साहित्यिकी : लॉकडाउन में आभासी दुनिया के जरिए साहित्य का साथ - Live Aaryaavart

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मंगलवार, 28 अप्रैल 2020

साहित्यिकी : लॉकडाउन में आभासी दुनिया के जरिए साहित्य का साथ

कोरोना महामारी के इस अंधेरे समय में हमारी सामाजिक जिम्मेदारियां और उससे जुड़े कई गहरे सवाल हमारे समाने हैं। अक्सर, जवाब ढूँढ़ने के लिए हम साहित्य और इतिहास की तरफ़ लौटते हैं। महामारियों को हमारे पूर्वजों ने कैसे देखा था? उससे कैसे लड़े थे? सूर्यकान्त त्रिपाठी ‘निराला’ ने अपने उपन्यास ‘कुल्लीभाट’ में हैजा जैसी महामारी का चित्रण किया है। कमलाकांत त्रिपाठी के उपन्यास ‘पाहीघर’ में महामारियों का जिक्र है। कामू के उपन्यास ‘प्लेग’ की लहर फिलहाल पूरे विश्व में फैली हुई है। विश्व के हर कोने में लोग इसे पढ़ रहे हैं। दरअसल, साहित्यिक कृतियां समय की वो धरोहर हैं जो हर पीढ़ी को किस्से-कहानी, उपन्यास, डायरी या अन्य रचनात्मक विधा के रूप में प्राप्त होती हैं। हमें यथार्थ के धरातल पर खड़े होकर इन्हें देखना और समझना चाहिए। वर्तमान मे हर इंसान की यह जिम्मेदारी है कि वो अपने समय की कहानियों में सक्रिय भूमिका अदा करते हुए मानवता को इस अंधेरे समय में रोशनी की उम्मीद दे। हम अपने इतिहास के वर्तमान में खड़े हैं और हमारे द्वारा किया गया हर छोटे से छोटा प्रयास इतिहास के सवालों का जवाब होगा। राजकमल प्रकाशन समूह द्वारा किए जा रहे छोटे-छोटे प्रयास मानवता की उम्मीद को हरा रखने के प्रयास हैं। फ़ेसबुक लाइव कार्यक्रम, वाट्सएप्प के जरिए पुस्तिका साझा करना, ज्यादा से ज्यादा ई-बुक उपलब्ध करवाना, ब्लॉग और अन्य वेबसाइट के जरिए पढ़ने के लिए कहानियाँ और लेख उपलब्ध करवाना – यह सभी प्रयास इस बड़ी लड़ाई पर जीत हासिल करने की दिशा में किए गए प्रयास हैं। इसी सिलसिले में लॉकडाउन के 37वें भी लगातार जारी राजकमल प्रकाशन समूह के फ़ेसबुक लाइव के जरिए बातें हुई कहानियों की, चित्रों की और स्वाद-सुख की। 

कुछ मीठा खायेंगे क्या?
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न जाने यह सवाल कितनी बार और कितनी तरह से हमारे सामने आया होगा...या हमने पूछा होगा। आज घरबंदी के समय में परिवार में यह सवाल बड़ों से लेकर छोटे सभी के मन में होता है। ‘स्वाद-सुख‘ कार्यक्रम में आज खान-पान विशेषज्ञ पुष्पेश पंत के साथ राजकमल प्रकाशन समूह के फ़ेसबुक लाइव कार्यक्रम के तहत हमने जाना, क्या है इस सवाल का जवाब। इतिहासकार पुष्पेश पंत ने आभासी मंच से बात करते हुए कहा, “विज्ञान भी यही कहता है कि हम जो भी खाते हैं वो ग्लुकोज़ में बदल जाता है। हमारा शरीर पोषण के रूप में उसे मीठे के रूप में ही प्राप्त करता है। लेकिन मिठाई, सिर्फ़ छेना से तैयार की गई बंगाली मिठाइयां ही नहीं होती। हमने अनाज से बनने वाली मिठाइयों को लगभग भूला दिया है।“ चक्करदार जलेबी बनाना एक बारिक कला है। तुर्कों के साथ भारत आई जलेबी, भारत के लगभग हर प्रांत में खाई जाती है। जलेबी, जलेबा, जुलेबी कुछ भी कह लें, लेकिन इसका नाम लेते ही मुंह में पानी आना स्वाभाविक है। पतली, कुरकुरी, केसरिया, पनीर वाली या नर्म मुलायम जलेबी, जैसी भी पसंद हो, इसे आसानी से घर पर बनाया जा सकता है। पुष्पेश पंत ने कहा, “जलेबी का एक परिमार्जित रूप है जिसे इमरती कहते हैं। भारत में जौनपुर की इमरती सबसे ज्यादा मशहूर है। लेकिन, इसके पीछे एक ऐतिहासिक कहानी है। एक अंग्रेज़ अफसर का अपना डाकिया हुआ करता था। एक दिन अंग्रेज़ अफसर ने उसे खाना बनाने का आदेश दिया। उसने खाना भी बनाया और साथ में मीठा भी बनाकर खिलाया। मीठा खाते ही अंग्रेज़ अफसर ने उसे तलब कर कहा कि तुम नौकरी छोड़ दो। बेचारा डाकिया परेशान की उसने क्या ग़लती कर दी। इसपर अंग्रेज ने उससे कहा कि वो नौकरी छोड़ अपनी दुकान शुरू करें और यह मीठा बनाकर बेचे। डाकिये ने मीठे में इमरती बनाकर खिलाई थी। लगभग 200 साल से यह कहानी जौनपुर की प्रसिद्ध इमरती के स्वाद की तरह लोगों के मानस में अमिट है।“ इमरती और जलेबी में मिठास का अंतर होता है। इमरती, जलेबी से थोड़ी कम मीठी होती है। इसे बनाने के लिए मैदे के खमीर चढ़े आटे में थोड़ा उड़द की दाल मिलाते हैं। इसका रंग भी जलेबी से थोड़ा ज्यादा गहरा भूरा होता है। उत्तर भारत में बनने वाली मिठाइयों में ‘बालूशाही’, ‘खाजा’ और ‘गोजा’ प्रचलित मिठाइयों में शामिल हैं। गोजा बहुत हद तक शकरपारे की तरह होता है। वहीं, पूर्वोत्तर भारत में पीठा प्रचलित व्यंजनों में शामिल है। नारियल, गुड़ और चावल के आटे से बनने वाली ये घरेलू मिठाइयां घरों में बहुत पसंद की जाती हैं। एक और मिठाई है ‘अनरसा’। पहले आम घरों में भी इसे बनाने का चलन था लेकिन, धीरे-धीरे अब यह बहुत कम जगह की देखने को मिलता है। दक्षिण में इसी से मिलती-जुलती मिठाई का नाम है ‘आदिरसम’। पंजाबियों द्वारा फैलाई गई मिठाई ‘पतीशा’ और ‘सोहनपापड़ी’ आज दीपावली के उपहारों में प्रमुखता से बांटी जाती है। पतीशा, बहुत मुश्किल से बनाया जाता है। आंध्र में एक मिठाई बनायी जाती है जिसका नाम है ‘पूर्ण बोलेरु’। इसे तैयार करने की विधि महाराष्ट् की ‘पूरन पोली’ की तरह होती है। वहीं केरल में केला, नारियल और चावल के आटे से बनाया जाता है ‘यूनिअपप्पम’। कहानियाँ हमारे लोक, हमारे समय की दास्तान से हमारा परिचय करवाती हैं। राजकमल प्रकाशन समूह के फ़ेसबुक पेज से सोमवार की शाम का समय सुप्रसिद्ध एवं चर्चित कथाकार कृष्णा सोबती को याद करने का था। कलाकार नेहा राय ने अपनी मधुर आवाज़ में कृष्णा सोबती की कहानी ‘ मियां नसीरूद्दीन’ का पाठ किया। अंश पाठ से पहले नेहा ने कृष्णा सोबती के साथ के अपने सुंदर अनुभव भी लाइव कार्यक्रम में साझा किए। उन्होंने कहा कि, “महिला लेखन के बारे में अक्सर यह कहा जाता है कि सिर्फ़ महिलाओं की समस्याओं पर ही आधारित होते हैं। लेकिन आप मियां नसीरूद्दीन की कहानी पढ़ेंगे तो आपको अपने घर के बाहर छोटे-छोटे काम करने वाले वो तमाम लोगों की याद आ जाएगी जिनसे हमारे जीवन के धागे जुड़े होते हैं। इस समय वो किस हाल में होंगे यह कहानी मजबूर करती है यह सोचने के लिए।“

राजकमल प्रकाशन से कथाकार कृष्णा सोबती का संपूर्ण साहित्य प्रकाशित है।
“विक्रम क्या तुम मेरी किताबों के लिए चित्रकारी करोगे?’ लेखक कृष्णा सोबती ने यह सवाल 2005 में सवाल विक्रम नायक से पूछा था। साहित्यकार कृष्णा सोबती से जुड़े अपने अनुभव और लप्रेक किताब की चित्रकारी के अपने अनुभवों को साझा किया चित्रकार विक्रम नायक ने।  राजकमल प्रकाशन समूह के फ़ेसबुक लाइव कार्यक्रम में बातचीत करते हुए उन्होंने कहा, “मेरे साथ यह पहली बार हुआ था कि मैं जिस किताब के लिए चित्रकारी कर रहा था उसके लेखकों से तब तक नहीं मिला जब तक किताब छपने नहीं चली गई। लप्रेक के तीनों लेखकों ने एक कलाकार के बतौर मुझे यह छूट दी कि, मैं इस किताब को अपनी तरह से लिखूँ, चित्रों के माध्यम से।“ दरअसल, चित्रों पर काम करने वाले लोगों के लिए शब्दों में अपने भाव व्यक्त करना थोड़ा मुश्किल काम है। लेकिन “अगर आपके मन में कहने की ललक है तो आप किसी भी माध्यम के जरिए उसे समप्रेषित कर सकते हैं।“ यह कहना है विक्रम नायक का। 

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