विशेष : उपद्रव हमेशा कुंद करता है जीत की राह - Live Aaryaavart

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रविवार, 10 जनवरी 2021

विशेष : उपद्रव हमेशा कुंद करता है जीत की राह

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जिसे जीतने की आदत पड़ जाए,उसे हारना न तो अच्छा लगता है और न ही वह हार को स्वीकार कर पाता है। विजेता प्रवृत्ति का व्यक्ति अपने हिसाब से दुनिया को चलाना चाहता है। वह खुद को ही सर्वोपरि समझ बैठता है। हाल के दिनों में अमेरिकी संसद में जो कुछ भी हुआ,उसे इसी अहंकार भाव की परिणिति कहा जा सकता है। दुनिया का सबसे पुराना लोकतांत्रिक देश अमेरिका शर्मसार है और वह भी अपने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के समर्थकों की उद्धत हरकतों की वजह से। लोकतंत्र में सत्ता नहीं,जनादेश मायने रखता है। जिसके साथ जनता,उसी की सत्ता। डोनाल्ड ट्रंप इस बात को मानने को तैयार नहीं हैं। अपनी हार पर उन्होंने अपनी असहमति अभी भी जाहिर की है। यह और बात है कि कैपिटल हिल में उपद्रव के बाद वे 20 जनवरी को सत्ता हस्तांतरण की बात कह चुके हैं लेकिन ऐसा करने से पूर्व जिस धैर्य की अभिव्यक्ति होनी चाहिए थी, वैसा कुछ उनके बोल—वचन से परिलक्षित नहीं हुआ। उनकी हार—जीत का निर्णय तो 3 नवंबर, 2020 को ही हो चुका था। यह और बात है कि उन्हें भी वोट कुछ कम नहीं मिले हैं। इससे साफ है कि  जनता का प्यार और समर्थन उन्हें अब भी प्राप्त है। लोकतंत्र में इसकी धारिता कम —ज्यादा तो होती ही रहती है। वे चाहते तो जनादेश का सम्मान करते हुए जनता के समर्थन और सहानुभूति का दायरा बढ़ा सकते थे लेकिन वे अपने विजयी समकक्ष और उनके दल को धमकाने में ही अपनी ऊर्जा का क्षरण करते रहे। उनकी धमकी तब सच साबित हो गई जब रिपब्लिकन पार्टी के हजारों ट्रंप समर्थकों ने अमेरिकी संंसद भवन पर हमला बोल दिया। पुलिस के साथ झड़प की और चार घंटे तक अमेरिकी संसद भवन में तहलका मचाए रखा। 


पुलिस और रिपब्लिकन पार्टी के कार्यकर्ताओं के बीच हुए संघर्ष में एक महिला और एक पुलिस अधिकारी समेत पांच लोगों की मौत हो गई। इस संदर्भ में दर्जनों कार्यकर्ता गिरफ्तार कर लिए गए।निर्वाचित राष्ट्रपति ने इस घटना की निंदा तो की ही है, यह भी कहा है कि सरकार के सहयोग के बिना हमलावर संसद में घुस ही नहीं सकते। ट्रंप के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाने और उनकी जगह उपराष्ट्रपति को कार्यकारी राष्ट्रपति का दायित्व सौंपने की मांग उठने लगी है। इसका मतलब साफ है कि ट्रंप के बुरे दिनों का आगाज हो गया है। उनके जीवन में दस्तक देने के लिए मुसीबतें पहले भी तैयार थीं और इस घटना के बाद तो ट्रंप की मुसीबतों में और अधिक इजाफा हो सकता है। इराक ने तो उनके खिलाफ  वारंट तक जारी कर दिया है। अगर ट्रंप समर्थक बगावत न करते तो इस तरह के निर्णय से पहले इराक को सौ बार सोचना होता। अमेरिकी संसद भवन में हुए हमले, तोड़—फोड़ की घटना के लिए सीधे तौर पर डोनाल्ड ट्रंप को जिम्मेदार माना जा रहा है कि तोड़—फोड़ के दौरान टीवी देखकर खुश होते ट्रंप परिवार के वॉयल वीडियो ने ट्रंप की मुश्किलें बढ़ा दी है।  उनके खिलाफ महाभियोग लाया जा सकता है। उन्हें राष्ट्रपति के पद से हटना भी पड़ सकता है। जाहिर है कि इस घटना के साथ ही ट्रंप ने जनता के बीच राष्ट्रपति बने रहने का विश्वास खो दिया है। ट्रंप और उनके समर्थक उपद्रव कर संसद की कार्रवाई तो ठप नहीं करा सके,नए राष्ट्रपति के विजय की घोषणा को रोक तो नहीं पाए लेकिन इससे राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की भविष्य की रणनीति पर पानी जरूर फिर गया।    वैसे भी अपने अतार्किक निर्णयों,मिथ्या भाषण और सनक को लेकर ट्रंप हमेशा अमेरिकियों की भी चिंता  का सबब बने रहे और अगर दुनिया के देश अमेरिका को लोकतंत्र का पाठ पढ़ा रहे हैं तो इसके लिए अमेरिकी ही बहुत हद तक जिम्मेदार हैं। वैसे भी अमेरिकी संसद पर अपनों द्वारा हमले किए जाने का 206 साल पुराना इतिहास है। 1814 में ब्रिटेन ने कैपिटल हिल पर हमला कर इस भव्य इमारत को आग के हवाले कर दिया था। अगर उस वक्त बरसात न हो गई होती तो यह इमारत पूरी तरह जल गई होती। 1950 में पोर्तो रिको के 4 कथित राष्ट्रवादियों ने अपने  द्वीप का झंडा यहां लहरा दिया था और पोर्तो रिको की आजादी का नारा लगाते हुए कई चक्र गोलियां चलाई थीं। अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप की तरह ही एक और राष्ट्रपति  व्हाइट हाउस न छोड़ने पर अड़ गए थे लेकिन उन्हें जाना ही पड़ा। ट्रंप हार तो पहले ही गए थे लेकिन संसद भवन पर समर्थकों के हमले के बाद वे पूरी तरह हार गए हैं।खुद से भी और अपनों से भी।उनके अपने जिस तरह इस्तीफे दे रहे हैं तो उसके अपने यही संदेश भी हैं।

