कला और कलाकारों को जिसने सम्मान देना नहीं सीखा उसका जीवन पशुवत - Live Aaryaavart

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सोमवार, 28 दिसंबर 2020

कला और कलाकारों को जिसने सम्मान देना नहीं सीखा उसका जीवन पशुवत

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अरुण कुमार ( बेगूसराय ) हमे बचपन से ही शिक्षा दी जाती है कि जब कोई कलाकार चाहे वह किसी भी कलाक्षेत्र से हो, जब रंगमंच पर अपनी कला की प्रस्तुति दे रहा होता है तब बीच मे उठ के चले जाना भी निंदनीय माना जाता है।ऐसा करने से कला और कलाकार दोनों का ही अपमान करना हुआ ऐसा करनेवाला चाहे कोई भी हो अपराधी की श्रेणियों में आता है और उसे दण्डित करना ही न्यायोचित है। आज भारतीय शास्त्रीय संगीत के प्रसिद्ध संगीत समारोह "तानसेन संगीत समारोह" जो कि मध्य प्रदेश में मध्य प्रदेश सरकार द्वारा आयोजित किया जाता है, वहां शास्त्रीय गायक Vivek Karmahe  जी को बीच प्रस्तुति में अपना गायन समाप्त करने को कहा गया, ताकि 'ज्योतिरादित्य सिंधिया' अपना भाषण दे सके,  जिन्हें शायद कही जाने की बहुत जल्दी थी या तो समय पर उपस्थित न हो पाए थे, और तो और उन्होंने अपने भाषण में "तानपुरे" को "सितार" बोल दिया।  भारतीय शास्त्रीय संगीत हमारी प्राचीनतम धरोहर है। ऐसे राजनेता जिन्हें तानपुरा और सितार में कोई फर्क ही पता ना हो उनको आमंत्रीत किया ही नही जाना चाहिए। सुर बहुत ही सूक्ष्म होता है । शास्त्रीय गायन में बड़ा खयाल में आलाप गाते वक़्त बहुत ही एकाग्रता और ध्यान की ज़रूरत होती है। यह वह इंसान ही समझ सकता है जिन्होंने सही मायनों में सुर और संगीत की उपासना की हो। यह एक ध्यान की अवस्था होती है, और ऐसे में कोई आ कर बीच बड़ा खयाल में गायन समाप्त करने को बोले वह बहुत ही निंदनीय है ।

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