वाराणसी : श्रृंगार गौरी के चरणों में नत हुई काशी, उमड़ी आस्था की धार - Live Aaryaavart (लाईव आर्यावर्त)

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रविवार, 22 मार्च 2026

वाराणसी : श्रृंगार गौरी के चरणों में नत हुई काशी, उमड़ी आस्था की धार

  • साल में एक बार खुलते हैं मां श्रृंगार गौरी के द्वार, भोर से देर रात तक लगी रही कतारें
  • हर-हर महादेव” और “जय माता दी” से गूंजा विश्वनाथ धाम, परंपरा, आस्था, अनुशासन का अद्भुत संगम बना नवरात्र का चतुर्थ दिवस

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वाराणसी (सुरेश गांधी)। चैत्र नवरात्रि के चतुर्थ दिवस पर काशी एक बार फिर भक्ति, परंपरा और आध्यात्मिक ऊर्जा के अद्वितीय रंग में रंगी नजर आई। या यूं कहे काशी ने रविवार को वह दिव्य क्षण फिर जिया, जिसका इंतजार श्रद्धालु पूरे वर्ष करते हैं। चैत्र नवरात्रि के चतुर्थ दिवस पर श्री काशी विश्वनाथ धाम स्थित मां श्रृंगार गौरी के दर्शन के लिए जैसे ही पट खुले, भोर की पहली आहट के साथ ही आस्था का जनसैलाब उमड़ पड़ा। सुबह चार बजे से लगी कतारें देर रात तक अनवरत बढ़ती रहीं, मानो पूरा शहर मां के चरणों में समर्पित हो गया हो। शहर के कोने-कोने से ही नहीं, बल्कि दूर-दराज से आए श्रद्धालुओं ने माता के दर्शन के लिए अद्भुत संयम और अनुशासन का परिचय दिया। “जय माता दी” के उद्घोष के बीच पूरा वातावरण भक्तिमय हो उठा। मैदागिन से लेकर चौक और गोदौलिया तक हर रास्ता श्रद्धालुओं की लंबी पंक्तियों से पटा रहा. हर चेहरे पर भक्ति, हर कदम में धैर्य और हर स्वर में “हर-हर महादेव” व “जय माता दी” की गूंज, काशी का यह दृश्य किसी आध्यात्मिक महाकुंभ से कम नहीं था। विशेष बात यह रही कि वर्षभर में केवल एक दिन मिलने वाली इस दुर्लभ अनुमति के कारण श्रद्धालुओं का उत्साह चरम पर दिखा। ज्ञानवापी परिसर की पश्चिमी दीवार से सटे चबूतरे पर विराजमान मां श्रृंगार गौरी के दर्शन का यह अवसर काशी की सनातन परंपरा का जीवंत प्रतीक है। मान्यता है कि माता के दर्शन से सुख, समृद्धि और सौभाग्य की प्राप्ति होती है। यही कारण है कि दूर-दराज से आए श्रद्धालुओं ने घंटों कतार में रहकर भी अद्भुत संयम और अनुशासन का परिचय दिया। इस पावन अवसर पर श्री काशी विश्वनाथ धाम में विशेष अनुष्ठान भी संपन्न हुए। भगवान विश्वेश्वर को साक्षी मानते हुए मंदिर के आचार्यों द्वारा मां श्रृंगार गौरी एवं शक्तिपीठ माता विशालाक्षी को वस्त्र और श्रृंगार सामग्री अर्पित की गई। यह परंपरा न केवल आस्था का प्रतीक है, बल्कि काशी की सांस्कृतिक निरंतरता का भी सशक्त उदाहरण है।


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आस्था के इस महासंगम में सांस्कृतिक रंग भी पूरे शबाब पर नजर आए। मैदागिन स्थित गुरु गोरक्षनाथ मंदिर से निकली भव्य शोभायात्रा में पीले और लाल परिधान में सजी महिलाएं धर्म ध्वजा थामे, चैती और पचरा गीत गाती हुईं विश्वनाथ धाम पहुंचीं। लोकगीतों की मधुरता और जयकारों की ऊंची गूंज ने पूरे मार्ग को भक्तिरस में डुबो दिया। इस अवसर पर न्यायालय में नियमित पूजा की पैरवी कर रही चारों वादिनी महिलाएं भी श्रद्धालुओं के साथ दर्शन में शामिल हुईं। यह दृश्य आस्था और अधिकार के संतुलन का प्रतीक बनकर सामने आया। सुरक्षा की दृष्टि से प्रशासन पूरी तरह सतर्क नजर आया। संवेदनशीलता को देखते हुए भारी संख्या में पुलिस बल तैनात किया गया, विशेष रूट प्लान लागू हुआ और कड़े सुरक्षा मानकों के बीच दर्शन की व्यवस्था कराई गई। इसके बावजूद व्यवस्था इतनी सुसंगठित रही कि कहीं भी अव्यवस्था या असुविधा की स्थिति उत्पन्न नहीं हुई। 1992 से बंद रहा मंदिर, दो साल पहले कोर्ट के आदेश पर खोला गया. मतलब साफ है, इतिहास के पन्नों में भी इस मंदिर की अपनी अलग महत्ता है। 1992 से पहले यहां नियमित पूजा होती थी, लेकिन बाद में इसे सीमित कर दिया गया। आज भी नियमित पूजा की अनुमति को लेकर न्यायालय में वाद चल रहा है। इसके बावजूद वर्ष में एक दिन मिलने वाला यह अवसर काशीवासियों के लिए किसी महापर्व से कम नहीं। सालडा समाज सेवा फाउंडेशन द्वारा भी परंपरा के अनुसार मां का विशेष श्रृंगार, भोग और आरती कराई गई। डमरू दल द्वारा श्रृंगार सामग्री अर्पित कर भक्तों में वितरित की गई, जिससे वातावरण और भी भक्तिमय हो उठा।


काशी ने एक बार फिर साबित कर दिया, यह केवल एक शहर नहीं, बल्कि आस्था की वह अनंत धारा है, जहां वर्ष में एक दिन मां के दर्शन भी जीवन भर की साधना बन जाते हैं। इस पावन अवसर पर श्री काशी विश्वनाथ धाम में विशेष धार्मिक अनुष्ठान भी सम्पन्न हुए। मंदिर के शास्त्रियों द्वारा विधिपूर्वक भगवान विश्वेश्वर का पूजन कर उन्हें साक्षी मानते हुए माता श्रृंगार गौरी तथा शक्तिपीठ माता विशालाक्षी को अर्पित करने हेतु वस्त्र एवं श्रृंगार सामग्री समर्पित की गई। यह परंपरा न केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक है, बल्कि काशी की सनातन संस्कृति और शास्त्रीय विधानों के संरक्षण का भी सजीव उदाहरण है। मंदिर प्रशासन द्वारा की गई व्यवस्थाएं पूरी तरह सुव्यवस्थित और प्रभावी रहीं। सुरक्षा, कतार प्रबंधन और दर्शन की प्रक्रिया इतनी संतुलित रही कि हजारों श्रद्धालुओं की भीड़ के बावजूद कहीं भी अव्यवस्था या असुविधा का कोई दृश्य नहीं देखने को मिला। प्रशासन और स्वयंसेवकों की सक्रियता ने आयोजन को शांतिपूर्ण और सफल बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। नवरात्र के इस चतुर्थ दिवस ने एक बार फिर यह सिद्ध कर दिया कि काशी में आस्था केवल पूजा का माध्यम नहीं, बल्कि जीवन की धड़कन है। यहां हर पर्व सामाजिक समरसता, सांस्कृतिक निरंतरता और आध्यात्मिक चेतना का जीवंत उत्सव बन जाता है। आगामी दिनों में भी नवरात्र के क्रम में माता गौरी के विभिन्न स्वरूपों को समर्पित तिथियों पर, श्री विश्वेश्वर से अवलोकित कराए गए वस्त्र और श्रृंगार सामग्री उपहार स्वरूप अर्पित किए जाएंगे। यह परंपरा काशी की उस अखंड धार्मिक विरासत को सहेजने का प्रयास है, जो पीढ़ियों से निरंतर प्रवाहित हो रही है। निस्संदेह, यह आयोजन केवल एक धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि काशी की आत्मा में बसे सनातन विश्वास, अनुशासन और सामूहिक आस्था का भव्य प्रतीक बनकर उभरा है..

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