पहाड़ों की पगडंडियों पर, नंगे पाँव चलती हैं,
सवेरे सूरज संग उठकर, लकड़ियाँ बीनती हैं,
जंगल की हर झाड़ी, हर डाली को जानती हैं,
नन्हे हाथों से बोझ उठाकर, मुस्कुराकर लाती हैं,
चूल्हा जलाना, रोटियाँ सेंकना, पानी भर लाना,
माँ के संग खेतों में, धूप में भी पसीना बहाना,
गुड़िया-खिलौनों का बचपन तो कहीं खो गया,
गरीबी के संग जीवन, बस जिम्मेदारी हो गया,
स्कूल की राहें मुश्किल, सपनों पर बोझ भारी,
फिर भी आँखों में चमकती, सुनहरी एक चिंगारी,
दिनभर कामों में डूबी, फिर भी दिल से हंसती,
हर छोटी ख़ुशी को अपनी दुनिया समझ बैठती,
ये गाँव की बेटियाँ, नदियों-झरनों सी प्यारी,
संघर्षों में भी जीती, उम्मीदों की ये सवारी,
एक दिन ये चुप्पी टूटेगी, सपनों को रंग मिलेगा,
गाँव की हर बेटी का नाम, ऊँचाइयों तक जाएगा।
काजल गोस्वामी
बागेश्वर, उत्तराखंड
गांव की आवाज

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