घरों में बंद हम अकेले नहीं हैं, किसी से दूर नहीं है। हम साथ हैं। साथ जुडे हैं। राजकमल प्रकाशन के साथ जुडें हैं। साथ पढ़ रहे हैं। यह साथ होने का सुख इस दौर का सबसे मुलायम सुख है। 

“जबतक भारतीय समाज में, दुनिया के किसी भी समाज में एक भी ग़रीब है तब तक आम्बेडकर प्रासंगिक हैं”
14 अप्रैल को बाबा साहब आम्बेडकर की जयंती बहुत धूमधाम से मनाई जाती है। आज राजकमल प्रकाशन समूह के फेसबुक लाइव पर प्रो. बद्रीनारायण ने आम्बेडकर को याद करते हुए कहा कि, “कोरोना के समय में आम्बेडकर और भी प्रासंगिक हो गए हैं।“ उन्होंने कहा कि कोविड 19 के इस लॉकडाउन के समय में जरूरी है कि हम घर पर रहकर उनको याद करें, बाबा साहब को पढ़ें, उन ग़रीबों के प्रति अपनी संवेदना रखें जिनके लिए वो आजीवन लड़ते रहे। प्रो. बद्रीनारायण ने कोविड-19 के दौर में सबसे नीचले तबके के लोगों की व्यथाओं पर विस्तृत से चर्चा करते हुए कई बातें की तथा अपील की, कि हमें अपने गांवों को समझना होगा, वो इस बायो-पॉलिटिक्स के साथ आने वाले आर्थिक मार को कैसे झेलेंगे।

‘बीज जीतने पुराने और बारिश की बूंद जैसे नए थे बिज्जी’
24 दिन से लगातार चल रहे इस साहित्यिक आयोजन में आज ख़ास था राजस्थानी लोकसाहित्य के सुप्रसिद्ध लेखक विजयदान देथा के संस्मरणों को लेखक मालचंद्र तिवाड़ी के साथ याद करना। विजयदान देथा, जिन्हें बिज्जी के नाम से भी जाना था राजस्थान के विख्यात लेखक और पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित लेखक हैं। मालचंद्र तिवाड़ी, ने विजयदान देथा के राजस्थानी साहित्य का अनुवाद हिन्दी में किया है। इसी सिलसिले में उन्होंने बिज्जी के साथ लगभग एक साल का समय उनके घर पर बिताया, जिसे उन्होंने ‘बोरूंदा डायरी’ नामक सृजनात्मक कृति में दर्ज किया है। मालचंद तिवाड़ी ने बताया कि, विजयदान देथा हमेशा अपने पास रविन्द्रनाथ ठाकूर और प्रेमचंद की किताबों के उद्धरण एक कॉपी में नोट करके रखते थे। वो अपने काम के प्रति बहुत ज्यादा समर्पित एवं सजग रहते थे। बोरुंदा डायरी किताब राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित है। जब वडाली ब्रदर्श ने ‘रंगरेज़ तूने अफीम क्या खाली’ को गाया ‘अंग्रेज़ तूने मशीन का क्या खा ली” गीतकार राजशेखर ने मंगलवार की शाम को अपने गीतों के रंग से भर दिया। उन्होंने, फ़िल्मी गीत और उससे जुड़े कई मज़ेदार किस्से सुनाए तथा साथ ही अपने कई गानों के लिरिक्स भी पढ़कर सुनाए। उन्होंने बताया कि कैसे वडाली बद्रर्श के मैनेजर ने उनके लिखे गाने का ग़लत अनुवाद किया और जिसकी वजह से उन्हें ग़लत लिरिक्स ही गाना पड़ा। बाद में राजशेखर ने लिरिक्स ठीक कर उन्हें सही लिरिक्स साझा किए।  उन्होंने कहा कि, “लिखने का शौक़ था लेकिन बहुत जल्द समझ आया कि शैलेन्द्र बनना बहुत मुश्किल है। गीत लिखने के कई तय मापदंड होते हैं- किरदार, दृश्य, धुन, बाज़ार जिसके लिए गीत लिखा जा रहा है। यह कविता लिखने से बिलकुल अलग है।“ राजशेखर से बातचीत में कई लोगों ने उनसे सवाल किए जिसका उन्होंने जवाब दिया और गानों से जुड़े किस्से भी सुनाएं।

कबाब शाकाहारी भी होते हैं
हमारा हाल आजकल क्या पूछते हो / कबाबें सीख जो हैं ये हमदम बदलते हैं / जब रूठता है ये पहलू / तो वे पहलू बदलते है... स्वाद-सुख के रोज के कार्यक्रम में पुष्पेश पंत ने आज बात की भारत के तकरीबन हर प्रांत में बनने वाले कुछ स्वादिष्ट कबाबों के बारे में। रूमाली रोटी और शामी कबाब। लखनऊ के शामी कबाब का कोई मुक़ाबला नहीं। वैसे ही, लखनऊ के उस्मान मियां के पुर्खों के यहाँ मिलने वाले गलोटी कबाब का... कबाबों की शाही और नाज़ूक दुनिया है। सूरजमूखी कबाब, नक़ाबपोश कबाब, खटाई कबाब, डोरा कबाब, काकोरी कबाब, पत्थर कबाब, चपली कबाब, दर्रा कबाब, बिहारी एवं मछली कबाब। हर कबाब के साथ एक ख़ास रोटी होती है। स्वाद-सुख में बड़े चाव से कबाबों पर बात करते हुए पुष्पेश पंत ने बताया कि जब लखनऊ का काकोरी कबाब दिल्ली पहुंचा तो उसका रूप पूरी तरह बदल गया। बातचीत में उन्होंने बताया, “दिल्ली पहुंचकर काकोरी कबाब का फ्रांसीसीकरण हो गया। इसमें केसर, हल्की मात्रा में खोया भी मिला दिया गया। ज़ाहिर है कि इम्तियाज़ कुरैसी साहब ने इसे एकदन नया रूप दे दिया था।“ दिल्ली में  सादिया देहलवी के घर के पास कौसर का खोपचा है जहाँ मुल्ला कबाबी नाम के व्यक्ति काकोरी कबाब बनाया करते थे। आज भी कौसर की दुकान पर काकोरी कबाब मिलता है। वहीं सीक कबाब अपनी जगह बदलते ही अपना स्वाद बदल देती है। जैसे, रामपुर या इलाबाद के सीक कबाब स्वाद में बिलकुल अलग होते हैं। लेकिन कबाब के मामले में मेरठ वालों का मुकाबला कर पाना बहुत मुश्किल है। लेकिन, कबाब शाकाहारी भी होते हैं। इसमें भी कई तरह के स्वाद मिलते हैं। रोज सुबह ग्यारह बजे चलने वाले स्वाद-सुख कार्यक्रम में पुष्पेश नई तरह के स्वाद का जिक्र करते हैं।  भाषा का ग़लत प्रयोग भी शक्ति प्रदर्शन है ‘कविता का काम छुपाए हुई जिंदगी को उजागर करना है।‘– यह कहना है कवि महेश वर्मा का। राजकमल प्रकाशन के इंस्टाग्राम पेज पर दो-तरफा बातचीत में चंदन पांण्डेय से बातचीत में उन्होंने कविताओं और उसके उपयोग पर विस्तृत चर्चा की। भाषा के राजनीतिकरण पर एक जरूरी और महत्वपूर्ण बातचीत पर लेखक चंदन पाण्डेय के सवाल पर बोलते हुए उन्होंने कहा कि, “सेक्यूलर, कम्यूनिस्ट जैसे कई शब्दों के अर्थ को किस तरह बहुत सोच समझकर संकुचित किया जा रहा है। यह सब धीरे-धीरे लेकिन बहुत सोच समझ कर तैयार किया गया नैरेशन है।“ उन्होंने कहा कि आज के समय में लेखन दो-धारी तलवार है। पूरे दिन चलने वाले साहित्यिक कार्यक्रम में लगातार लेखक एवं साहित्यप्रेमी लाइव आकर भिन्न तरह की बातचीत के साथ एकांतवाश के अकेलेपन को कम करने की कोशिश कर रहे हैं।

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