 

गौरतलब है कि रिपब्लिकन पार्टी के 100 सांसदों ने अमेरिकी संसद भवन में हुई हिंसक घटनाओं के लिए सीधे तौर पर अपने नेता और राष्ट्रपति ट्रम्प को जिम्मेदार ठहराया है। व्हाइट हाउस के डिप्टी नेशनल सिक्योरिटी ऑफिसर, एजुकेशन मिनिस्टर और तमाम  सदस्यों ने  इस्तीफे दे दिए। जिस तरह ट्रम्प पर भारी दबाव पड़ रहा है, उसे देखते हुए संभव है कि वे कोई बड़ा फैसला लें। सीनेट स्पीकर नैंसी पेलोसी ट्रम्प पर महाभियोग चलाने की मांग कर रही हैं। डेमोक्रेट्स एक मिनट भी ट्रंप को राष्ट्रपति पद पर देखना नहीं चाहते और वे इस निमित्त उन्हें हटाए जाने की पुरजोर मांग भी कर रहे हैं। रिपब्लिकन नेताओं और ट्रम्प के कुछ कैबिनेट सहयोगियों ने ट्रम्प पर इस्तीफा देने का दबाव बनाने के लिए कई बार बैठकें की हैं। बहुत मुमकिन है कि ट्रंप सप्ताहांत तक कुर्सी छोड़ भी दें लेकिन, इसके पहले उनकी पुरजोर कोशिश खुद को पाक-साफ साबित करने की जरूर होगी। यह भी संभव है कि खुद को निर्दोष साबित करने के लिए वे कोई नया ट्रंप कार्ड खेलें। अमेरिकी संविधान के मुताबिक, राष्ट्रपति खुद की गलतियां खुद ही माफ कर सकता है। कैपिटल हिल में हुई घटनाओं के लिए दोषी करार दिए जाने से बचने के लिए ट्रंप खुद को माफ करने वाला आदेश जारी कर सकते हैं। इसका एक लाभ यह होगा कि उनके कुर्सी छोड़ने के बाद उन पर या उनके परिवार के किसी सदस्य पर मुकदमा नहीं चलाया जा सकेगा। ट्रंप ने इस बारे में अपने वकीलों और ह्वाइट हाउस के काउंसिल पैट सिल्फोने से विमर्श भी कर लिया है।। एक या दो दिन में वे इसकी घोषणा भी कर सकते हैं। एक और जहां ट्रंप पर महाभियोग लाने और उन्हें राष्ट्रपति पद से अविलंब हटाने की मांग हो रही है,वहीं अमेरिकी उपराष्ट्रपति माइक पेंस बिल्कुल नहीं चाहते कि ट्रम्प के खिलाफ संविधान के आर्टिकल 25 का इस्तेमाल कर उन्हें हटाया जाए। इस अनुच्छेद के तहत राष्ट्रपति की कैबिनेट ही उन्हें पद से हटा सकती है। लेकिन, इसके लिए वजह पुख्ता होनी चाहिए। खैर,अमेरिका में जो कुछ भी हुआ है, वह अत्यंत निंदनीय है। अमेरिका ही नहीं, दुनिया के तमाम देशों में इसकी  आलोचना हुई है। चीन ने जहां इस घटना का मजाक उड़ाया है, वहीं भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी अमेरिकी संसद में उपद्रव की निंदा की है और अमेरिका में शांतिपूर्ण ढंग से सत्ता हस्तांतरण की अपील की है।

 

अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा ने  राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पर 3 नवंबर के चुनाव परिणाम के बारे में लगातार झूठ बोलने और वाशिंगटन में कैपिटल हिल पर में हिंसा को उकसाने का आरोप लगाया है। इस घटना को लेकर तरह—तरह की बातें हो रही हैं। दूसरी ओर, इतना सब हो जाने के बाद भी ट्रंप को यकीन है कि उपराष्ट्रपति पेंस अपने अधिकारों का प्रयोग कर उनकी असहमति को यथार्थ का अमली जामा पहना सकते हैं। अमेरिका में फिलहाल जो राजनीतिक गतिरोध के हालात हैं, उसका लाभ उठाने की चीन भरपूर कोशिष कर रहा है। ऐसे में बाइडेन और ट्रंप दोनों को ही सोचना होगा कि  उन दोनों की राजनीतिक जंग का लाभ चीन न लेने पाए। उन्हें यह भी सोचना होगा कि यह मतभेद श्वेतों और अश्वेतों के बीच कलह का हेतु न बन जाए।   





--सियाराम पांडेय 'शांत'--

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