
बिहार राज्य की शिक्षा प्रणाली का सबसे चिंताजनक और विकृत पहलू वह है कि छात्र बिना किसी वास्तविक शैक्षणिक परिश्रम के, बिना एक दिन भी स्कूल या कॉलेज में शारीरिक रूप से उपस्थित हुए, आनलाइन या आनसाइट किसी भी प्रकार से गंभीरता से एक दिन भी पढ़े, यहाँ तक कि घर पर भी बिना किसी नियमित अध्ययन के, और बिना किसी प्रयोगशाला में प्रायोगिक कार्य किए, आसानी से अच्छे अंको व ग्रेड के साथ उच्चशिक्षा की भी डिग्रियाँ प्राप्त कर लेते हैं। यह स्थिति शिक्षा के मूल उद्देश्य को ही विकृत कर रही है, क्योंकि यह प्रणाली छात्रों को बिना किसी ठोस ज्ञान, समझ या आवश्यक व्यावहारिक कौशल के केवल कागजी अकादमिक उपाधियाँ प्रदान कर रही है। परिणामस्वरूप, छात्र भले ही उपाधियों के चमकदार कागजी टुकड़े हासिल कर लें, लेकिन उनके पास न तो किसी विषय का वास्तविक ज्ञान होता है और न ही किसी विशिष्ट क्षेत्र में काम करने के लिए आवश्यक व्यावहारिक कौशल। यह एक गंभीर व बेहद खतरनाक विरोधाभास है जहाँ शैक्षिक प्रमाण-पत्र तो होते हैं, लेकिन उनके पीछे कोई वास्तविक योग्यता नहीं होती। यह स्थिति युवाओं व समाज को एक ऐसे भयावह भविष्य की ओर धकेलती आ रही है, जहाँ केवल कागजी डिग्रियां होतीं हैं, लेकिन डिग्रियों के अनुरूप योग्यता और क्षमता का घोर अभाव होता है। यह एक अदृश्य अभिशाप है जो धीरे-धीरे बच्चों, किशोरों, व युवाओं की प्राकृतिक क्षमताओं और उनकी रचनात्मकता को कुचल रहा है। ऐसा समाज वास्तविक दुनिया की जटिल चुनौतियों का सामना करने में असमर्थ हो जाता है, क्योंकि समाज के लोगों के पास न तो समस्या-समाधान की क्षमता होती है और न ही नवाचार करने की प्रवृत्ति।
इस "ज्ञानविहीन डिग्री" का समाज पर अत्यधिक व्यापक और विनाशकारी प्रभाव पड़ता है। जब कार्यबल में ऐसे व्यक्तियों की संख्या बढ़ती है जिनके पास केवल डिग्री है लेकिन कौशल नहीं, तो कार्यबल की समग्र गुणवत्ता में भारी गिरावट आती है। यह सीधे तौर पर नवाचार और उत्पादकता में कमी का कारण बनता है, जिससे आर्थिक विकास बाधित होता है। बिहार से शुरू होकर अब यह केवल एक व्यक्ति की समस्या नहीं है, न ही यह केवल किसी विशेष समाज, राज्य या प्रांत तक सीमित है। बल्कि, भ्रष्टाचार की प्रवृत्ति के कारण यह फैलते हुए अंतर्राज्यीय स्तर पर भी यह एक खतरनाक व व्यापक संकट बनता जा रहा है, जो पूरे राष्ट्र और व्यापक अर्थव्यवस्था के लिए एक बहुत ही अधिक भयावह खतरा बनता जा रहा है। जब राष्ट्र के युवा अयोग्य होते हैं, तो वह राष्ट्र वैश्विक प्रतिस्पर्धा में पिछड़ जाता है। शिक्षा का यह खतरनाक खोखलापन व विध्वंस न केवल समाज के योग्य व प्रतिभाशाली लोगों के व्यक्तिगत सपनों को तोड़ता है बल्कि पूरे देश व भावी पीढ़ियों के भविष्य को अंधकारमय बना देता है। यह एक ऐसा दीमक है जो अंदर ही अंदर शिक्षा की नींव को कमजोर करता आ रहा है, यदि इसे तत्काल नहीं रोका गया, तो यह पूरी तरह से अपरिवर्तनीय अचस्था में पहुंच जाएगा।
विवेक ग्लैंडनिंग उमराव
शिक्षाविद
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