अनुभव : बिहार पंचायत चुनाव, लोकतंत्र पर भारी शराब-तंत्र - Live Aaryaavart

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शुक्रवार, 22 अक्तूबर 2021

अनुभव : बिहार पंचायत चुनाव, लोकतंत्र पर भारी शराब-तंत्र

ashutosh

बिहार में इन दिनों राजनीतिक पारा अपने चरम पर है। कारण है पंचायत चुनाव। गांव में मुखिया-सरपंच, बीडीसी, पंच और जिला पार्षद बनने की होड़ लगी हुई है। चुनाव जीतने के लिए प्रत्याशी मतदाताओं कुछ भी देने के लिए तैयार हैं। जिसके पास जितना वोट है, उसके लिए वैसा ही ऑफर। एलइडी, फ्रीज, मोटरसाइकिल सहित बहुत से ऑफर मतदाताओं के लिए उपलब्ध है। इन सबके बीच जो सबसे कारगर ऑफर है वह है दारू! आप सही सुन रहे हैं। मैं दारू-शराब की ही बात कर रहा हूं। बिहार से बाहर रहे है बिहारियों या दूसरे प्रदेश के लोगों को इस बात पर आश्चर्य हो सकता है क्योंकि बिहार में मद्य निषेध यानी दारू-शराब की बिक्री और उत्पादन पर पूरी तरह से पाबंदी है। 

पिछले दिनों बिहार में प्रवास करने का मौका मिला। अवसर था पंचायत चुनाव। सीवान जिला के रजनपुरा पंचायत में तकरीबन 10-12 दिन रहने का मौका मिला। यहां पर तीसरे चरण का चुनाव होना था। 8 अक्तूबर,2021 को चुनाव और 10 अक्टूबर को परिणाम। मैं 28 सितंबर को रजनपुरा पहुंचा था। चुनाव प्रचार अपने चरम पर था। लाउडस्पीकरों की गुंज से पंचायत के चप्पे-चप्पे गुंजाएमान थे। मतदान की तारीख जैसे-जैसे नजदीक आ रही थी, वैसे-वैसे चुनावी अखाड़े की रौनक बढ़ती जा रही थी। रजनपुरा, टोलापुर, सेमरी, जलालपुर और उसरहीं, इन पांच गांवों को मिलाकर रजनपुरा पंचायत बना है। इस पंचायत में कुल 7000 से ज्यादा मतदाता हैं। जिसमें 4900 के आस-पास हिन्दू और 2100 के आस-पास मुसलिम मतदाता है। चुनाव मैदान सबसे रोचक लड़ाई मुखिया और सरपंच की थी। मुखिया पद पर 5 उम्मीदवार खड़ा थे। जिसमें 3 हिन्दू और 2 मुसलमान। मुसलमान प्रत्याशी इसके पूर्व भी पंचायत के मुखिया रह चुके थे। जबकि हिन्दू प्रत्याशी में एक प्रत्याशी तीन बार चुनाव लड़े और ‘सवर्ण’ होने के कारण हारे। बाकी दो प्रत्यासी पहली बार चुनाव लड़ रहे थे। सरपंच में भी दो हिन्दू और दो मुसलिम प्रत्याशी चुनावी मैदान में थे। इस चुनाव में एक मुसलिम प्रत्याशी की पृष्ठभूमि आपराधिक थी।


चुनावी मुद्दा हिन्दू बनाम मुसलिम से लेकर सवर्ण-अवर्ण दोनों था। हिन्दू प्रत्याशी खुद को हिन्दू होने के नाते वोट मांग रहे थे, जबकि मुसलिम प्रत्याशी हिन्दुओं की एकता में सेंध लगाकर उन्हें जातियों में विभाजित करने का काम कर रहे थे। अवर्णों को यह कह कर डराया जा रहा था कि राजपूत/ब्राह्मणों को मुखिया/सरपंच बनाने से अन्याय का शासन होगा। अवर्णों को एकजुट न होने देने के लिए मुसलिम प्रत्याशियों ने शराब का सहारा लिया। इस पंचायत में हिन्दू जातियों की बात की जाए तो डोम, चर्मकार, दुसाद, नोनिया, नेटुआ, तेली, गोंड, पासी, मल्लाह, लोहार, यादव, कोयरी, कूर्मी, धोबी, राजपूत, कायस्थ, और ब्राह्मण जातियां रहती हैं। वहीं दूसरी ओर मुसलमानों के बीच में जातीय विभेद न के बराबर दिखा, हालांकि हजाम, चुड़ीहाड़ सहित तमाम जातीय विभेद मुसलमानों में भी है लेकिन चुनाव के समय वे सिर्फ मुसलमान ही दिखे, उनका जातीय चेहरा उभर कर सामने नहीं आया।


मुसलिम प्रत्याशियों ने चर्मकार, दुसाद, नोनिया और नेटुआ समुदाय के मर्दों को इलेक्शन भर दारू पिलाया। चुनाव के दो दिन पहले से इन परिवारों के घरों में रुपये भेजे जाने की सूचना मिलनी शुरू हुई। पंचायत के हिन्दू बहुल गांवों में मुसलमानों ने कुछ हिन्दुओं को जिसमें राजपूत, ब्राह्मण, कोयरी और कूर्मी जाति के थे, अपना एजेंट बनाया। इन एजेंटो का काम था वोट मैनेज करना। किसी भी तरह इन्हें वोट चाहिए था। अपने एजेंटों के माध्यम से इन्होंने हिन्दुओं के घरों में मर्दों को लिए दारू, महिलाओं के लिए साड़ी और नवजवानों के लिए मुर्गा-पार्टी की व्यवस्था कराई। मतदान के एक दिन पहले पंचायत चुनाव का सबसे बड़ा मुद्दा हिन्दू/मुसलिम, सवर्ण/अवर्ण से हटकर दारू-साड़ी और पैसा हो गया। शराब-तंत्र ने लोकतंत्र को निगल लिया। विकास का रट लगा रहे प्रत्याशी अपने घरों में दुबक गए। अगले दिन चुनाव-पर्व में भाग लेने के लिए एक तरफ ईमानदार/समझदार/विकासदार प्रत्याशियों के पक्षकार चले तो दूसरी तरफ दारू-साड़ी-पैसा और मुर्गा-पार्टी वाले अपने मालिक को जिताने के लिए निकल पड़े। मतदान शांति-पूर्वक संपन्न हुआ। दोनों पक्षों को अपने-अपने पक्ष पर पूरा भरोसा था। 10 अक्तूबर, 2021 को जिला मुख्यालय सीवान में मतगणना शुरू हुई। लोगों के सारे समीकरण फेल होने लगे। दारू-साड़ी और रुपये के आगे ईमानदारी/समझदारी और विकासदारी की एक न चली। आपराधिक पृष्ठभूमि वाले मुसलिम उम्मीदवार को पंचायत की दारुबाज और मत-बेचवा जनता ने अपना प्रधान चुन लिया। प्रधान बनने की खुशी में एक बार फिर से पंचायत के दारू-प्रेमी मदमस्त हो उठे। खुशी में पटाखे भी फोड़े। परिणाम आने के बाद गांव के बुद्धिजीवियों ने कहा कि यह तो दारू-तंत्र की जीत है। 


ध्यान देने वाली बात यह है कि अप्रैल 2016 में बिहार में पूर्ण शराबबंदी लागू की गई। तब से लेकर जनवरी 2021 तक का एक आंकड़ा कहता है कि इस दौरान शराब संबंधित दो लाख 55 हजार 111 मामले दर्ज किए गए। करीब 51.7 लाख लीटर देशी शराब और 94.9 लाख लीटर विदेशी शराब जब्त की गई। तीन लाख 39 हजार 401 की गिरफ्तारी हुई। 470 अभियुक्तों को कोर्ट से सजा मिली। सीमावर्ती राज्य और नेपाल के 5401 तस्कर गिरफ्तार किए गए। 619 पुलिसकर्मियों पर विभागीय कार्रवाई की गई। 348 कर्मचारियों पर प्राथमिकी दर्ज की गई। 186 लोगों को बर्खास्त किया गया और 60 पुलिस पदाधिकारी थानाध्यक्ष पद से हटाए गए।


उपरोक्त आंखों देखी एवं आंकड़ों का सार यह है कि शराब-तंत्र का वजन सूबे के शासन-तंत्र और राष्ट्र के लोकतंत्र से भी ज्यादा भारी सिद्ध हो रहा है। अगर ऐसा ही रहा तो तंत्र के संग-संग लोक को भी भ्रष्ट होने से नहीं बचाया जा सकेगा।  





बिहार से लौटकर आशुतोष कुमार सिंह

लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं और स्वस्थ भारत अभियान के राष्ट्रीय संयोजक हैं

संपर्क-ashutoshinmedia@gmail.com

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