बिहार : पहली बार चुनाव में दुसाधों ने दिखायी है ताकत - Live Aaryaavart

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गुरुवार, 29 अक्तूबर 2020

बिहार : पहली बार चुनाव में दुसाधों ने दिखायी है ताकत

  • 105 सीटों पर 15 हजार से ज्‍यादा हैं पासवान वोटर, भाजपा उम्‍मीदवार अब चिराग से मांग रहे हैं लौ
  • 55 सीटों पर 20000 से ज्‍यादा पासवान वोटर, 15 सीटों पर 30000 से ज्‍यादा पासवान वोटर

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आपने चुनाव में राजपूत, चमार, भूमिहार, गोवार की राजनीतिक ताकत की कथाएं काफी सुनी होंगी। लेकिन दुसाध की ताकत बिहार‍ विधान सभा चुनाव में पहली पर स्‍पष्‍ट रूप से दिख रही है। रामविलास पासवान ने अपने संसदीय जीवन के 50 वर्षों में दुसाध जाति को बड़ी राजनीतिक पहचान दी, ताकत दी।  वे कभी इस दल के साथ तो कभी उस दल के साथ मिलकर चुनाव लड़ते रहे, इस कारण पासवान जाति की ताकत अलग से नहीं दिखी। इस चुनाव में सबसे अलग हटकर दुसाधों की पार्टी मानी जानी वाली लोजपा अकेले चुनाव लड़ रही है। यही वजह है कि इस चुनाव में उसकी ताकत मुखर होकर सामने आयी है। लोजपा के राष्‍ट्रीय अध्‍यक्ष चिराग पासवान अमित शाह की भावनाओं और नीतीश कुमार की सत्‍ता के खिलाफ अकेले चुनाव लड़ने के लिए मैदान में उतरे हैं। तो इसकी वजह है पासवान जाति का वोट शेयर। वरिष्‍ठ पत्रकार वीरेंद्र यादव की बिहार की राजनीति पर सबसे उपयोगी पुस्‍तक ‘राजनीति की जाति’ में उपलब्‍ध आंकड़ों के अनुसार मुसलमान, यादव और चमार के बाद सबसे बड़ा वोट शेयर दुसाध जाति का है। बिहार के वोटरों में दुसाधों की हिस्‍सेदारी साढ़े पांच फीसदी है। पुस्‍तक के अनुसार, 105 विधान सीटों पर पासवान वोटरों की संख्‍या 15 हजार से अधिक है। इसको और स्‍पष्‍ट करते हुए बता दें कि इनमें से 55 सीटों पर पासवानों के वोटरों की संख्‍या 20 हजार से अधिक है, जबकि 15 सीटों पर पासवानों की संख्‍या 30 हजार से अधिक है।

बिहार की राजनीति में जिन आधा दर्जन जातियों में मतदान का प्रतिशत सबसे ज्‍यादा होता है, उसमें पासवान जाति भी शामिल है। लोजपा 136 सीटों पर अपने उम्‍मीदवार उतारे हैं। यानी 107 सीटों को भाजपा के लिए निरापद छोड़ दिया है। भाजपा से कुछेक सीटों पर ‘दोस्‍ताना दुश्‍मनी’ भी है। जिन 136 सीटों पर लोजपा ने उम्‍मीदवार दिये हैं, उन सीटों पर दुसाध जाति का अधिकतर वोट लोजपा उम्‍मीदवार के खाते में ही जाएगा, तय है। लोजपा ने उम्‍मीदवारों के चयन में धन, जन और बाहुबल का भी पूरा ख्‍याल रखा है। अनेक सीटों पर उम्‍मीदवार अपनी जाति के साथ ही अन्‍य जातियों का वोट प्रभावित करने की क्षमता रखते हैं। इसका सीधा असर गैरभाजपा एनडीए के दलों पर पड़ेगा। पहले लोजपा और भाजपा के संबंधों को आपसी ‘अंडरस्‍टैंडिंग’ माना जा रहा था। लेकिन भाजपा के वरिष्‍ठ नेताओं ने लोजपा से अपना पल्‍ला झाड़ लिया। अब इसका खामियाजा भाजपा उम्‍मीदवारों को भुगतना पड़ रहा है। जिन सीटों पर लोजपा ने अपने उम्‍मीदवार नहीं दिये हैं, उन सीटों पर दुसाध मतदाता भाजपा को वोट करेंगे, इसकी कोई गारंटी नहीं है। चिराग पासवान ने नये माहौल में भाजपा उम्‍मीदवारों के पक्ष में मतदान करने की अपील भी अपने कार्यकर्ताओं से नहीं की है। विभिन्‍न इलाकों से मिल रही खबरों के अनुसार, भाजपा के उम्‍मीदवार अब चिराग पासवान और प्रिंस पासवान से पासवानों वोटरों के समर्थन के लिए संपर्क भी कर रहे हैं। बिहार के चुनाव में पहली बार दुसाध जाति एक अलग राजनीतिक ताकत के रूप में मैदान में दिख रही है। इसके साथ ही लोजपा और चिराग पासवान का राजनीतिक भविष्‍य भी दाव पर लग गया है। दुसाधों की अलग पहचान की लड़ाई चुनाव परिणाम को कितना प्रभावित करेगा, यह तो 10 नवंबर को पता चलेगा। लेकिन इतना तय है कि चिराग पासवान की रणनीति ने एनडीए की जीत की एकतरफा उम्‍मीदों पानी फेर दिया है।



--- वीरेंद्र, संपादक, वीरेंद्र यादव न्‍यूज ---

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