झारखण्ड : साठ हज़ार सालाना आय वाले राज्य में एक लाख जुर्माना - Live Aaryaavart

Breaking

प्रबिसि नगर कीजै सब काजा I ह्रदय राखि कौसलपुर राजा II, हरिजन जानि प्रीति अति गाढ़ी। सजल नयन पुलकावलि बाढ़ी॥, मंगल भवन अमंगल हारी I द्रवहु सुदसरथ अजिर बिहारी II, हरि अनंत हरि कथा अनंता I कहहि सुनहि बहुबिधि सब संता II, दीन दयाल बिरिदु संभारी । हरहु नाथ मम संकट भारी।I, माता पिता की सेवा करें....बुजुर्गों का ख्याल रखें...अपनी प्रतिभा और आचरण से देश का नाम रौशन करें...

शनिवार, 25 जुलाई 2020

झारखण्ड : साठ हज़ार सालाना आय वाले राज्य में एक लाख जुर्माना

one-lakh-fine-jharkhand
झारखंड (विजय सिंह) मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के नेतृत्व वाली झारखंड सरकार ने 22  जुलाई को संपन्न राज्य कैबिनेट की मीटिंग में मास्क नहीं पहनने ,शारीरिक / भौतिक दूरी का पालन नहीं करने या कोविड-19 नवाचार का पालन नहीं करने वाले व्यक्ति पर एक लाख रुपये तक का जुर्माना या और दो वर्ष जेल की सजा का निर्णय लिया है। हालाँकि इस निर्णय के पीछे राज्य वासियों को कोरोना कहर से बचाना और कोविड-19 के बढ़ते संक्रमण को रोकने की सरकार की मंशा को कुछ हद तक समझा जा सकता है लेकिन तीन करोड़ तीस लाख की आबादी वाले राज्य में जहाँ प्रति व्यक्ति अनुमानित सालाना आय 60,339 रुपये हों यानि लगभग पांच हज़ार रुपये प्रति माह ,वहां की जनता जब अपना पेट ही ढंग से नहीं भर पा रही हो तो एक लाख जुर्माना देना तो उसके लिए सपने में भी संभव नहीं है। कहाँ से लाएगी , गरीब जनता एक लाख रुपये,जिनका राज्य प्रति व्यक्ति आय में देश के कुल 28 राज्यों और 8 केंद्र शासित प्रदेशों में 25 वां स्थान रखता हो। विगत दिनों प्रस्तुत किये गए आर्थिक सर्वे में झारखंड में विकास दर सामान्य से भी कम बताया गया है, जहाँ 2014-15 में राज्य की औसत विकास दर 12.5 प्रतिशत से घटकर 2015-16 में -6.2 तक पहुँच गयी थी। वर्तमान में विकास दर 7.2 प्रतिशत अनुमानित है। जुलाई 2019 में  किये गए यूएनडीपी तथा ऑक्सफ़ोर्ड पोवेर्टी एंड ह्यूमन डवलपमेंट इनिशिएटिव की वैश्विक गरीबी इंडेक्स 2019 की रिपोर्ट के मुताबिक राज्य की 46.5 प्रतिशत जनता अब भी बहुआयामी गरीबी में जी रही है। ऐसे में स्वास्थ्य हितों के लिए ही सही पर एक लाख रुपये जनता जुर्माने के लिए कहाँ  ढूंढेगी ,जहाँ बीमार पड़ने पर डॉक्टर के पास जाने तक के पैसे उसके पास नहीं होते। स्वास्थ्य सुविधाओं  का हाल सर्वविदित  है। नीति निर्धारक ,सत्ता में बैठे लोग इस बात से अनजान कैसे हो सकते हैं जबकि वोट मांगने वो इसी जनता के पास जाते हैं। 'हकीक़त' से 'रूबरू' होते हैं। वो कौन से शब्द ,वाक्य ,चुनावों के दौरान प्रयोग में लाये जाते हैं जो आपसे ,आपकी बातों से ,शब्दों से ,भाषणों से ,सुझावों से प्रेरित होकर आपको मत देते हैं और सत्ता के शिखर तक पहुँचाते है। कहाँ गौण हो जाती हैं उन शब्दों - वाक्यों की शक्ति जो सत्ता मिलने के बाद यह भरोसा नहीं देते कि जनता आपकी बात , अपने भले के लिए ही , समझेगी - मानेगी जरूर। नीति निर्धारण जरूर कीजिये ,शासन का डर भी रखिये पर 'जनहित' के लिए 'जनहित' को सदृश रख कर फैसले करें तो जनता 'डर' को भी सर आँखों पर बैठायेगी।

कोई टिप्पणी नहीं: