गाजियाबाद : मेवाड़ में समारोहपूर्वक मनाई गई महर्षि दयानंद जयंती - Live Aaryaavart (लाईव आर्यावर्त)

Breaking

प्रबिसि नगर कीजै सब काजा । हृदय राखि कौशलपुर राजा।। -- मंगल भवन अमंगल हारी। द्रवहु सुदसरथ अजिर बिहारी ।। -- सब नर करहिं परस्पर प्रीति । चलहिं स्वधर्म निरत श्रुतिनीति ।। -- तेहि अवसर सुनि शिव धनु भंगा । आयउ भृगुकुल कमल पतंगा।। -- राजिव नयन धरैधनु सायक । भगत विपत्ति भंजनु सुखदायक।। -- अनुचित बहुत कहेउं अग्याता । छमहु क्षमा मंदिर दोउ भ्राता।। -- हरि अनन्त हरि कथा अनन्ता। कहहि सुनहि बहुविधि सब संता। -- साधक नाम जपहिं लय लाएं। होहिं सिद्ध अनिमादिक पाएं।। -- अतिथि पूज्य प्रियतम पुरारि के । कामद धन दारिद्र दवारिके।।

शनिवार, 14 फ़रवरी 2026

गाजियाबाद : मेवाड़ में समारोहपूर्वक मनाई गई महर्षि दयानंद जयंती

  • संस्कारमयी शिक्षा के पक्षधर थे महर्षि दयानंद : डॉ. गदिया
  • विद्यार्थियों ने विभिन्न कार्यक्रमों में महर्षि दयानंद के जीवन व आदर्शों पर डाला प्रकाश

Maharshi-dayanand-jayanti-mewar
गाजियाबाद (रजनीश के झा)। मेवाड़ ग्रुप ऑफ इंस्टीट्यूशंस के चेयरमैन डॉ. अशोक कुमार गदिया ने कहा कि महर्षि दयानंद प्राचीन के साथ अर्वाचीन शिक्षा के भी पक्षधर थे। वह चाहते थे कि नौजवानों को भारतीय संस्कारों की शिक्षा दी जानी चाहिए। उनके विचार आज भी प्रासंगिक हैं। इन्हें अमल में लाना होगा। इन्हें अमल में लाने पर ही विश्व में व्याप्त तमाम विवादों और पाखंडों से बचा जा सकता है। उन्होंने कहा कि स्वामी दयानंद रचित ‘सत्यार्थ प्रकाश’ पुस्तक लोग एक बार जरूर पढ़ें। इससे आपका आध्यात्मिक व आंतरिक विकास होगा और आप श्रेष्ठ जीवन जीने के हकदार बनेंगे।


उन्होंने महर्षि दयानंद के जीवन चरित्र और उनके आदर्शों पर विस्तार से प्रकाश डाला। डॉ. गदिया ने कहा कि आज भी हम कुरीतियों, अंध विश्वास व रुढ़ परम्पराओं में जकड़े हुए हैं। आज भी थोथे कर्मकांड के हम शिकार हैं। वर्ण व्यवस्था आज भी कायम है। वर्ष 1875 में आर्य समाज की स्थापना के समय महर्षि दयानंद ने हरिद्वार में पाखंड खंड खंडिनी पताका गाड़कर सभी विद्वानों को शास्त्रार्थ की चुनौती दी। इसमें उन्होंने तमाम अंध विश्वासों व विरोधों को समाप्त कर स्त्री शिक्षा पर जोर दिया। वर्ण व्यवस्था, अंधविश्वास, रुढ़ परम्परा, लोभ, मोह आदि का त्याग करने की बात कही। डॉ. गदिया ने कहा कि स्वामी दयानंद महिलाओं के विकास के प्रबल पक्षधर थे। मेवाड़ ग्रुप ऑफ इंस्टीट्यूशंस की निदेशिका डॉ. अलका अग्रवाल ने कहा कि विद्यार्थी महापुरुषों की जयंतियों से प्रेरणा लें। 200 साल बाद भी जो कुरीतियां आज भी जीवित हैं उनका समूल नाश होना चाहिए। तभी नये और संगठित राष्ट्र की कल्पना की जा सकती है। स्वामी दयानंद ने कर्म को प्रधानता दी। वेदों की ओर लौटने का अभियान चलाया। 200 साल बाद भी उनके विचार आज भी प्रासंगिक हैं। समारोह की शुरुआत मां सरस्वती, भारत माता व स्वामी दयानंद सरस्वती के चित्र के समक्ष दीप जलाकर व पुष्प अर्पित करके हुई। इस मौके पर विद्यार्थियों ने सरस्वती वंदना, भजन, समूह गान, सम्भाषण, आर्य समाज के नियम, दयानंद के प्रवचन, कविता, नाटिका, स्लोगन आदि प्रस्तुत कर सबका मन मोह लिया। 

कोई टिप्पणी नहीं: