दिल्ली : भक्ति अगाध अनंत जातीय संस्कृति का पुनर्वास : अशोक वाजपेयी - Live Aaryaavart (लाईव आर्यावर्त)

Breaking

प्रबिसि नगर कीजै सब काजा । हृदय राखि कौशलपुर राजा।। -- मंगल भवन अमंगल हारी। द्रवहु सुदसरथ अजिर बिहारी ।। -- सब नर करहिं परस्पर प्रीति । चलहिं स्वधर्म निरत श्रुतिनीति ।। -- तेहि अवसर सुनि शिव धनु भंगा । आयउ भृगुकुल कमल पतंगा।। -- राजिव नयन धरैधनु सायक । भगत विपत्ति भंजनु सुखदायक।। -- अनुचित बहुत कहेउं अग्याता । छमहु क्षमा मंदिर दोउ भ्राता।। -- हरि अनन्त हरि कथा अनन्ता। कहहि सुनहि बहुविधि सब संता। -- साधक नाम जपहिं लय लाएं। होहिं सिद्ध अनिमादिक पाएं।। -- अतिथि पूज्य प्रियतम पुरारि के । कामद धन दारिद्र दवारिके।।


गुरुवार, 15 जनवरी 2026

दिल्ली : भक्ति अगाध अनंत जातीय संस्कृति का पुनर्वास : अशोक वाजपेयी

  • विश्व पुस्तक मेले में भक्ति अगाध अनंत पर चर्चा

Ashok-vajpeyee-book-fair
नई दिल्ली (रजनीश के झा)। भक्ति अगाध अनंत जैसे ग्रन्थ हमारी जातीय संस्कृति का पुनर्वास करते हैं जहां हजार साल की भारतीय कविता को देखा जा सकता है। सुप्रसिद्ध साहित्यकार अशोक वाजपेयी ने विश्व पुस्तक मेले में राजपाल एंड सन्ज़ द्वारा माधव हाड़ा के ग्रन्थ भक्ति अगाध अनंत पर आयोजित परिचर्चा में बोल रहे थे। वाजपेयी ने कहा कि भारतीय भक्ति कविता इस बात का भी प्रमाण है कि हमारे जन मानस में कविता के प्रति कैसा अनुरागपूर्ण भाव था।  उन्होंने कहा कि रज़ा न्यास माधव हाड़ा का आभारी है कि उन्होंने निर्धारित समय में अत्यंत मनोयोग से यह संचयन तैयार किया। सत्र की शुरुआत में इतिहास की अध्येता डॉ तृप्ति श्रीवास्तव ने भक्ति कविता के अखिल भारतीय स्वरूप को रेखांकित करते हुए कहा कि यह पुस्तक केवल एक संकलन नहीं, बल्कि एक ऐसा दस्तावेज़ है, जिसमें विभिन्न भाषाओं और क्षेत्रों की भक्ति कविताएँ एक साथ उपस्थित हैं। 


हिंदू कॉलेज के प्रो. रामेश्वर राय ने पुस्तक के वैचारिक महत्व पर प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि भारतीय भक्ति साहित्य की व्याख्या लंबे समय तक औपनिवेशिक दबावों के अंतर्गत होती रही है। इस पुस्तक की विशेषता यह है कि इसमें उत्तर और दक्षिण भारत—दोनों की भक्ति परंपराओं को समान रूप से स्थान मिला है। उन्होंने इसे हमारी सांस्कृतिक स्मृतियों का विस्तार बताते हुए कहा कि यह पुस्तक भारतीय समाज की आध्यात्मिक चेतना को समझने में सहायक है। युवा आलोचक पल्लव ने ने पुस्तक की रचना प्रक्रिया की चर्चा की और भक्ति अगाध अनंत जैसे संचयनों का महत्व बताते हुए कहा कि भारत जैसे बड़े सांस्कृतिक समाज में ऐसे विविधतापूर्ण संचयनों से हम अपने साहित्य को संपूर्णता से देख सकेंगे। ग्रन्थ के संपादक माधव हाड़ा ने रज़ा न्यास और राजपाल एंड संज के प्रति कृतज्ञता ज्ञापित करते हुए कहा कि भक्ति चेतना प्रागवैदिककाल से निरंतर प्रवाहमान है और उसमें कभी कोई विच्छेद नहीं आया। उन्होंने कहा कि भक्ति परलोक व्यग्र चेतना नहीं है बल्कि वह पार्थिव सरोकारों और चिंताओं की कविता है। सत्र का संचालन दिल्ली विश्वविद्यालय के डॉ धर्मेंद्र प्रताप सिंह ने किया। अंत में राजपाल एंड सन्ज़ की प्रबंध निदेशक मीरा जौहरी ने सभी का आभार प्रदर्शित किया। 

कोई टिप्पणी नहीं: