भक्ति जड़ नहीं, चेतन हो : सद्गुरु स्वतंत्रदेव जी का संदेश
महायज्ञ के समापन पर सद्गुरु आचार्य श्री स्वतंत्रदेव जी महाराज ने कहा कि मानव-जीवन का सर्वोच्च लक्ष्य आत्मोद्धार है, और इसका श्रेष्ठ मार्ग भक्ति है, लेकिन वह भक्ति जो चेतन हो, जागृत हो। उन्होंने कहा, आज की भक्ति में अज्ञान और आडंबर अधिक है। जड़ भक्ति से ऊपर उठकर चेतन भक्ति को अपनाने की आवश्यकता है। विहंगम योग वही विशुद्ध मार्ग है, जिसमें साधक विकारों से मुक्त होकर अपने शुद्ध, दिव्य स्वरूप को प्राप्त करता है।
अज्ञान ही दुखों का मूल : विज्ञानदेव जी महाराज
समापन सत्संग में संत प्रवर श्री विज्ञानदेव जी महाराज ने कहा, मनुष्य के भीतर अच्छाइयां और बुराइयां दोनों हैं, लेकिन अज्ञान उसे दुख की ओर धकेलता है। कठिनाइयों से घबराने की नहीं, उनसे उबरने की प्रेरणा अध्यात्म देता है। स्वर्वेद का स्वर साधक को वह सामर्थ्य देता है जिससे वह अपने भीतर स्थित परमात्मा के प्रकाश को पहचान सके। उनकी प्रेरणादायी वाणी साधकों के लिए आस्था ही नहीं, जीवन-संस्कार का संदेश भी बन गई।
लाखों हाथों का एक संकल्प, सेवा, सत्संग और साधना
देश-विदेश से आए लाखों अनुयायियों ने एक साथ अपने हाथ उठाकर सेवा, सत्संग और साधना का संकल्प लिया। इस क्षण ने पूरे प्रांगण को एकता, समर्पण और आध्यात्मिक संकल्प की अद्भुत ऊर्जा से भर दिया। साधकों ने यह भी संकल्प लिया कि विहंगम योग के प्रमुख ग्रंथ स्वर्वेद का संदेश जन-जन तक पहुँचाएँगे।
आरती, वंदना और शांति-पाठ से हुआ महायज्ञ का समापन
समापन आरती के दौरान मंत्रों की गूंज, दीपों की उजास और भक्तिभाव की तरंगों ने माहौल को ऐसा पवित्र बना दिया कि हर श्रद्धालु के मन में एक दिव्य शांति उतर आई।

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