बिहार सरकार के जलवायु-अनुकूल कृषि कार्यक्रम के अंतर्गत लगभग 10,924 एकड़ क्षेत्र में धान–गेहूँ प्रणाली का सतत सघनीकरण सफलतापूर्वक प्रदर्शित किया गया। आम एवं लीची आधारित बहु-स्तरीय बागवानी प्रणालियों में अंतरवर्तीय एवं पूरक फसलों के समावेशन से प्रति हेक्टेयर प्रति वर्ष ₹1.5–2.0 लाख की शुद्ध आय प्राप्त हुई। झारखंड में मनरेगा के अंतर्गत बिरसा हरित ग्राम योजना में इन मॉडलों को अपनाया गया, जिससे लगभग 1.45 लाख एकड़ क्षेत्र में 1.67 लाख परिवार लाभान्वित हुए। संस्थान ने कोयला खनन से प्रभावित क्षेत्रों के पुनर्वास हेतु कृषि वानिकी आधारित पुनर्स्थापन एवं कार्बन संचयन मॉडल विकसित किए, जिससे पारिस्थितिक पुनरुद्धार के साथ-साथ आजीविका सृजन को भी बढ़ावा मिला। धान के साथ मक्का, सोयाबीन, रागी, बाजरा एवं अरहर जैसी फसलों का विविधीकरण कर प्रणाली उत्पादकता एवं जल उत्पादकता में सुधार किया गया। संसाधन-संरक्षण आधारित सब्जी उत्पादन तकनीकों (ड्रिप फर्टिगेशन + रेज्ड बेड + पॉली मल्चिंग) से किसानों की आय ₹2.0–3.0 लाख प्रति एकड़ तक बढ़ी तथा पोषक तत्व उपयोग दक्षता एवं जल उत्पादकता में सुधार हुआ। संस्थान द्वारा विकसित सोलर सिंचाई पंप साइजिंग टूल ने भूजल दोहन को नियंत्रित करने हेतु उपयुक्त पंप चयन में सहायता प्रदान की है, जिसे नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय द्वारा पीएम-कुसुम योजना के अंतर्गत 20 राज्यों में अपनाया गया है। इसके अतिरिक्त सौर सिंचाई पंप प्रणाली, सौर ऊर्जा चालित धान मड़ाई यंत्र, कीट प्रपंच (इंसेक्ट ट्रैप), मत्स्य वेंडिंग कार्ट आदि उपकरण विकसित कर कृषि में हरित ऊर्जा के उपयोग को बढ़ावा दिया गया है।
प्राकृतिक खेती पर किए गए परीक्षणों से समय के साथ उपज में स्थिरता तथा बेहतर सहनशीलता सिद्ध हुई। वहीं, मध्य इंडो–गंगा के मैदानी क्षेत्रों में पारितंत्र सेवाओं के आकलन से यह पाया गया कि शून्य जुताई आधारित धान की सीढ़ी बुआई ने सर्वाधिक पारितंत्र सेवा मूल्य प्रदान किया। इससे सतत, संसाधन-कुशल और जलवायु-अनुकूल कृषि प्रणालियों को बढ़ावा देने में संस्थान की अग्रणी भूमिका स्पष्ट होती है। संस्थान ने 12 जलवायु-सहिष्णु धान किस्में, एक चना किस्म, 63 सब्जी किस्में, 2 बाकला किस्में तथा 6 फल किस्में विकसित कर खाद्य एवं पोषण सुरक्षा को सुदृढ़ किया है। संस्थान की विकसित किस्मों को व्यापक स्वीकृति प्राप्त हुई है। उदाहरणार्थ, धान की ‘स्वर्ण श्रेया’ किस्म 4 लाख हेक्टेयर से अधिक क्षेत्र में अपनाई गई है, जबकि परवल की ‘स्वर्ण रेखा’ एवं ‘स्वर्ण अलौकिक’ किस्में पूर्वी भारत में अत्यधिक लोकप्रिय हो चुकी हैं। पशुधन आनुवंशिक संसाधन संरक्षण के अंतर्गत पूर्णिया गाय, मेदिनी गाय, पलामू बकरी, माला मुर्गी, मैथिली बत्तख एवं कोड़ो बत्तख का पंजीकरण कराया गया। बिहार एवं झारखंड के लिए विकसित खनिज मिश्रण “स्वर्ण मिन” से पशु स्वास्थ्य में सुधार एवं दुग्ध उत्पादन में वृद्धि हुई। प्रयास (PRAYAS) तथा “कौशल से किसान समृद्धि” जैसे प्रमुख कार्यक्रमों के माध्यम से सात पूर्वी राज्यों के 18 जिलों में 18,000 से अधिक अनुसूचित जाति/जनजाति किसानों को प्रशिक्षित किया गया। एफपीओ आधारित तकनीक प्रसार मॉडल द्वारा सामूहिक तकनीक अपनाने एवं बाज़ार संपर्क सुदृढ़ करने में सहायता मिली। उत्तर-पूर्वी पर्वतीय घटक के अंतर्गत संवेदनशील पहाड़ी पारितंत्रों के लिए आवश्यकतानुसार तकनीक हस्तांतरण सुनिश्चित कर किसान–वैज्ञानिक संबंधों को मजबूत किया गया। संस्थान ने ‘विकसित कृषि संकल्प अभियान’ में अग्रणी भूमिका निभाई तथा नवाचार एवं क्षमता निर्माण के माध्यम से 5.5 लाख से अधिक किसानों को प्रत्यक्ष लाभ पहुँचाया।
संस्थान द्वारा विकसित 35 फसल किस्मों एवं 19 मॉडलों के आंशिक बजटिंग एवं आर्थिक अधिशेष पद्धति से किए गए प्रभाव आकलन में ₹15,480 करोड़ का आर्थिक प्रभाव अनुमानित किया गया। संस्थान ने कार्बन क्रेडिट फ्रेमवर्क, पारितंत्र सेवा आकलन एवं जलवायु-सहिष्णु प्राकृतिक संसाधन प्रबंधन जैसे अत्याधुनिक क्षेत्रों में अग्रणी कार्य प्रारंभ किया है। स्वदेशी बत्तखों का एआई आधारित लक्षण वर्णन, डिजिटल एवं मशीन लर्निंग उपकरणों का कृषि में अनुप्रयोग तथा सेंसर आधारित स्मार्ट जल प्रबंधन मॉडल विकसित कर संस्थान डेटा-संचालित एवं सतत कृषि नवाचार की दिशा में अग्रसर है। अपने 26वें स्थापना दिवस के अवसर पर भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद का पूर्वी अनुसंधान परिसर, पटना नवाचार को बढ़ावा देने, रणनीतिक मार्गदर्शन प्रदान करने, साक्ष्य-आधारित नीति निर्माण में सहयोग देने तथा ‘विकसित भारत’ सहित राष्ट्रीय मिशनों के अनुरूप अनुसंधान प्राथमिकताओं को संरेखित करने की अपनी अटूट प्रतिबद्धता को पुनः दोहराता है, ताकि समावेशी, अनुकूल एवं भविष्य-उन्मुख कृषि विकास सुनिश्चित किया जा सके।

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