पूर्वांचल की धार्मिक आस्था में जौनपुर स्थित माँ शीतला चौकिया देवी मंदिर का विशेष स्थान है। यह सिद्धपीठ केवल एक प्राचीन मंदिर ही नहीं, बल्कि श्रद्धा, लोकविश्वास और पौराणिक परंपराओं का जीवंत केंद्र माना जाता है। जनश्रुति के अनुसार यहाँ विराजमान माँ शीतला को विंध्याचल धाम में विराजने वाली माँ विंध्यवासिनी की छोटी बहन माना जाता है। इसी कारण पूर्वांचल के श्रद्धालुओं के बीच यह परंपरा आज भी जीवित है कि विंध्याचल जाने से पहले चौकिया धाम में माता शीतला के दर्शन किए जाएँ। जौनपुर शहर से कुछ दूरी पर स्थित यह धाम सदियों से लोगों की आस्था का आधार बना हुआ है। मान्यता है कि यहाँ सच्चे मन से मांगी गई मुराद अवश्य पूरी होती है। मंदिर परिसर में मन्नत का धागा बाँधने की परंपरा भी इसी विश्वास की प्रतीक है। चैत्र और शारदीय नवरात्र के अवसर पर यहाँ लाखों श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ पड़ती है, जब पूरा चौकिया धाम भक्ति, श्रद्धा और उत्साह से आलोकित हो उठता है। यहाँ की प्राचीन कथाएँ, देवी के प्राकट्य की लोकगाथाएँ और भक्तों की अटूट श्रद्धा इस धाम को पूर्वांचल के प्रमुख शक्ति स्थलों में विशिष्ट पहचान प्रदान करती हैं
प्राचीनता की गवाही देता चौकिया धाम
जौनपुर शहर से लगभग 6 किमी की दूरी पर स्थित चौकिया धाम का इतिहास अत्यंत प्राचीन माना जाता है। यह स्थल अनादिकाल से शिव और शक्ति की साधना का प्रमुख केंद्र रहा है। भारतीय परंपरा में शक्ति पूजा का महत्व अत्यधिक रहा है, और इसी परंपरा की एक सशक्त अभिव्यक्ति के रूप में चौकिया धाम का उद्भव हुआ। इतिहासकारों के अनुसार प्राचीन काल में जौनपुर क्षेत्र में अहीर शासकों का शासन था। जौनपुर का पहला अहीर शासक हीरा चंद्र यादव को माना जाता है। उस समय यह क्षेत्र अनेक जनजातीय और स्थानीय समुदायों की सांस्कृतिक परंपराओं का संगम था। माना जाता है कि चौकिया देवी का मंदिर किसी समय यादवों की कुलदेवी के रूप में स्थापित किया गया होगा, किंतु इतिहास और लोकपरंपराओं के आधार पर यह संभावना अधिक प्रबल मानी जाती है कि इस मंदिर का निर्माण भर समुदाय द्वारा कराया गया था। भर समुदाय प्राचीन भारत में अनार्य परंपरा से जुड़ा माना जाता है, और अनार्य परंपराओं में शिव तथा शक्ति की उपासना प्रमुख रूप से की जाती थी। यही कारण है कि जौनपुर क्षेत्र में भरों की उपस्थिति और उनकी धार्मिक प्रवृत्तियों के आधार पर चौकिया देवी मंदिर का निर्माण उनसे जोड़ा जाता है।
शांति और शीतलता की देवी
भारतीय संस्कृति में शीतला माता को रोगों से रक्षा करने वाली और जीवन में शीतलता प्रदान करने वाली देवी माना जाता है। पौराणिक ग्रंथों में भी उनकी महिमा का वर्णन मिलता है। मार्कण्डेय पुराण में शीतला देवी के संदर्भ में प्रसिद्ध श्लोक मिलता है : —
“शीतले तू जगन्नमाता, शीतले तू जगत्पिता।
शीतले तू जगद्धात्री, शीतलाय नमो नमः॥”
इस श्लोक का अर्थ है कि शीतला देवी ही जगत की माता, पिता और धात्री हैं, अर्थात समस्त सृष्टि की पालनकर्ता हैं। इसी कारण उन्हें आनंददायिनी और शीतलता की प्रतीक देवी माना जाता है। उनके दर्शन मात्र से मानसिक शांति और आत्मिक संतोष प्राप्त होता है।
इब्राहिम शाह शर्की और मंदिर की कथा
