इन उपेक्षित सेनानियों के पास आज भी अपने जेल जाने के प्रमाणपत्र हैं. जॉर्ज केरोबिन, राजेश पासवान, ओमप्रकाश, नंद कुमार, सूर्य कुमार जैसे आंदोलनकारी 47 साल बाद भी सरकारी दफ्तरों के दरवाजे खटखटा रहे हैं.उनकी व्यथा साफ है। “मीसा वालों को दुलार मिला, हमें दुत्कार.क्या लोकतंत्र के लिए हमारी कुर्बानी बेकार थी?” परामर्श समिति के पूर्व सदस्य कुमार शुभमूर्ति खुद स्वीकारते हैं कि सरकार को सीएलए वालों को पेंशन देने का प्रस्ताव भेजा गया था, लेकिन नतीजा सिफर रहा.इससे बड़ा अन्याय और क्या होगा कि जो लोग लोकतंत्र बचाने के लिए जेल गए, आज उसी लोकतंत्र में अपमानित होकर जी रहे हैं. सरकारों को यह समझना होगा कि लोकतंत्र का मूल्यांकन केवल कागज़ी धाराओं से नहीं होता। मीसा, डीआईआर और सीएलए – तीनों के तहत गिरफ्तार आंदोलनकारी उसी संघर्ष का हिस्सा थे. जब मीसा और डीआईआर वालों को पेंशन मिल रही है, तो सीएलए वालों को क्यों नहीं? आज समय आ गया है कि बिहार सरकार इस भेदभाव को खत्म करे. लोकतंत्र की रक्षा में जिन्होंने अपनी जवानी जेल की सलाखों के पीछे बिताई, वे सम्मान के हक़दार हैं.सवाल सीधा है – सरकार बताए, क्या लोकतंत्र में कुर्बानियों का भी वर्गीकरण होगा?
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