- अहंकार रहित जीवन जीने की कला सिखाती है भागवत कथा : कथा वाचक पंडित चेतन उपाध्याय

सीहोर। सत्य का अनुसरण करना, सत्संग में जाना और भगवान की भक्ति करना हर किसी के वश की बात नहीं है। श्रीमद्भागवत कथा सुनने का व्यक्ति जब संकल्प करता है, उसी समय परमात्मा उसके हृदय में आकर निवास कर लेते हैं। भगवान की कथा ऐसी है कि इसका ज्यों-ज्यों पान करते हैं, त्यों-त्यों इच्छा बढ़ती जाती है। कथा रस कभी घटता नहीं निरंतर बढ़ता रहता है। उक्त विचार शहर के प्राचीन इंदौर नाका स्थित श्री सिद्ध बटेश्वर महादेव मंदिर में सप्त दिवसीय श्रीमद्भागवत कथा के छठवें दिवस कथा वाचक पंडित चेतन उपाध्याय ने कहे। शनिवार को महारास लीला, भगवान श्रीकृष्ण के मथुरा गमन और रुक्मणी विवाह की कथा सुनाई। उन्होंने रुक्मणी द्वारा भगवान श्रीकृष्ण को लिखे गए पत्र को अटूट श्रद्धा, विश्वास और समर्पण का उदाहरण बताया। पंडित श्री उपाध्याय ने कैसे भगवान श्रीकृष्ण ने अधर्मी शिशुपाल के बीच से रुक्मणी का हरण कर उनका वरण किया। उन्होंने इस प्रसंग के माध्यम से संदेश दिया कि शरणागत की रक्षा करना ही प्रभु का परम धर्म है। छठवें दिवस भगवान श्रीकृष्ण की लीलाओं का वर्णन किया। इस मौके पर उन्होंने भगवान श्रीकृष्ण और माता रुकमणी आदि का वर्णन किया। उन्होंने कहाकि कथा का श्रवण करने से नित्य नए आनंद की अभिवृद्धि होती रहती है। श्रीमद्भागवत आध्यात्म दीपक है, जिस प्रकार एक जलते हुए दीपक से हजारों दीपक प्रज्वलित हो उठते हैं, उसी प्रकार भागवत के ज्ञान से हजारों, लाखों मनुष्यों के भीतर का अंधकार नष्ट होकर ज्ञान का दीपक जगमगा उठता है। भगवान का आश्रय ही सच्चा आश्रय है।
भगवान के चरणों में अनुराग ही ज्ञान और भक्ति का चरम उत्कर्ष
पंडित श्री उपाध्याय ने कहाकि भगवान के चरणों में अनुराग ही ज्ञान और भक्ति का चरम उत्कर्ष है। प्रत्यक्ष श्रीकृष्ण ही स्वयं वेद हैं तथा वेदों के निष्कर्ष परमात्मस्वरूप हैं। सनातन को परोसने के दो विधान हैं। स्वादिष्ट और लाभकारी। स्वादिष्ट में रस का लाभ और स्वाद तत्काल मिलता है, किंतु स्वास्थ के लिए लाभकारी पदार्थ में जिव्हा को रस भले न आए, पर संपूर्ण शरीर के सुरक्षण के लिए उसका सार्वभौम और बहुमुखी तत्वों से परिपूर्ण होना आवश्यक है। सत्संग और अन्य साधनों में यही अंतर है। साधनों के प्रारंभ और अंत में जो फलश्रुति है, वह संसार के पदार्थों में रस वृद्धि करते हैं, पर सत्संग परमार्थ का वह परम तत्व है, जिसमें साधक हृदय शुद्ध होकर सीधे ईश्वर को ही प्राप्त हो जाता है।
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