बिहार : कैग की रिपोर्ट ने वित्तीय अनियमितताओं की पोल खोली - Live Aaryaavart (लाईव आर्यावर्त)

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गुरुवार, 31 मार्च 2022

बिहार : कैग की रिपोर्ट ने वित्तीय अनियमितताओं की पोल खोली

  • भ्रष्टाचार पर जीरो टाॅलरेंस का नीतीश कुमार का दावा झूठ, संस्थाबद्ध भ्रष्टाचार को दिया बढ़ावा, नीति आयोग के बाद कैग रिपोर्ट ने खोली बिहार में स्वास्थ्य व्यवस्था की पोल

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पटना 31 मार्च, भाकपा-माले राज्य सचिव कुणाल ने वित्तीय वर्ष 2020-21 से संबंधित आई कैग की रिपोर्ट पर गहरी चिंता व्यक्त की है जिसमें भारी वित्तीय अनियमितता का मामला उजागर हुआ है. उन्होंने कहा कि भ्रष्टाचार पर जीरो टाॅलरेंस का नीतीश कुमार का दावा झूठ के सिवा कुछ नहीं है. हकीकत यह है कि भाजपा-जदयू शासन में भ्रष्टाचार संस्थाबद्ध हुआ है और सरकार व उसके विभाग खर्चे का हिसाब तक नहीं दे रहे. आगे कहा कि कैग की रिपोर्ट ने गंभीर अनियमितताओं को दर्ज किया है, जिसमें सबसे प्रमुख एसी बिल के संबंध में खराब वित्तीय नियंत्रण और निकाली गई राशि के विरूद्ध उपयोगिता प्रमाण पत्र का जमा नहीं किया जाना है. कैग की रिपोर्ट के मुताबिक 2020-21 में 15911.62 करोड़ की निकाली गई राशि से संबंधित 608 उपयोगिता प्रमाण पत्र सबमिट नहीं किया जा सका. इतनी बड़ी राशि कहां खर्च हुई, इसका कोई जवाब सरकार के पास नहीं है. रिपोर्ट के अनुसार 2019-20 में 76775.69 करोड़ की निकाली गई राशि से संबंधित 3278 उपयोगिता प्रमाण पत्र भी सरकार नहीं जमा कर सकी है. इस तरह कुल मिलाकर 92687.31 करोड़ रुपये का कोई हिसाब सरकार के पास नहीं है. यह एक बड़ा घोटाला है, जिसकी जांच होनी चाहिए. जिन विभागों में यह अनियमितता चरम पर है; उनमें पंचायती राज, शिक्षा व सोशल वेलफेयर विभाग सबसे ऊपर हैं. पंचायती राज विभाग 26922.39 करोड़, शिक्षा विभाग 19212.69 करोड़ और सोशल वेलफेयर विभाग 10941.87 करोड़ का हिसाब नहीं दिखा पाई. सरकार ने 2020-21 में 6308 एसी बिल के विरूद्ध 4834.28 करोड़ की निकासी की, इसमें केवल मार्च 2021 में 1833 एसी बिल के विरूद्ध 429.32 करोड़ रुपये निकाली गई. मार्च में की गई निकासी बजट के प्रावधानों के घोर उल्लंघन और कमजोर बजटीय नियंत्रण को दिखलाती है. रिपोर्ट यह भी कहता है कि पब्लिक सर्विस के 33 यूनिट, जिन्हें विभिन्न रूपों में बजटीय सहयोग मिलता रहा है, विगत 44 वर्षों से अपने एकाउंट को फाइनल ही नहीं कर पाए हैं. यह कंपनी ऐक्ट का भी उल्लंघन है. बिहार की स्वास्थ्य व्यवस्था को लेकर भारत के नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक की रिपोर्ट ने भी यहां की बदहाल स्वास्थ्य व्यवस्था की एक बार फिर से पोल खोल दी है. नीति आयोग की रिपोर्ट ने भी इसे उजागर किया था. बिहारशरीफ, जहानाबाद, हाजीपुर, मधेपुरा और पटना के जिला अस्पतालों के बारे में लिखा है कि केवल जहानाबाद में आईसीयू है लेकिन वहां उपकरण नहीं है, नर्स, पैरामेडिक्स स्टाफ नहीं है. दवा भी नहीं है. पाँचों जिला अस्पतालों में कार्डिएक केयर यूनिट नहीं थी. स्ट्रोक और कैंसर के इलाज की कोई व्यवस्था नहीं थी. पांच जिला अस्पताल में आपात स्थिति में आपरेशन के लिए आपरेशन थियेटर तक नहीं है. यही नहीं जहां ओटी मिली है वहां पर दवा भी नहीं है. बिहार के कई जिला अस्पतालों में दस साल से बेड की संख्या नहीं बढ़ाई गई है. जो स्वीकृत संख्या है, उससे भी काफी कम बेड उपलब्ध हैं. पंजीकरण काउंटर पर मरीजों की संख्या में 13 से 208 प्रतिशत तक की वृद्धि हुई है. यही नहीं स्वीकृत पदों में से केवल 24 से 32 प्रतिशत बेड ही जिला अस्पतालों में मौजूद हैं. 59 प्रतिशत रोगियों ने अपने पैसे से दवा खरीदी। जाहिर है निरूशुल्क दवा की योजना कागज पर ही सभी के लिए है. 2014-20 तक डॉक्टर, नर्स, पैरामेडिक्स स्टाफ की लगातार कमी रही लेकिन इन पदों को भरने के लिए कुल रिक्तियों को कभी प्रकाशित नहीं किया गया. बीस साल से बिहार में भाजपा-जदयू की सरकार है. डबल इंजन की सरकार के बावजूद उसकी हालत दिन-प्रतिदिन खराब होती गई है.

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