विचार : सिलाई के पीछे छुपी ज़िंदगी : क्यों भारत के मज़दूरों को उनके बनाए हुए धन में हिस्सा मिलना चाहिए - Live Aaryaavart (लाईव आर्यावर्त)

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मंगलवार, 13 जनवरी 2026

विचार : सिलाई के पीछे छुपी ज़िंदगी : क्यों भारत के मज़दूरों को उनके बनाए हुए धन में हिस्सा मिलना चाहिए

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“मेरी अपनी ग्रेजुएशन की पहली साल में शादी होगाई फिर भी अपनी पढ़ाई जारी रखा। मेरे पति और ससुराल वाले सहयोगी थे, लेकिन सहयोग ही जीवन की सुरक्षा नहीं बनता।” यह कहानी उत्तर प्रदेश के आज़मगढ़ की एक महिला गारमेंट मज़दूर की है—उन लाखों महिलाओं में से एक, जिनकी मेहनत से भारत का मैन्युफैक्चरिंग और निर्यात उद्योग चलता है, लेकिन जिनकी ज़िंदगी आज भी असुरक्षा, अलगाव और चुपचाप सहने की मजबूरी से भरी हुई है। शादी के कुछ साल बाद वह माँ बनीं। उनके पति को हथकरघा उद्योग में स्थायी काम नहीं मिल पाया। कई बार हालात ऐसे बने कि बच्चे के लिए दूध जुटाना भी मुश्किल हो गया। बढ़ती ज़िम्मेदारियों और सीमित विकल्पों के बीच उन्होंने एक बेहद कठिन फैसला लिया—अपने बच्चों को अपनी माँ के पास छोड़कर अकेले रोज़गार की तलाश में दिल्ली-एनसीआर आ गईं। फरीदाबाद पहुँचकर वह छह महीने एक दोस्त के घर रहीं। इसके बाद उन्हें भारत की सबसे बड़ी गारमेंट निर्माण कंपनियों में से एक, शाही एक्सपोर्ट्स, में काम मिला। शुरुआत में उन्हें भारी मशीनों पर लगाया गया, जहाँ उत्पादन लक्ष्य पूरा न कर पाने के कारण उन्हें काम से हटा दिया गया। लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। तीन महीने की सिलाई प्रशिक्षण लेने के बाद वे दोबारा फैक्ट्री में दर्ज़ी के रूप में लौटीं—तब उनकी तनख़्वाह थी मात्र ₹4,000 प्रति माह। आज, 11–12 साल की लगातार मेहनत के बाद, उनकी मासिक आय ₹15,000 है।


लंबे काम के घंटे, कम मज़दूरी, कोई सुरक्षा नहीं

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उनका कार्यदिवस नौ घंटे से अधिक का होता है और अक्सर 54 घंटे प्रति सप्ताह से भी ज़्यादा। भोजन के लिए सिर्फ़ आधे घंटे का अवकाश मिलता है। हर दिन उन्हें 300 कपड़ों के पीस सिलने का लक्ष्य दिया जाता है। लगातार दबाव, निगरानी और समय की मार उनके काम का हिस्सा है। जब उनसे पदोन्नति के बारे में पूछा गया तो उन्होंने बताया कि वे सुपरवाइज़र बन सकती हैं—लेकिन इसके लिए रोज़ चार घंटे अतिरिक्त काम करना होगा, वह भी बिना पर्याप्त वेतन वृद्धि के। घर पर बच्चों की ज़िम्मेदारी होने के कारण उन्होंने यह विकल्प ठुकरा दिया। उनके लिए “पदोन्नति” का मतलब था परिवार और मातृत्व का त्याग। करीब पाँच साल तक वे शहर में अकेली रहीं और महीने-दो महीने में एक बार ही बच्चों से मिलने जाती थीं। जब बच्चा पाँच साल का हुआ तो उन्हें डर सताने लगा कि कहीं बच्चे उन्हें माँ के रूप में पहचानना ही न छोड़ दें। यह भावनात्मक कीमत—जिसका कोई हिसाब नहीं—उन्हें बच्चों को अपने साथ शहर लाने पर मजबूर कर गई। बाद में उनके पति भी फरीदाबाद आ गए। आज दोनों फैक्ट्रियों में काम करते हैं। परिवार की कुल आय लगभग ₹30,000 प्रति माह है। वे श्रमिक विहार, फरीदाबाद में रहते हैं—ऐसी बस्तियाँ जो चुपचाप भारत की औद्योगिक तरक्की को सब्सिडी देती हैं।


सपने विलासिता नहीं हैं

उनकी इच्छाएँ साधारण हैं: शहर में अपना घर, निजी वाहन, बच्चों को अच्छे निजी स्कूलों में पढ़ाना, ब्रांडेड सामान खरीद पाना और कभी-कभार बाहर खाना खा पाना। ये कोई ऐशो-आराम नहीं, बल्कि आधुनिक समाज में सम्मानजनक जीवन की बुनियादी आकांक्षाएँ हैं। लेकिन जिन मज़दूरों से अपार मूल्य पैदा होता है, उनके लिए ये सपने आज भी दूर हैं।


