अर्नब की गिरफ़्तारी ,अप्रत्याशित नहीं - Live Aaryaavart

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बुधवार, 4 नवंबर 2020

अर्नब की गिरफ़्तारी ,अप्रत्याशित नहीं

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विजय सिंह ,आर्यावर्त डेस्क ,4 नवंबर,  करवा चौथ की अहले सुबह रिपब्लिक टी वी के प्रमुख संपादक सह मालिक अर्नबगोस्वामी की मुंबई पुलिस द्वारा गिरफ़्तारी की गई। विभिन्न माध्यमों से मिली जानकारी के मुताबिक अर्नब की गिरफ़्तारी कुछ वर्ष पहले एक मामले ,जिसे मुंबई पुलिस पूर्व में बंद कर चुकी थी ,में आरोपी होने की वजह से की गई है। मामला चाहे जो भी हो ,सुबह सुबह इस खबर से जहाँ कुछ लोग चौंकें या चौंकने की कोशिश की ,वहीं ज़्यादातर लोगों को यह अप्रत्याशित नहीं लगा। यह तो होना ही था आज नहीं तो कल। जिस तरह से अर्नब ने महाराष्ट्र सरकार और पुलिस आयुक्त परमवीर सिंह के खिलाफ अपने चैनल पर मोर्चा खोल रखा था और जिस तरह से पत्रकारिता की शह में अतिवादिता की ओर बढ़ चले थे ,उस कारण वे कइयों की आँखों की किरकिरी बने हुए थे। बख़्शा तो अर्नब ने अपने पेशेवर साथियों को भी नहीं। टी आर पी की भूख ने उन्हें हर दिन 'तक - तक ' और 'लुटियंस मीडिया ' की रट लगाने का आदी बना दिया। 7 मार्च 1973 को जन्मे ,दिल्ली विश्वविद्यालय और ऑक्सफ़ोर्ड से शिक्षा प्राप्त अर्नब ने 2017 में रिपब्लिक टीवी की नींव रखने से पहले 1995 में कोलकाता में टेलीग्राफ से पत्रकारिता की शुरुआत कर 10 वर्षों (1996- 2006)तक एनडी टीवी और फिर अगले 10 वर्षों (2006- 2016) तक टाइम्स नाउ और ई टी नाउ में महत्वपूर्ण पदों पर कार्यरत रहे लेकिन रिपब्लिक को सबसे ज्यादा देखे जाने वाले चैनल कहलवाने की सनक ने अर्नब को अतिवाद की ओर धकेलते हुए पत्रकारिता से इतर भाषायी अतिवाद की ओर भी उत्प्रेरित किया। अपने चैनल में जिस तरह से अर्नब ने भाषा,डिबेट में बुलाये गए मेहमानों / प्रवक्ताओं से डांट डपट और उच्छश्रृंखल व्यवहार को नियति बनाने की  कोशिश जारी रखी ,उसकी उम्मीद अर्नब जैसे एक अनुभवी,सुलझे,जानकार पत्रकार से नहीं की जा सकती। सुशांत सिंह केस में अर्नब ने जिस तरह से दिन रात रिपोर्टिग करी - कराई ,उससे उनके समर्थकों और रिपब्लिक के दर्शकों में जरूर इज़ाफा हुआ ,महाराष्ट्र की सत्ता से परे विपक्ष का सहयोग भी मिला पर इस कारण अतिवाद की ओर चल पड़ना उचित नहीं। सार्वजनिक चर्चा है कि अर्नब को भाजपा का समर्थन है ,हो सकता है पर इससे हम अपनी जमीन छोड़ दें ,अपने ही पेशेवर साथियों,संस्थानों का मान मर्दन करें यह शोभनीय भी नहीं। सत्ता में बैठे मंत्रियों ने गिरफ़्तारी की निंदा कर ,जंगल राज बता कर ,इमरजेंसी की याद दिलाकर ,पत्रकारिता व अभिव्यक्ति की आज़ादी पर हमले का नारा वाले बयान देकर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर ली,बस। पी एम ओ ,गृह मंत्रालय ,सूचना या प्रसारण मंत्रालय ,कानून मंत्रालय अगर सीधे हस्तक्षेप करता तो बात कुछ समझ में आती। हाँ, इंटीरियर डिज़ाइनर की आत्महत्या के जिस मामले में गिरफ़्तारी बताई जा रही है ,वह जरूर जांच का विषय है।  देश के कानून और न्यायपालिका पर भरोसा रखें ,अगर कुछ गलत नहीं किया है तो डर काहे का। बाकी  पत्रकारीय पेशे की वजह से सत्ता,सरकार और प्रशासन से दो चार करना है तो इतिहास भूगोल साफ़ सुथरा रखना होगा और सबसे बड़ी बात यह समझना होगा कि तमाम विषमताओं के बावजूद अपने तो अपने होते हैं। अपनों से ही ताकत बनती है। जिस 'तक' को आप रोज लताड़ रहे थे उसने सार्वजनिक रूप से अर्नब की गिरफ़्तारी की निंदा कर पेशेगत मर्यादा का मान रखा। एडिटर्स गिल्ड व पत्रकार संगठनों ने भी गिरफ़्तारी की निंदा की है। हम भी अर्नब की गिरफ़्तारी के तरीके ,उनके साथ मार पीट व पुलिस दुर्व्यवहार की भर्त्सना करते हैं। बाकी कानून और न्यायालय है ,वह अपना काम करेगा।

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