
लेह-लद्दाख, भारत का वह सीमावर्ती क्षेत्र जो अपनी प्राकृतिक सुंदरता, सामरिक महत्व और शांतिपूर्ण संस्कृति के लिए जाना जाता है, हाल ही में हिंसा की चपेट में आ गया। 24 सितंबर 2025 को लेह में हुई हिंसा में चार लोगों की मौत हुई और 90 से अधिक घायल हो गए। इस घटना ने पूरे देश को स्तब्ध कर दिया, क्योंकि लद्दाख जैसे शांत क्षेत्र में इतनी बड़े पैमाने पर अशांति असामान्य है। सरकार ने इस हिंसा के लिए पर्यावरण कार्यकर्ता और शिक्षाविद सोनम वांगचुक को जिम्मेदार ठहराया है, जिन्हें 26 सितंबर को राष्ट्रीय सुरक्षा अधिनियम (एनएसए) के तहत गिरफ्तार कर जोधपुर जेल भेज दिया गया। इस हिंसा की जड़ें कहीं गहरी हैं—भाजपा की राजनीतिक भूल, खुफिया एजेंसियों की विफलता, सोनम वांगचुक की संदिग्ध गतिविधियां, और चीन-पाकिस्तान जैसी शत्रु शक्तियों की साजिशें। लद्दाख की मौजूदा अशांति की शुरुआत 2019 में भारतीय जनता पार्टी के चुनावी घोषणापत्र से जुड़ी है। 2019 के लोकसभा चुनाव में भाजपा ने जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 हटाने का वादा किया था, जिसके तहत लद्दाख को केंद्रशासित प्रदेश का दर्जा दिया गया। घोषणापत्र में लद्दाख को पूर्ण राज्य का दर्जा और छठी अनुसूची के तहत पूर्ण स्वायत्तता देने का वादा भी कर लिया। छठी अनुसूची आदिवासी क्षेत्रों को विशेष अधिकार प्रदान करती है, जैसे भूमि और संसाधनों पर स्थानीय नियंत्रण, जो लद्दाख जैसे सीमावर्ती क्षेत्र में महत्वपूर्ण है जहां चीन और पाकिस्तान से खतरा हमेशा मंडराता रहता है। भाजपा की यह भूल घातक साबित हुई। 5 अगस्त 2019 को अनुच्छेद 370 हटाने के बाद लद्दाख को यूटी बनाया गया, लेकिन बिना विधानसभा के। इससे स्थानीय लोगों में असंतोष फैला, क्योंकि वे अपनी सांस्कृतिक, पर्यावरणीय और आर्थिक पहचान की रक्षा के लिए छठी अनुसूची की मांग कर रहे थे। लेह एपेक्स बॉडी और कारगिल डेमोक्रेटिक अलायंस जैसी संगठनों ने लगातार विरोध किया, लेकिन सरकार ने इन मांगों को गंभीरता से नहीं लिया। परिणामस्वरूप, सोनम वांगचुक जैसे व्यक्ति ने इस असंतोष को भुनाया और विरोध को संगठित रूप दिया। यह भाजपा की रणनीतिक चूक थी, जिसने स्थानीय भावनाओं को अनदेखा कर राष्ट्रीय सुरक्षा को खतरे में डाल दिया। सोनम वांगचुक, जिन्हें अक्सर ‘पर्यावरणविद’, शिक्षाविद’,और ‘देशभक्त वैज्ञानिक’ के रूप में प्रचारित किया जाता है, की गतिविधियां अब संदेह के घेरे में हैं। वे स्टूडेंट्स एजुकेशनल एंड कल्चरल मूवमेंट ऑफ लद्दाख (एसईसीएमओएल) नामक एनजीओ चलाते हैं, जिसका उद्देश्य शिक्षा और पर्यावरण संरक्षण है। लेकिन 2007 में केंद्र सरकार ने इस एनजीओ को नोटिस जारी कर चेतावनी दी थी। आरोप थे कि एनजीओ ने विदेशी योगदान नियमन अधिनियम (एफसीआरए) का दुरुपयोग किया, 200 कनाल भूमि पर अवैध कब्जा किया और सरकारी बकाया नहीं चुकाया। वर्ष 2007 में कांग्रेस सरकार के समय की यह चेतावनी मोदी सरकार ने भी नजरअंदाज की, और कोई ठोस कार्रवाई नहीं की गई।
हाल ही में, 24 सितंबर की हिंसा के बाद सरकार ने एसईसीएमओएल का एफसीआरए लाइसेंस रद्द कर दिया। लद्दाख के डीजीपी एसडी सिंह जमवाल ने खुलासा किया कि सोनम पाकिस्तानी इंटेलिजेंस ऑपरेटिव से संपर्क में थे। एक पाकिस्तानी व्यक्ति (पीआईओ) को गिरफ्तार किया गया, जो सोनम से जुड़ा था और सीमा पार रिपोर्टिंग कर रहा था। सोनम ने पाकिस्तान में ‘डॉन इवेंट’ में भाग लिया और बांग्लादेश की यात्रा की, जो अब जांच के दायरे में हैं। डीजीपी ने उन्हें हिंसा का मुख्य उकसावा बताया, क्योंकि उनके भाषणों में अरब स्प्रिंग और जेन-जेड प्रदर्शनों का जिक्र था, जो युवाओं को भड़का सकता था। सोनम की गतिविधियां सिर्फ पर्यावरण तक सीमित नहीं लगतीं। उन्होंने लद्दाख में भूख हड़तालें कीं, लेकिन इनके पीछे विदेशी फंडिंग और साजिश की आशंका है। इन सबसे अलग हटकर एक तथ्य बेहद महत्वपूर्ण है। भारत की खुफिया एजेंसियां, जैसे आईबी और रॉ, सीमावर्ती क्षेत्रों में सतर्कता के लिए जानी जाती हैं, लेकिन लद्दाख मामले में उनकी विफलता स्पष्ट है। पिछले वर्ष बांग्लादेश में युवाओं के हिंसक प्रदर्शन और इसी महीने नेपाल में जेन-जेड आंदोलन हुए, जो सोशल मीडिया के जरिए फैले। इनसे लद्दाख में असंतोष का अंदाजा लगाया जा सकता था, लेकिन एजेंसियां चूक गईं। चीन और पाकिस्तान की साजिशों का पता नहीं चला, जबकि लद्दाख चीन की सीमा पर है और पाकिस्तान से हमेशा खतरा रहता है। डीजीपी ने पुष्टि की कि सोनम के विदेशी दौरों की रिपोर्ट्स उपलब्ध थीं, लेकिन सुरक्षा एजेंसियां सतर्क नहीं रहीं। परिणामस्वरूप, लेह में हिंसा भड़क उठी। हिंसा के बाद नेपाल और कश्मीर के युवा पकड़े गए, जो दर्शाता है कि बाहरी तत्व शामिल थे। यह सरकार और खुफिया तंत्र की बड़ी नाकामी है, क्योंकि अगर समय पर साजिश पकड़ी जाती, तो चार मौतें और दर्जनों घायल न होते। खुफिया विफलता ने राष्ट्रीय सुरक्षा को जोखिम में डाला, और अब इसकी जांच जरूरी है।
24 सितंबर की हिंसा की जांच में पाकिस्तानी लिंक उभरे, जो दर्शाते हैं कि चीन और पाकिस्तान ने लद्दाख के असंतोष को भुनाने की कोशिश की। सोनम के भाषणों ने हिंसा को हवा दी। नेपाल और कश्मीर के युवाओं की गिरफ्तारी ने साजिश को उजागर किया। यह बांग्लादेश-नेपाल पैटर्न जैसा लगता है, जहां विदेशी तत्व युवाओं को उकसाते हैं। अगर खुफिया एजेंसियां सक्रिय होतीं, तो यह रोका जा सकता था। सोनम की गिरफ्तारी के बाद एक 'इकोसिस्टम' भी सक्रिय हो गया है, जो उन्हें समाजसेवी, शिक्षविद, देशभक्त वैज्ञानिक कहकर समर्थन कर रहा है। यह इकोसिस्टम लोकतंत्र, संविधान और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर काम करता है, लेकिन तथ्यों को अनदेखा करता है। पाक लिंक और एफसीआरए उल्लंघन को नजरअंदाज कर वे सोनम को पीड़ित दिखाते हैं, जो राष्ट्रीय सुरक्षा को कमजोर कर सकता है।
हरीश शिवनानी
(वरिष्ठ स्वतंत्र पत्रकार )
ईमेल : sahivnaniharish@gmail.com
मोबाइल : 98299210036
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