क़ानून काग़ज़ पर, ज़मीन पर शोषण

भारत के श्रम क़ानून काग़ज़ पर उनके कई अधिकारों को मान्यता देते हैं। कारख़ाना अधिनियम, 1948 काम के घंटे और विश्राम का प्रावधान करता है। वेतन संहिता, 2019 न्यूनतम मज़दूरी की गारंटी देती है। सामाजिक सुरक्षा संहिता, 2020 पीएफ, ईएसआई, ग्रेच्युटी और पेंशन का प्रावधान करती है। मातृत्व लाभ अधिनियम, 1961 मातृत्व अवकाश और क्रेच सुविधा अनिवार्य करता है। बोनस भुगतान अधिनियम, 1965 वार्षिक बोनस का अधिकार देता है। 


लेकिन हकीकत में ये अधिकार उन तक पहुँचते ही नहीं।

उन्हें ठेकेदार के माध्यम से रखा गया है—यह व्यवस्था कंपनियों को यह सुविधा देती है कि वे अर्जित अवकाश, बीमारी की छुट्टी और आकस्मिक अवकाश न दें; तीन दिन से अधिक छुट्टी लेने पर नौकरी से निकाल दें; और बोनस, ग्रेच्युटी तथा सामाजिक सुरक्षा से वंचित रखें। क्रेच और कल्याण सुविधाओं से भी आसानी से पल्ला झाड़ लिया जाता है। यह कोई संयोग नहीं है। यह एक सुविचारित व्यवस्था है।


ट्रेड यूनियनों की चेतावनी

सीआईटीयू, एआईटीयूसी और आईएनटीयूसी जैसे वामपंथी श्रमिक संगठनों ने लंबे समय से चेताया है कि स्थायी कार्यों में ठेका प्रथा श्रम संरक्षण की भावना के ख़िलाफ़ है। उनका कहना है कि नए श्रम क़ानून निरीक्षण व्यवस्था को कमजोर करते हैं, सामूहिक सौदेबाज़ी को सीमित करते हैं और पूँजी के पक्ष में संतुलन बिगाड़ देते हैं। राजनीतिक-आर्थिक दृष्टि से यह अधिशेष मूल्य (Surplus Value) की खुली लूट है। मज़दूर जितना मूल्य पैदा करता है, उसे उसका एक छोटा सा हिस्सा मिलता है। बाकी मुनाफ़ा फैक्ट्री मालिकों, निर्यातकों, वैश्विक ब्रांडों और शेयरधारकों के पास चला जाता है। अगर मज़दूर उत्पाद बना रहे हैं, तो उन्हें अधिशेष पूँजी में हिस्सा मिलना ही चाहिए। यही मांग दुनिया भर के श्रमिक आंदोलनों की मूल आत्मा रही है—मुनाफ़े में हिस्सेदारी, जीविका योग्य मज़दूरी, सार्वभौमिक सामाजिक सुरक्षा, सुनिश्चित अवकाश और सम्मानजनक कार्य-जीवन संतुलन।


नाइट शिफ्ट और सशक्तिकरण का भ्रम

नए श्रम क़ानूनों के तहत महिलाओं को रात की शिफ्ट में काम करने की अनुमति दी गई है। लेकिन इस महिला और उनकी जैसी अन्य मज़दूर साफ़ कहती हैं—वे नाइट शिफ्ट नहीं चाहतीं। यह महत्वाकांक्षा की कमी नहीं, बल्कि सुरक्षा, परिवार और स्वास्थ्य का सवाल है। रात में यात्रा असुरक्षित है। नाइट शिफ्ट परिवार और बच्चों के साथ समय छीन लेती है। स्वास्थ्य पर इसका असर गंभीर और दीर्घकालिक होता है। अगर भारत सच में 5 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनना चाहता है, तो सिर्फ़ काम के घंटे बढ़ाकर नहीं चलेगा। उसे क़ानून-व्यवस्था, सार्वजनिक परिवहन, स्वास्थ्य और सामुदायिक देखभाल प्रणालियों में निवेश करना होगा। थकी हुई महिलाओं के कंधों पर खड़ी अर्थव्यवस्था न तो न्यायपूर्ण है, न टिकाऊ।


भारत के सामने असली सवाल

वह रोज़ नौ घंटे से ज़्यादा, हफ़्ते में छह दिन काम करती हैं। फिर भी उनके पास न सुनिश्चित छुट्टी है, न वेतन सहित अवकाश, न नौकरी की गारंटी, न मुनाफ़े में हिस्सा—और हमेशा निकाले जाने का डर। वहीं जिन कंपनियों के लिए वे काम करती हैं, वे वैश्विक बाज़ार में अरबों का व्यापार करती हैं। तो सवाल यह है उनकी मेहनत का असली लाभ किसे मिल रहा है? आर्थिक विकास उन हाथों तक क्यों नहीं पहुँचता जो उसे गढ़ते हैं? जब तक अधिशेष पूँजी का न्यायपूर्ण बँटवारा नहीं होगा, श्रम क़ानूनों को सख़्ती से लागू नहीं किया जाएगा, और मज़दूरों को केवल इनपुट नहीं बल्कि हिस्सेदार नहीं माना जाएगा—तब तक भारत की विकास कहानी अधूरी रहेगी।

यह दया की बात नहीं है।

यह अधिकार की बात है।

यह न्याय की बात है।









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सुल्तान अहमद  

डायरेक्टर ग्राम वाणी

संपर्क : 8800378111

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