डॉ. आशुतोष उपाध्याय, प्रभागाध्यक्ष, भूमि एवं जल प्रबंधन ने कहा कि मृदा स्वास्थ्य, जल संरक्षण और संसाधन दक्षता समेकित कृषि प्रणाली की आधारशिला हैं, जो दीर्घकालीन कृषि स्थिरता सुनिश्चित करती हैं। डॉ. कमल शर्मा, प्रभागाध्यक्ष, पशुधन एवं मात्स्यिकी प्रबंधन ने समेकित कृषि प्रणाली में पशुधन एवं मात्स्यिकी घटकों के महत्व पर प्रकाश डालते हुए बताया कि ये घटक कृषि अपशिष्ट के पुनर्चक्रण के साथ-साथ अतिरिक्त आय और रोजगार के अवसर सृजित करते हैं। डॉ. उज्ज्वल कुमार, प्रभागाध्यक्ष, सामाजिक-आर्थिक एवं प्रसार ने कहा कि समेकित कृषि प्रणाली की सफलता किसानों तक वैज्ञानिक तकनीकों के प्रभावी प्रसार, प्रशिक्षण और सहभागिता पर निर्भर करती है। पाठ्यक्रम समन्वयक डॉ. शिवानी ने कहा कि समेकित कृषि प्रणाली किसानों को फसल, पशुपालन और अन्य उद्यमों को मिलाकर संसाधनों का अधिकतम उपयोग और आय में वृद्धि करने का अवसर देती है। कार्यक्रम का संचालन पाठ्यक्रम सह निदेशक डॉ. अभिषेक कुमार, वैज्ञानिक, पटना द्वारा किया गया। अंत में वैज्ञानिक एवं पाठ्यक्रम समन्वयक डॉ. कुमारी शुभा ने धन्यवाद ज्ञापित किया।
पटना (रजनीश के झा)। सिक्किम, जो एक जैविक खेती प्रधान राज्य है, के लघु एवं सीमांत किसानों के कौशल विकास तथा क्षमता संवर्धन के उद्देश्य से भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद का पूर्वी अनुसंधान परिसर, पटना द्वारा समेकित कृषि प्रणाली विषय पर एक उन्नत प्रशिक्षण कार्यक्रम का आयोजन 02 से 06 फरवरी 2026 तक किया जा रहा है। इस कार्यक्रम में सिक्किम राज्य से कुल 27 किसान भाग ले रहे हैं, जिनमें 18 महिलाएँ शामिल हैं। इस कार्यक्रम का उद्देश्य सीमित संसाधनों के कुशलतम उपयोग के माध्यम से कृषि उत्पादन बढ़ाना, किसानों की आय में वृद्धि करना तथा टिकाऊ एवं जलवायु-अनुकूल खेती को बढ़ावा देना है। संस्थान के निदेशक डॉ. अनुप दास ने अपने अभिभाषण में सिक्किम के किसानों को उन्नत कृषि की दिशा में पहला कदम उठाने पर बधाई दी। अपने संबोधन में उन्होंने स्मार्ट खेती को अपनाने हेतु भूमि एवं जल प्रबंधन की उन्नत तकनीकों—जैसे ड्रिप सिंचाई, मल्चिंग, कृषि अपशिष्ट का पुनर्चक्रण, कम्पोस्ट निर्माण, ग्राफ्टिंग, समेकित जैविक खेती, समेकित प्राकृतिक खेती तथा कृषि-वानिकी—को अपनाने पर विशेष जोर दिया। साथ ही आय में वृद्धि एवं टिकाऊ कृषि को सुनिश्चित करने के लिए डेयरी, सुअर पालन आदि सहायक उद्यमों को कृषि प्रणाली में सम्मिलित करने की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि इसके अतिरिक्त किसानों को कम से कम ऐसे किसी एक घटक का चयन अवश्य करना चाहिए, जिससे आय में गुणात्मक वृद्धि प्राप्त की जा सके, जैसे गुणवत्तापूर्ण रोपण सामग्री का उत्पादन, स्ट्रॉबेरी की खेती, उच्च मूल्य फल फसलों का उत्पादन, मशरूम स्पॉन उत्पादन, कृषि प्रसंस्करण गतिविधियाँ आदि। कार्यक्रम के पाठ्यक्रम निदेशक एवं फसल अनुसंधान प्रभागाध्यक्ष डॉ. संजीव कुमार ने पूरे कार्यक्रम की रूपरेखा बताते हुए कहा कि कहा कि समेकित कृषि प्रणाली किसानों को आत्मनिर्भर बनाने का एक सशक्त माध्यम है । उन्होंने बताया कि यह प्रणाली कृषि के विविध पहलुओं को एक साथ जोड़कर उत्पादन क्षमता को बढ़ाती है, जिससे लघु एवं सीमांत किसानों को अधिक प्रभावी और टिकाऊ खेती अपनाने में सहायता मिलती है।

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