कविता : खुद की कहानी से भी अनजान हूं - Live Aaryaavart (लाईव आर्यावर्त)

Breaking

प्रबिसि नगर कीजै सब काजा । हृदय राखि कौशलपुर राजा।। -- मंगल भवन अमंगल हारी। द्रवहु सुदसरथ अजिर बिहारी ।। -- सब नर करहिं परस्पर प्रीति । चलहिं स्वधर्म निरत श्रुतिनीति ।। -- तेहि अवसर सुनि शिव धनु भंगा । आयउ भृगुकुल कमल पतंगा।। -- राजिव नयन धरैधनु सायक । भगत विपत्ति भंजनु सुखदायक।। -- अनुचित बहुत कहेउं अग्याता । छमहु क्षमा मंदिर दोउ भ्राता।। -- हरि अनन्त हरि कथा अनन्ता। कहहि सुनहि बहुविधि सब संता। -- साधक नाम जपहिं लय लाएं। होहिं सिद्ध अनिमादिक पाएं।। -- अतिथि पूज्य प्रियतम पुरारि के । कामद धन दारिद्र दवारिके।।

शनिवार, 1 फ़रवरी 2025

कविता : खुद की कहानी से भी अनजान हूं

आखिर क्या लिखूं कहानी अपनी?

न अच्छी है और न कुछ बुरी है,

बस दुनिया की भीड़ में जीने चली हूं,

हां, बड़ी मुश्किलों से मैं ढली हूं,

आज किसी की कहानी नहीं,

खुद की कहानी सुनाऊंगी मैं,

बस कहानी लिखी है अपनी,

और आज वही कहानी सुनाऊंगी,

बेटी बेटी कह कहकर दुनिया ने,

न जाने कितनी बार टोका है मुझे,

मगर मुझ पर हुए अत्याचारों को,

क्यों किसी ने नहीं देखा है,

मैं आज सब कुछ लिखकर बताउंगी,

दर्द से भरे लम्हों को मैं फिर से दोहराऊंगी।।



Pinki-armoli-charkha-feature


पिंकी अरमोली

सुराग, उत्तराखंड

चरखा फीचर्स

कोई टिप्पणी नहीं: