बिहार : गांव-पंचायतों ने मांगा कोरोना भत्ता-टीका और मुफ्त इलाज : खेग्रामस - Live Aaryaavart

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सोमवार, 17 मई 2021

बिहार : गांव-पंचायतों ने मांगा कोरोना भत्ता-टीका और मुफ्त इलाज : खेग्रामस

  • 500 से ज्यादा गांवों में अपने घरों से लोगों ने किया प्रतिवाद, 3 महीने के अंदर सबका टीकाकरण करो.

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पटना, अखिल भारतीय खेत व ग्रामीण मजदूर सभा के देशव्यापी आह्वान पर आज बिहार में भी 500 से ज्यादा गांव-पंचायतों व प्रखंडों में संगठन के कार्यकर्ताओं व ग्रामीण मजदूरों ने अपने - अपने घरों व कार्यालयों से प्रतिवाद किया और 3 महीने के सीमित समय के अंदर सबके लिए टीकाकरण व लाॅकडाउन भत्ता की मांग की. संगठन के महासचिव धीरेन्द्र झा ने बताया कि गांवों में तेजी से फैलते कोरोना संक्रमण के मद्देनजर एक समय सीमा के भीतर यदि सब लोगों को टीका नहीं मिल जाता, तो स्थिति नियंत्रण से बाहर चली जाएगी. खासकर, गांवों में इस अभियान में गति लानी होगी और पंचायत स्तर तक इसका विस्तार करना होगा. ग्रामीणों की मांग है कि इसके लिए सरकार को जो भी कदम उठाना पड़े वह उठाये लेकिन टीका की गारंटी करे. राज्य में आज के प्रतिवाद के दौरान सिवान में माले विधायक व खेग्रामस के सम्मानित राज्य अध्यक्ष सत्यदेव राम ने सिवान, सिकटा विधायक व संगठन के राज्य अध्यक्ष बीरेंद्र गुप्ता, फुलवारी विधायक व राज्य सचिव गोपाल रविदास, शत्रुघ्न साहनी, जीवछ पासवान, लक्ष्मी पासवान, दीनबंधु, शीला, प्रदीप, उपेंद्र पासवान, मुखिया आशा देवी, विद्यानंद बिहारी, अकलू पासवान, जितेंद्र, दिलीप सिंह, चंद्रदेव वर्मा, रामविलास यादव, जयनारायण यादव, शिवनाथ राम, रामधारी दास आदि नेताओं ने अपने-अपने जिलों में भागीदारी रही. आज के प्रतिवाद के तहत सभी प्रभावित गांव-टोलों में तत्काल मोबाइल मेडिकल टीम भेजने की भी मांग की गई. पटना में चितकोहरा में प्रदर्शन करते हुए खेग्रामस नेताओं ने कहा कि कोरोना काल में गरीब-मजदूरों की जीविका बुरी तरह से प्रभावित हुई हैं. इसलिये सभी ग्रामीण गरीब परिवारों को 10 हजार रुपये का कोरोना भत्ता भी मिलना चाहिए. फुलवारी में प्रदर्शन करते हुए गोपाल रविदास ने कहा कि कोराना काल में सभी मौतों को कंसिडर करते हुए मृतक परिजनों को 10 लाख का मुआवजा, अनाथ हुए बच्चों की सरकार की जिम्मेवारी, बिना रजिस्ट्रेशन के समय पर टीका, जांच व इलाज के लिए गांव-गांव में मोबाइल टीमों का गठन सरकार केा अविलंब करनी चाहिए. आज दुनिया की 5वीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था वाले देश में लोग ऑक्सीजन के अभाव में तड़प तड़प कर मर रहे हैं.  उत्तरप्रदेश, बिहार, उत्तराखंड, झारखंड, आंध्र सहित अन्य राज्यों में ग्रामीण क्षेत्रों में बड़ी संख्या में मौतें हो रही हैं जो देश मे दर्ज हो रही मौतों की संख्या में शामिल नही है. गांव-गांव में बड़ी संख्या में लोग सर्दी, खांसी और बुखार से पीड़ित हैं लेकिन उनके बीच जांच के लिए कोई एजेंसी नही जा रही हैं. इस स्थिति ने पूरे देश को भय और आतंक में जीने को मजबूर कर दिया है. वहीं बीमारी को लेकर जो वैज्ञानिक जागरूकता और बचाव के प्रति जरूरी सोच का घोर अभाव है. इस कठिन दौर में आशा, रसोइया, आंगनबाड़ी आदि स्कीम वर्कर्स जो फ्रंट लाइन वर्कर्स के बतौर काम कर रही हैं, उनके लिए जरूरी सुरक्षा कीट और जरूरी वाहन की कोई व्यवस्था नही है. उन्हें जीने लायक सम्मानजनक मजदूरी देने के लिये भी केंद्र व राज्य सरकारें तैयार नही हैं. कुल मिलाकर पूरा देश हेल्थ इमरजेंसी के दौर से गुजर रहा है लेकिन  हमारा तंत्र बूत की तरह खड़ा है।सरकार से लेकर पूरा सिस्टम अपाहिज हो गया है. लगता है कि देश एक गहरे पालिसी पैरालिसिस का शिकार हो गया है.

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