बचाव पक्ष ने रिकॉर्ड के आधार पर स्पष्ट किया है कि आनंद कुमार की पोद्दार परिवार से कभी मुलाकात नहीं हुई और न ही उनका उनके साथ कोई सीधा वित्तीय लेन-देन था। पूरा सौदा सह-निर्माता राकेश जैन और पोद्दार परिवार के बीच हुआ था। जैन ने फिल्म के डिजिटल राइट्स Eros को बेचकर आर्थिक लाभ भी अर्जित किया था। 2016 की शुरुआत में जैन के निधन के बाद ही पोद्दार परिवार ने यह विवाद उठाया, जबकि जैन जीवनकाल में तथ्य स्पष्ट कर सकते थे। वर्ष 2017 में—फिल्म रिलीज़ के तीन साल बाद—पटना में मामला दर्ज किया गया, जबकि सौदा जयपुर में हुआ था। बचाव पक्ष इसे मीडिया दबाव बनाने और आनंद कुमार की बढ़ती लोकप्रियता के दौर में उनकी छवि को प्रभावित करने की रणनीति मानता है। आरोप है कि बाद की बातचीत में पोद्दार परिवार ने पहले अनैतिक मांगें रखीं और उनके ठुकराए जाने पर ₹24–25 करोड़ की भारी-भरकम मांग शुरू कर दी। बचाव पक्ष का कहना है कि नीता मेनन, जिनकी आनंद कुमार प्रोडक्शंस में कोई औपचारिक भूमिका नहीं थी, को भी अनावश्यक रूप से आरोपी बनाया गया ताकि दबाव बढ़ाया जा सके। अब जमानत मिलने के बाद मामला ट्रायल कोर्ट में आगे बढ़ रहा है और आनंद कुमार की कानूनी टीम ने उच्च न्यायालय में याचिका दायर कर इन आरोपों को निरस्त करने की मांग की है। बचाव पक्ष ने भरोसा जताया है कि न्यायपालिका तथ्यों के आधार पर न्याय जरूर करेगी।
पटना (रजनीश के झा)। फिल्म “देशी कट्टे” के निर्माता आनंद कुमार और जयपुर के पोद्दार परिवार के बीच वर्षों से चल रहा विवाद अब एक निर्णायक मोड़ पर आ गया है। आनंद कुमार और उनकी पत्नी नीता मेनन को पटना में दर्ज तीन आपराधिक मामलों में जमानत मिल चुकी है। बचाव पक्ष का कहना है कि यह पूरा विवाद मूल रूप से एक व्यावसायिक निवेश विवाद है, जिसे बेवजह आपराधिक रंग दिया गया है। उनका आरोप है कि 2014 में रिलीज़ हुई फिल्म को लेकर दर्ज ये मामले न सिर्फ तुच्छ और निराधार हैं, बल्कि निवेश विवाद को दबाव बनाने के लिए कानूनी हथियार की तरह इस्तेमाल किया गया। सूत्रों के अनुसार, पोद्दार परिवार ने फिल्म के सह-निर्माता राकेश जैन के माध्यम से फिल्म में ₹3 करोड़ निवेश करने की सहमति दी थी, लेकिन वास्तव में केवल ₹1 करोड़ ही उपलब्ध कराया। शेष ₹2 करोड़ की फंडिंग न मिलने से फिल्म के कई पोस्ट-प्रोडक्शन कार्य अधूरे रह गए, जिससे इसके प्रदर्शन पर प्रतिकूल असर पड़ा। फिल्म का कुल बजट ₹10 करोड़ से अधिक था, ऐसे में निवेश अधूरा रहने का सीधा प्रभाव फिल्म की गुणवत्ता और बाज़ार में उसकी सफलता पर पड़ा।

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