सीहोर : आज मनाया जाएगा भगवान श्रीकृष्ण का जन्मोत्सव - Live Aaryaavart (लाईव आर्यावर्त)

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शनिवार, 14 मार्च 2026

सीहोर : आज मनाया जाएगा भगवान श्रीकृष्ण का जन्मोत्सव

  • श्रीमद्भागवत भक्ति, ज्ञान और वैराग्य का सार-महंत उद्धव दास महाराज

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सीहोर। श्रीमद्भागवत भक्ति, ज्ञान और वैराग्य का सार है।  गोकर्ण ने भी अपने पिता आत्मदेव को श्रीमद्भागवत कथा के माध्यम से भक्ति, ज्ञान और वैराग्य का उपदेश दिया था। राजा परीक्षित के बारे में विस्तार बताया, राजा परीक्षित संवाद, शुकदेव जन्म, कपिल संवाद का प्रसंग सुनाया। शुकदेव परीक्षित संवाद का वर्णन करते हुए कहा कि एक बार परीक्षित महाराज वनों में काफी दूर चले गए। उनको प्यास लगी, पास में समीक ऋषि के आश्रम में पहुंचे और बोले ऋषिवर मुझे पानी पिला दो मुझे प्यास लगी है, लेकिन समीक ऋषि समाधि में थे, इसलिए पानी नहीं पिला सके। परीक्षित ने सोचा कि इसने मेरा अपमान किया है मुझे भी इसका अपमान करना चाहिए। उसने पास में से एक मरा हुआ सर्प उठाया और समीक ऋषि के गले में डाल दिया। यह सूचना पास में खेल रहे बच्चों ने समीक ऋषि के पुत्र को दी। ऋषि के पुत्र ने नदी का जल हाथ में लेकर शाप दे डाला जिसने मेरे पिता का अपमान किया है आज से सातवें दिन तक्षक नामक सर्प पक्षी आएगा और उसे जलाकर भस्म कर देगा। उक्त विचार जायसवाल परिवार के औंकार प्रसाद जायसवाल एवं समस्त सनातन प्रेमी भक्तजन तत्वाधान में शहर के महिला घाट गंगेश्वर महादेव शनि मंदिर परिसर नदी चौराहे पर सात दिवसीय श्रीमद भागवत कथा में ब्रह्मलीन श्री त्यागी महाराज के शिष्य महंत उद्धव दास महाराज ने कहाकि जब भी भक्त पर संकट आता है। भगवान उसकी रक्षा करने के लिए अवतार लेते है।


उन्होंने कहाकि जिस प्रकार रामायण हमें जीना सिखाती है, महाभारत हमें रहना और गीता हमें कार्य करने का उपदेश देती है उसी प्रकार भागवत कथा का सबसे बड़ा लाभ यह है कि यह हमें मरना सिखाती है। हमें जीवन के अंत समय में किस तरह और क्या कार्य करने चाहिए इस कथा से सीखने को मिलता हैं। कथा के पहले दिन उन्होंने तीन अध्यायों के माध्यम से जीवन प्रबंधन के बारीक गुर सिखाएं। जीवन में आने वाली समस्याओं से भागता है, उसे समस्याएं अपने नजदीक खींच लेती है इसलिए भागवत उपदेश देती है की समस्याओं से भाग मत यानी इन समस्याओं पर विजय प्राप्त करे। शनिवार को कथा के तीसरे दिन भगवान राम के नाम के प्रभाव के बारे में बताया कि राम ने तो केवल एक अहिल्या का उद्धार किया पर रामजी के नाम सुमिरन से करोड़ों जीवों का कल्याण हो गया। राम सेतु निर्माण के समय भगवान का नाम लिखने से पत्थर भी तैर जाते हैं। रामजी के भजन के साथ माता, पिता, सास, ससुर की सेवा करें, यही सच्चा पुण्य है। जिसके साथ कोई नहीं होता है, उसके साथ ईश्वर होता है। शबरी बनकर बैठों राम अवश्य मिलेगा। दया धर्म का मूल है, जब हमारे अंदर दया और विनम्रता आती है, तभी हमें भगवान की प्राप्ति होती है। विनम्रता मनुष्य के व्यक्तित्व का आभूषण है। इसके माध्यम से हमारा व्यक्तित्व खूबसूरत बनता है, क्योंकि विनम्र होकर ही हम पात्रता अर्जित कर सकते हैं। विनम्र होकर हम ग्रहण करना सीखते हैं और विनम्रता के कारण ही हम दूसरों से जुड़ पाते हैं। भारतीय संस्कृति में इसी विनम्रता को व्यक्त करने के लिए प्रणाम और अभिवादन करने की परंपरा है।

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