पटना : सीएलए सेनानियों की अनदेखी: क्या लोकतंत्र में कुर्बानियों का भी भेदभाव? - Live Aaryaavart (लाईव आर्यावर्त)

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गुरुवार, 14 अगस्त 2025

पटना : सीएलए सेनानियों की अनदेखी: क्या लोकतंत्र में कुर्बानियों का भी भेदभाव?

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पटना, (आलोक कुमार). लोकनायक जयप्रकाश नारायण के नेतृत्व में 1974 का आंदोलन भारतीय लोकतंत्र के इतिहास में मील का पत्थर था.यह आंदोलन केवल सत्ता परिवर्तन के लिए नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा के लिए लड़ा गया था.लाखों युवाओं ने इस संघर्ष में अपनी आज़ादी कुर्बान की, जेल गए, पुलिसिया जुल्म सहे.लेकिन आज, लगभग आधी सदी बाद, सवाल उठता है – क्या इन सेनानियों के बलिदान का मूल्यांकन न्यायसंगत तरीके से हुआ? सरकार ने आपातकालीन काल में मीसा (मेंटेनेंस ऑफ इंटरनल सिक्योरिटी एक्ट) और डीआईआर (डिफेंस ऑफ इंडिया रूल्स) के तहत गिरफ्तार आंदोलनकारियों को सम्मानित करने और पेंशन देने का निर्णय लिया. उन्हें लोकतंत्र सेनानी का दर्जा मिला, यह स्वागतयोग्य कदम था.लेकिन विडंबना यह है कि उसी आंदोलन के दौरान सीएलए एक्ट 1942 के तहत जेल गए हजारों आंदोलनकारियों को दूध में मक्खी की तरह अलग कर दिया गया. प्रश्न यह नहीं है कि मीसा और डीआईआर वाले सम्मानित क्यों हुए, प्रश्न यह है कि सीएलए के तहत जेल गए सेनानी क्यों उपेक्षित रहे? क्या उनकी कुर्बानी कम थी? क्या उनकी गिरफ्तारी राजनीतिक आंदोलन का हिस्सा नहीं थी?

 

इन उपेक्षित सेनानियों के पास आज भी अपने जेल जाने के प्रमाणपत्र हैं. जॉर्ज केरोबिन, राजेश पासवान, ओमप्रकाश, नंद कुमार, सूर्य कुमार जैसे आंदोलनकारी 47 साल बाद भी सरकारी दफ्तरों के दरवाजे खटखटा रहे हैं.उनकी व्यथा साफ है। “मीसा वालों को दुलार मिला, हमें दुत्कार.क्या लोकतंत्र के लिए हमारी कुर्बानी बेकार थी?” परामर्श समिति के पूर्व सदस्य कुमार शुभमूर्ति खुद स्वीकारते हैं कि सरकार को सीएलए वालों को पेंशन देने का प्रस्ताव भेजा गया था, लेकिन नतीजा सिफर रहा.इससे बड़ा अन्याय और क्या होगा कि जो लोग लोकतंत्र बचाने के लिए जेल गए, आज उसी लोकतंत्र में अपमानित होकर जी रहे हैं. सरकारों को यह समझना होगा कि लोकतंत्र का मूल्यांकन केवल कागज़ी धाराओं से नहीं होता। मीसा, डीआईआर और सीएलए – तीनों के तहत गिरफ्तार आंदोलनकारी उसी संघर्ष का हिस्सा थे. जब मीसा और डीआईआर वालों को पेंशन मिल रही है, तो सीएलए वालों को क्यों नहीं? आज समय आ गया है कि बिहार सरकार इस भेदभाव को खत्म करे. लोकतंत्र की रक्षा में जिन्होंने अपनी जवानी जेल की सलाखों के पीछे बिताई, वे सम्मान के हक़दार हैं.सवाल सीधा है – सरकार बताए, क्या लोकतंत्र में कुर्बानियों का भी वर्गीकरण होगा?

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