विशेष : प्रवासी मजदूरों पर राजनीति - Live Aaryaavart

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गुरुवार, 28 मई 2020

विशेष : प्रवासी मजदूरों पर राजनीति

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देश में प्रवासी मजदूरों पर राजनीति तेज हो गई है।अन्य राज्यों में लॉकडाउन के चलते फंसे प्रवासी मजदूरों की  सुरक्षित  वापसी के सरकारी प्रयासों को कांग्रेस ने न केवल नाकाफी बताया है बल्कि 20 लाख करोड़ से अधिक के आर्थिक पैकेज को जुमला पैकेज तक करार दिया है। कांग्रेस उसे केवल 3.22 लाख करोड़ का आर्थिक पैकेज बात रही है, उसकी कोशिश पूरे पैकेज को बजट का पुनर्पाठ साबित करने की है जबकि वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने पांच दिन में साढ़े 7 घंटे में देश को यही बताया है कि यह राशि कहां किस मद में,कितनी और किस तरह खर्च की जानी है। मनरेगा के बजट बढ़ाकर 65 हजार करोड़ से एक लाख एक हजार करोड़ कर दिया गया है लेकिन इसके बाद भी कांग्रेस को लगता है कि केंद्र सरकार कुछ नहीं कर रही है। उसका तर्क है कि मजदूर मजबूर नहीं हैं।  सवाल यह है कि मजदूरों की इस मजबूरी का जनक कौन है? अगर कांग्रेस ने देश में समय रहते कृषि क्षेत्र में सुधार किया होता,कुटीर उद्योगों को संरक्षण दिया होता। मुम्बई को देश की आर्थिक राजधानी बनाने की बजाय देश के जिला स्तर पर उद्योगों का जाल बिछाने की कल्पना की होती तो मजदूरों को अपने ही,प्रान्त,जिले और तहसील क्षेत्र में आजीविका मिल रही होती। उन्हें घर वापस लाने की इतनी जद्दोजहद नहीं करनी पड़ती। सबको पता है कि कोरोना वैश्विक बीमारी है। यह एक—दूसरे के संपर्क में आने से फैलती है। परस्पर दूरी बनाए रखकर ही इस बीमारी से बचा जा सकता है। मजदूर अपने गृहराज्य के लिए पैदल ही निकल रहे हैं। कुछ ट्रकों पर बैठकर आ रहे हैं। कोई साइकिल और मोटर साइकिल से आ रहा है। कोई बैलगाड़ी से आ रहा है। रोजगार विहीन मजदूरों के पास विकल्प नहीं है। वे समझ नहीं पा रहे हैं कि वे जहां हैं, वहां कैसे रहें? मजदूर जहां काम करता है, वहां का मालिक ही उसका भगवान होता है और जब भगवान ही मुंह फेर ले तो मजदूर क्या करें? उनकी बात में दम है कि जब मरना ही है तो क्यों न पुरुषार्थ करते हुए मरें। भूख से मरने से तो उनका यह तरीका बेहतर ही है। कोरोना से डरा समाज इस पर आपत्ति कर सकता है। उसे करना भी चाहिए लेकिन उसे एकबारगी खुद को मजदूरों की जगह रखकर भी देखना चाहिए।  विरोधी दल कह रहे हैं कि सरकार ने मजदूरों के लिए अपने ही राज्य की सीमाएं सील कर दी हैं। उनका यह भी आरोप है कि सरकार चुनावी राजनीति कर रही है। सवाल यह है कि देश में मजदूर ज्यादा हैं या उद्योगपति। किसकी तरफदारी से सरकार को ज्यादा फायदा हो सकता है। लोकतंत्र में सिर मायने रखते हैं। सरकार के विरोधियों को इतनी सामान्य बात तो समझ में आनी ही चाहिए। व्यवस्था का विरोध बहुत आसान है। कोई भी कर सकता है। कहीं भी और कभी भी कर सकता है। किसी भी तरीके से कर सकता है लेकिन व्यवस्था बनाना कठिन है। इसीलिए हमारे नीति मर्मज्ञों ने कहा है कि 'मंडन में उम्र गुजर जाती, खंडन में देर न लगती है।’ जोड़ने का सुख अलग है, तोड़ने का अलग। तोड़ने वाले को जोड़ने का सुख मिले, ऐसा संभव नहीं है। इस विषम कोरोनाकाल में सब परेशान है। 
  
लॉकडाउन का चौथा चरण सामने है। हालांकि यह अब तक का सबसे छोटा लॉकडाउन है। केवल चौदह दिन का है। भगवान राम ने 14 साल का वनवास झेला था। पांडवों ने 12 साल का वनवास और एक साल का अज्ञातवास झेला था। उनके मुकाबले 14 दिन के अपने गृह में वास करने की मियाद तो कम ही है। इस बार का अज्ञातवास भी नए कलेवर में है। कोरोना जोन भी तीन से बढ़कर पांच हो गए हैं। कोरोना पीड़ितों की संख्या बढ़ ही रही है। प्रवासी मजदूर अपने गांव-जवार जाने को परेशान हैं। ज्यादातर उद्योगपतियों ने मौके की नजाकत देखते ही अपने कल-कारखानों के शटर गिरा दिए हैं। बिना काम के मजदूर वहां रहे भी तो किस तरह? मजदूरों की संख्या कम नहीं है। इतने मजदूरों को बैठाकर खिलाने की क्षमता किसी में भी नहीं है। जिन मजदूरों के खून-पसीने से अर्जित कमाई की बदौलत उद्योगपति मौज करते हैं, उन श्रमिकों के साथ उनका अमानवीय चेहरा खुलकर सामने आ गया है। वे मजदूरों को वेतन देने तक के लिए सरकार से आर्थिक पैकेज मांगने लगे हैं। एक कुलपति ने तो यहां तक कहा है कि केंद्र सरकार को देश भर के उद्योगपतियों को ऐसा आर्थिक पैकेज देना चाहिए जिससे कि वे अपने कर्मचारियों को वेतन बांट सकें। उद्योगपति लाभ की स्थिति में तो श्रमिकों की स्थिति का विचार नहीं करते। जब भी देश में आर्थिक मंदी के हालात बनते हैं तो वे सरकार पर दबाव जरूर बनाने लगते हैं। कोई भी आर्थिक विशेषज्ञ यह नहीं कहता कि कारखाना संचालकों की आय में मजदूरों को भी वाजिब हिस्सा दिया जाना चाहिए। यही नहीं, जो राजनीतिक दल सत्तारूढ़ सरकार पर उद्योगपतियों को तरजीह देने और मजदूरों, गरीबों की अनदेखी का आरोप लगाते नहीं थकते, वे भी उद्योगपतियों के खिलाफ शायद इसलिए नहीं बोलते क्योंकि राजनीतिक चंदा तो उन्हें वहीं से मिलता है। मजदूर काम कर सकता है लेकिन दाम नहीं दे सकता। गुणगान तो उसी का होता है जो दाम देता है।  वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने राहुल गांधी पर नाटक करने का आरोप लगाया है। वह मजदूरों के साथ बैठकर केवल बतिया रहे हैं, उनका समय बर्बाद कर रहे हैं। मदद तो तब होती, जब वे उनका सामान उठाकर कुछ दूर उनके साथ पैदल चलते। यह समय राजनीति करने का नहीं है। सरकार भी मजदूरों को पहुंचाना चाहती है लेकिन उसका उद्देश्य यह है कि मजदूर अपने घर सुरक्षित पहुंचें। वे अपने घर और गांव वालों के लिए कोरोना संक्रमण के संवाहक न बनें। यह तो उन राज्यों की जिम्मेदारी है कि वे प्रवासी मजदूरों को जब तक सरकारी साधन मिले तब तक भोजन और रहने का प्रबंध करें। उनकी जांच कराकर उन्हें बस में बैठाएं। बीस लाख करोड़ की मदद कम नहीं होती। सरकार मजदूरों पर ही देश का सारा धन खर्च नहीं कर सकती। उसे अन्य आपदाओं के लिए भी धन की व्यवस्था करनी है। जब एक लाख एक हजार करोड़ मनरेगा मजदूरों के हित के लिए आवंटित किया जा रहा हो तो इससे सरकार की मानसिकता का पता चलता है। कोई पार्टी 20 लाख करोड़ के पैकेज को जुमला पैकेज कैसे कह सकती है। यह तो वही बात हुई कि 'किसी ने लिखी आंसुओं की कहानी। किसी ने पढ़ा सिर्फ दो बूंद पानी।' सरकार हर क्षेत्र में  भारत को आत्मनिर्भर बनाना चाहती है और विपक्ष सिर्फ मजदूरों को लेकर चिंतित है। सरकार मजदूरों को सुरक्षित पहुंचना चाहती है और विपक्ष उसे किसी भी तरह उसके घर पहुंचा देना चाहता है।कोरोना  के मामले जिस तरह बढ़ रहे हैं,उसके मूल में प्रवासी मजदूरों की जैसे-तैसे घर पहुंचने की प्रवृत्ति ही बहुत हद तक जिम्मेदार है। मजदूरों पर सियासत करने अच्छा तो यह होगा कि उनके स्वास्थ्य का ध्यान रखा जाए। देश स्वस्थ रहेगा तभी तो आगे बढ़ेगा।



--सियाराम पांडेय शांत--

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