चौकिया धाम की ऐतिहासिकता से जुड़ी एक और कथा जौनपुर के शर्की काल से जुड़ी हुई है। कहा जाता है कि जब जौनपुर के शासक इब्राहिम शाह शर्की ने गोमती नदी के किनारे स्थित विजय मंदिर को ध्वस्त करने का प्रयास किया, तो कुछ हिंदू भक्तों ने वहां स्थापित शीतला देवी की मूर्ति को सुरक्षित स्थान पर ले जाकर छिपा दिया। बताया जाता है कि वही मूर्ति बाद में देवचंदपुर क्षेत्र में स्थापित की गई, जो आज चौकिया धाम के रूप में प्रसिद्ध है। इस घटना ने इस स्थान की पवित्रता और महत्व को और भी बढ़ा दिया।
तालाब और भर समुदाय की परंपरा
चौकिया धाम के पीछे स्थित विशाल तालाब भी इस मंदिर की ऐतिहासिकता का प्रमाण माना जाता है। इतिहासकारों के अनुसार भर समुदाय तालाबों के निर्माण में विशेष रुचि रखता था। इसी कारण यह माना जाता है कि मंदिर के पास स्थित यह तालाब भी उन्हीं के द्वारा बनवाया गया होगा। आज भी श्रद्धालु मंदिर में दर्शन करने से पहले इस तालाब में स्नान करते हैं और फिर माता के दरबार में प्रवेश करते हैं।
पूर्वांचल की आस्था का प्रमुख केंद्र
चौकिया शीतला धाम केवल जौनपुर का ही नहीं, बल्कि पूरे पूर्वांचल का प्रमुख धार्मिक केंद्र है। गोरखपुर, देवरिया, बलिया, मऊ, आजमगढ़, गाजीपुर, अंबेडकरनगर और अयोध्या सहित अनेक जिलों से श्रद्धालु यहां आते हैं। मंदिर परिसर में वर्षभर पूजा-अर्चना, विवाह, मुंडन और जनेऊ संस्कार जैसे धार्मिक आयोजन होते रहते हैं।
नवरात्र में उमड़ता आस्था का सैलाब
चैत्र और शारदीय नवरात्र के समय इस मंदिर की भव्यता देखते ही बनती है। इन दिनों मंदिर परिसर में लाखों श्रद्धालुओं की भीड़ उमड़ पड़ती है। सुबह से लेकर देर रात तक दर्शन का सिलसिला चलता रहता है। भक्तजन माता को कड़ाही, चुनरी, नारियल और प्रसाद अर्पित करते हैं।
मन्नत का धागा और आस्था का विश्वास
चौकिया धाम की एक विशेष परंपरा है मन्नत का धागा बांधना। भक्तजन मंदिर में दर्शन के बाद एक धागा बांधते हैं और माता से अपनी मनोकामना पूरी होने की प्रार्थना करते हैं। जब उनकी मन्नत पूरी हो जाती है तो वे पुनः मंदिर आकर उस धागे को खोलते हैं और माता को प्रसाद चढ़ाते हैं। यह परंपरा इस मंदिर की पहचान बन चुकी है।
सोहारी और लप्सी का प्रसाद
यहां माता को विशेष रूप से सोहारी और लप्सी का प्रसाद चढ़ाने की परंपरा है। माना जाता है कि यह प्रसाद माता को अत्यंत प्रिय है और इसे अर्पित करने से भक्तों की मनोकामनाएं शीघ्र पूर्ण होती हैं।
6 करोड़ की लागत से हो रहा जीर्णोद्धार
समय के साथ मंदिर की लोकप्रियता बढ़ती गई और श्रद्धालुओं की संख्या में भी लगातार वृद्धि होती रही। इसी को देखते हुए अब चौकिया धाम का व्यापक जीर्णोद्धार किया जा रहा है। करीब 6 करोड़ रुपये की लागत से मंदिर परिसर को आधुनिक सुविधाओं से सुसज्जित किया जा रहा है। इसमें श्रद्धालुओं के लिए बेहतर व्यवस्था, मार्ग, प्रकाश व्यवस्था और अन्य सुविधाएं विकसित की जा रही हैं।
आस्था, इतिहास और संस्कृति का अद्भुत संगम
चौकिया शीतला धाम केवल एक धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि आस्था, इतिहास और संस्कृति का अद्भुत संगम है। यहां की लोककथाएं, पौराणिक संदर्भ, ऐतिहासिक घटनाएं और भक्तों का अटूट विश्वास इस स्थल को विशेष बनाते हैं। सदियों से यह मंदिर लोगों को मानसिक शांति, आध्यात्मिक शक्ति और जीवन में शीतलता प्रदान करता आया है। आज भी जब कोई श्रद्धालु चौकिया धाम में प्रवेश करता है, तो उसे ऐसा प्रतीत होता है मानो वह केवल मंदिर में नहीं, बल्कि उस आध्यात्मिक परंपरा में प्रवेश कर रहा है जो हजारों वर्षों से भारतीय संस्कृति की धड़कनों में बसती आई है।
सुरेश गांधी
वरिष्ठ पत्रकार
वाराणसी




कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें