- कलेक्ट्रेट पहुंचकर राष्ट्रपति को ज्ञापन भेजा, कानून वापस लेने की मांग

सीहोर। उच्च शिक्षण संस्थानों में लागू किए गए विश्वविद्यालय अनुदान आयोग यूजीसी के नवीन नियमों के विरोध में सोमवार को स्वर्ण समाज के लोगों ने प्रदर्शन किया। इक_ा होकर जुलूस के रूप में कलेक्ट्रेट परिसर पहुंचे। उन्होंने राष्ट्रपति के नाम जिलाधिकारी के माध्यम से ज्ञापन सौंपा। ज्ञापन में यूजीसी कानून को तत्काल वापस लेने की मांग की गई। प्रदर्शन कर रहे लोगों का कहना था कि नए नियमों से समाज में भ्रम, असुरक्षा और वैमनस्य की भावना उत्पन्न हो रही है, जिससे शिक्षा का वातावरण प्रभावित हो रहा है। स्वर्ण समाज के लोगों ने आरोप लगाया कि यह कानून योग्यता आधारित शिक्षा व्यवस्था को कमजोर करता है और आने वाली पीढ़ी के भविष्य को खतरे में डालता है। इस कानून के जरिए सरकार ने छात्रों और शिक्षकों को मानसिक दबाव में डाल दिया है। उन्होंने मांग की कि इस कानून से जुड़ी भ्रांतियों का उच्च स्तर पर समाधान किया जाए, इसकी परिभाषा शिक्षण तक सीमित रहे, सभी वर्गों के छात्रों के लिए समान अवसर सुनिश्चित हों और शिकायतों की निष्पक्ष जांच के साथ समान दंड का प्रावधान लागू किया जाए। इस दौरान प्रदर्शनकारियों ने चेतावनी दी कि यदि यूजीसी कानून को वापस नहीं लिया गया, तो जनसैलाब के साथ दिल्ली पहुंचकर बड़ा आंदोलन किया जाएगा। स्वर्ण समाज के प्रतिनिधियों ने कहा कि शिक्षण संस्थान राष्ट्र निर्माण की आधारशिला हैं, उन्हें जाति आधारित प्रयोगशाला नहीं बनाया जाना चाहिए। सात सूत्रीय ज्ञापन में सविनय निवेदन है कि हम जिला सीहोर के सामान्य वर्ग के छात्र, अभिभावक, एवं जागरूक नागरिक भारत सरकार द्वारा प्रस्तावित / लागू किए जा रहे नए त्रष्ट कानून-नियमों के विरुद्ध यह ज्ञापन प्रस्तुत कर रहे हैं। शिक्षा किसी भी राष्ट्र की रीढ़ होती है। किंतु नया यूजीसी कानून शिक्षा को समान अवसर का माध्यम बनाने के बजाय वर्ग-विभाजन का औजार बनाता हुआ प्रतीत हो रहा है। यह कानून न केवल संविधान की मूल भावना के विपरीत है, बल्कि इससे लाखों छात्र/छात्राओं के भविष्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की पूर्ण आशंका है। संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) के अंतर्गत प्रत्येक नागरिक को समान अवसर प्राप्त हैं, किंतु नया यूजीसी कानून इस सिद्धांत को कमजोर और समाप्त करता है। कानून की भाषा अस्पष्ट, भ्रामक और दुरुपयोग किये जाने योग्य है. जिससे शिक्षा संस्थानों में भय वर्ग संघर्ष एवं अस्थिरता उत्पन्न होने की प्रबंध आशंका है। कानून सामान्य वर्ग के छात्रों एवं शिक्षकों को संदेह की दृष्टि से देखने की प्रवृत्ति को, उनपर अनावश्यक दबाव बनाने को बढ़ावा देता है। उच्च शिक्षा संस्थानों की स्वायत्तता एवं अकादमिक स्वतंत्रता पर सीधा आघात है। कानून योग्यता को पीछे धकेल कर वर्ग आधारित पहचान को आगे करता है, जो शिक्षा के मूल उद्देश्य के विरुद्ध है। यह कि हम स्पष्ट करना चाहते है किं: हम किसी भी जाति, वर्ग या समुदाय के विरोध में नहीं हैं। हम केवल इतना चाहते हैं कि शिक्षा नीति निष्पक्ष हो, समान हो और सभी के लिए न्यायपूर्ण हो परंतु नया यूजीसी कानून समानता नहीं, असमानता पैदा को जन्म देने वाला कानून है। समाज मे एकता नहीं, समाज को, विशेषकर मासूम छात्रों मे विभाजन को बढ़ावा देने वाला कानून है, शिक्षा में सुधार नहीं, शिक्षा में भय का वातावरण उत्पन्न करने वाला कानून है। यह कि विद्यालयों में पढ़ने वाले छात्र बुद्धि से उतने परिपक्व नही होते हैं, उनकी बुद्धि इतने उच्च स्तर की नहीं होती है कि वह अपना या किसी और का भला-बुरा भलीभांति समझ सके। ऐसे में यदि किसी छात्र द्वारा राजनीतिक प्रभाववश या किसी षड़यंत्र का शिकार होकर या क्रोध में आकर, किसी सामान्य वर्ग के छात्र पर ही झूठा आरोप लगा दिया और उस सामान्य वर्ग के छात्र पर कानूनी कार्यवाही की गई तो उसकी मानसिकता तथा भविष्य पर कितना गहरा प्रभाव पड़ेगा इसकी कल्पना करना भी मुमकिन नही है। वह छात्र जो भविष्य मे वैज्ञानिक, डॉक्टर या अन्य किसी उच्च पद पर रहकर भारत का नाम रोशन करता वहीं इस कानूनी के कारण उस छात्र का भविष्य पूर्ण रूप से अंधकार की गत मे समा जाएगा।
यह शिक्षा में भेदभाव उत्पन्न करने वाला कानून है योग्यता पर/शिक्षा संस्थानों पर किसी एक वर्ग का अधिकार नहीं, क्योकि संविधान सर्वोपरि है, यह सभी छात्रों के लिये समान है, यह कानून छात्रों को, शिक्षा को बाटने का कार्य करेगा, न कि एकजुट होने का। यह कि यह कानून संवैधानिक एवं कानूनी आधार पर सही नही है जैसे :-
(अ) यह कानून अनुच्छेद 14 समानता का अधिकार का हनन करता है।
(ब) यह कानूनी अनुच्छेद 19 (1) (ह): पेशे की स्वतंत्रता का हनन करता है।
(स) यह कानून अनुच्छेद 21 गरिमा के साथ जीवन का हनन करता है।
(द) सुप्रीम कोर्ट द्वारा इस कानून में वर्णित निमयों के अस्पष्ट एवं दुरुपयोग-योग्य होने की आशंका जताई है।
हमारी माँग:-कानूनों में समानता वाला कानून हो। सभी समाज मे एकता वाला कानून हो।, समाज को, विशेषकर मासूम छात्रों मे विभाजन नहीं हो, शिक्षा में सुधार हो तथा शिक्षा में भय का वातावरण उत्पन्न नहीं हो। आपसे विनम्र किंतु दृढ अनुरोध है कि हमारे इस ज्ञापन पर गंभीरतापूर्वक विचार कर नए कानून को समाप्त किए जाने हेतु संस्तुति प्रदान करें।
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