दिल्ली : टीबी उन्मूलन की कुंजी: छूटे हुए मरीजों की पहचान : डॉ. एस. के. अरोड़ा - Live Aaryaavart (लाईव आर्यावर्त)

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सोमवार, 23 मार्च 2026

दिल्ली : टीबी उन्मूलन की कुंजी: छूटे हुए मरीजों की पहचान : डॉ. एस. के. अरोड़ा

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नई दिल्ली (अशोक कुमार निर्भय)। देश में तपेदिक (टीबी) आज भी एक गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य चुनौती के रूप में मौजूद है, जबकि यह पूरी तरह से रोके जाने और इलाज योग्य बीमारी है। विशेषज्ञों का मानना है कि टीबी उन्मूलन की दिशा में सबसे बड़ी बाधा वे मरीज हैं जो समय पर पहचान में नहीं आ पाते। इन्हें “छूटे हुए मरीज” कहा जाता है, जो संक्रमण के प्रसार की सबसे अहम कड़ी बने रहते हैं। दिल्ली सरकार के रघुबीर नगर स्थित गुरु गोविंद सिंह अस्पताल में वरिष्ठ चेस्ट विशेषज्ञ डॉ. एस. के. अरोड़ा के अनुसार, यदि इन छूटे हुए मरीजों की समय रहते पहचान कर ली जाए, तो टीबी उन्मूलन का लक्ष्य काफी हद तक हासिल किया जा सकता है। उनका कहना है कि केवल अस्पतालों में आने वाले मरीजों पर निर्भर रहना पर्याप्त नहीं है, बल्कि स्वास्थ्य सेवाओं को समुदाय के स्तर तक ले जाना जरूरी है। भारत में टीबी के खिलाफ लड़ाई को गति देने में सरकार की प्रतिबद्धता महत्वपूर्ण रही है। विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट के अनुसार, देश में टीबी की घटना दर में उल्लेखनीय गिरावट दर्ज की गई है। वर्ष 2015 में प्रति लाख जनसंख्या 237 मामलों के मुकाबले 2024 में यह घटकर 187 रह गई है, जो करीब 21 प्रतिशत की कमी दर्शाती है। यह वैश्विक औसत गिरावट से लगभग दोगुनी है। साथ ही उपचार कवरेज भी 53 प्रतिशत से बढ़कर 92 प्रतिशत से अधिक हो चुका है।


राष्ट्रीय क्षय रोग उन्मूलन कार्यक्रम के तहत जांच और उपचार सुविधाओं का तेजी से विस्तार किया गया है। आधुनिक तकनीकों जैसे डिजिटल एक्स-रे और (सी बी एन ए ए टी)  ने टीबी की पहचान को तेज और अधिक सटीक बनाया है। निःशुल्क उपचार और बेहतर निगरानी व्यवस्था ने भी इस दिशा में सकारात्मक प्रभाव डाला है। फिर भी सामाजिक कलंक, जागरूकता की कमी और स्वास्थ्य सेवाओं तक सीमित पहुंच के कारण कई मरीज देर से सामने आते हैं। इसी चुनौती से निपटने के लिए 100-दिवसीय सक्रिय टीबी जांच अभियान को एक प्रभावी रणनीति के रूप में अपनाया गया है। इस अभियान के तहत स्वास्थ्यकर्मी घर-घर जाकर स्क्रीनिंग कर रहे हैं, मोबाइल एक्स-रे यूनिट्स का उपयोग किया जा रहा है और उच्च जोखिम वाले समूहों पर विशेष ध्यान दिया जा रहा है। इससे मरीजों की समय पर पहचान में सुधार हुआ है। विशेषज्ञों के अनुसार मधुमेह, एचआईवी/एड्स से पीड़ित लोग, बुजुर्ग और घनी आबादी वाले क्षेत्रों में रहने वाले लोग टीबी के प्रति अधिक संवेदनशील होते हैं। इन समूहों में सक्रिय जांच से न केवल मरीजों की जल्दी पहचान संभव होती है, बल्कि संक्रमण के फैलाव को भी प्रभावी ढंग से रोका जा सकता है। डॉ. अरोड़ा का मानना है कि ऐसे अभियानों को केवल सीमित समय तक चलाने के बजाय स्वास्थ्य प्रणाली का स्थायी हिस्सा बनाया जाना चाहिए। जब तक सक्रिय जांच को नियमित स्वास्थ्य सेवाओं में शामिल नहीं किया जाएगा, तब तक दीर्घकालिक सफलता प्राप्त करना कठिन होगा। भारत ने वर्ष 2025 तक टीबी उन्मूलन का महत्वाकांक्षी लक्ष्य निर्धारित किया है। इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए केवल उपचार ही नहीं, बल्कि समय पर पहचान पर भी समान रूप से ध्यान देना आवश्यक है। विश्व टीबी दिवस के अवसर पर यह स्पष्ट संदेश है कि यदि टीबी को समाप्त करना है, तो छूटे हुए मरीजों की पहचान कर उन्हें समय पर उपचार देना ही इस लड़ाई की सबसे महत्वपूर्ण कुंजी है।

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