मैं आई हूं अपना सपना लेकर,
उम्मीदों की चाहत को लेकर,
कुछ तो करना है अब मुझे भी,
तोड़कर हर रूढ़िवादी बेड़ियों को,
आगे बढ़ते जाना है मुझे भी,
परिवार की एक उम्मीद बनकर,
अपने सपनों को पूरा करना है,
सुनो! मुझे भी डॉक्टर बनना है,
ये मेरी चाहत और मेरा सपना है,
करूंगी मैं एक दिन अपना सपना पूरा,
बनूँ मैं उम्मीद की किरण और सहारा,
आंखों में कुछ सपने और हौंसला है,
सपनों की उड़ान और मंजिल को पाना है।।
शिवानी
दाबू गाँव, गरूड़
गांव की आवाज

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें