वर्तमान दौर में दुनिया के चौधरी बने देशों को यह समझ लेना चाहिए कि अब वह जमाना गया जब हफ्ते दो हफ्ते में युद्ध का फैसला हो जाया करता था। आज छोटा से छोटा देश भी युद्ध को लंबा खींचने की कुब्बत रखता है। इसे हम रुस यूक्रेन युद्ध से अच्छी तरह से समझ सकते हैं। अमेरिका ने भी जब ईरान पर आक्रमण किया तो ट्रंप का कायास यही था कि दो चार दिन में ईरान के घुटने टिकवा देंगे पर ट्रंप और नेतन्याहू के सारे कयास धरे के धरे रह गए और इनके चक्कर में दुनिया अस्थिरता और वैश्विक संकट में और आ गई। आज हालात यह हो गए हैं कि युद्ध तो आप शुरु कर सकते हो पर युद्ध शुरु होने के बाद कब बंद होगा यह आपके हाथ में नहीं रहेगा। युद्ध के चलते अब हालात ऐसे हो गए है कि चाह कर भी पर्यटक घूमने का रुख नहीं कर पा रहे हैं। केवल और केवल ट्रंप के दादागिरी पूर्ण रवैये के चलते दुनिया की देशों की जीडीपी में करीब 10 प्रतिशत की हिस्सेदारी निभाने वाला पर्यटन उद्योग बुरी तरह से प्रभावित हो गया है। होटल और ट्रेवल उद्योग से जुड़ी एजेंसियांं के सामने बड़ा संकट आ गया है तो दुनिया के देशों और संस्कृतियों से जुड़ने और समझ कर एक दूसरे के नजदीक आने की जो पहल पर्यटन उद्योग के चलते हुई थी उस पर लगभग विराम के से हालात होते जा रहे हैं। 10 लाख करोड़ अमेरिकी डॉलर से भी अधिक का पर्यटन उद्योग आज संकट के दौर में आ गया है। उदाहरण के तौर पर देखा जाए तो थाईलैंड की अर्थव्यवस्था में 20 प्रतिशत हिस्सेदारी पर्यटन उद्योग की है और वह लगातार दूसरे साल गंभीर संकट के दौर में आ गई है। जैसे तैसे पर्यटकों को आकर्षित करने के लिए हजार डॉलर प्रतिदिन के लग्जरी कमरों की कीमत घटकर 300 डॉलर तक कर देने के बाद भी पर्यटक रुख नहीं कर रहे हैं। हालात विकट से विकटतर होते जा रहे हैं।
दरअसल वैश्विक हालातों के चलते एक और उड़ाने रद्द होती जा रही है तो युद्ध के चलते लोगों में असुरक्षा की भावना होती जा रही है। पता नहीं कब कहां क्या हो जाए और कहीं जाएं वहीं पर बंद होकर के रह जाएं। इस तरह की आशंकाओं से भी दो चार हो रहे हैं। मध्यपूर्व के देशों में तो लगभग यही हालात है। कब किस देश और किस स्थान पर मिसाइल अटैक हो जाएं कहा नहीं जा सकता। क्योंकि अमेरिका-इजरायल व ईरान युद्ध की खास नकारात्मक बात यह है कि इन दो देशों पर मिसाइल अटैक नहीं हो रहे बल्कि इनसे थोड़ी सी भी सहानुभूति रखने वाले देष कब निशाने पर आ जाएं कहा नहीं जा सकता। मध्यपूर्व में मिसाइल अटैक और हार्मुज जलडमरुमध्य के हालात इसके उदाहरण है। हालात तो यहां तक खराब होने की संभावना से इंकार नहीं करते कि मध्यपूर्व के देषों में तो पानी का गंभीर संकट तो हो सकता है। आज कच्चा तेल, एलपीजी की ही समस्या नहीं अपितु दुनिया को जोड़ने वाले इंटरनेट के बाधित होने की संभावनाओं से नकारा नहीं जा सकता। लगता है एक दूसरे के अहम् के चलते आमआदमी कहीं हाशिये में चला गया है। युद्ध के सामान्य नियम भी ताक में रख दिए गए हैं और आमनागरिकों, बच्चों, अस्पतालों, घनी आबादी इलाकों में भी मिसाइल दागने से कोई परहेज नहीं रह गया है।
कोरोना के दौरान जिस तरह से पर्यटन उद्योग प्रभावित हुआ था आज उसी तरह के हालात बनते दिख रहे हैं। कोरोना के बाद पिछले सालों में पर्यटन उद्योग ने तेजी पकड़ी थी और लगने लगा था कि 2030 तक पर्यटन उद्योग को जबरदस्त बूस्ट मिलेगा पर अब हालात तेजी से बिगड़ रहे हैं और लगता नहीं है कि आने वाले दिनों में कोई सुधार दिखाई देगा। हांलाकि एक सकारात्मक पक्ष यह देखा जा सकता है कि भारत सहित विश्व के देशों में देशी पर्यटन को अवष्य बढावा मिलने लगा है। लोग अपने ही देश में आसपास के स्थानों को एक्सप्लोर करने लगे हैं। खैर वर्तमान हालात पर्यटन उद्योग के लिए बेहद चुनौती भरे हो गए हैं और सामान्य हालात होने के अभी तो दूर दूर तक आसार ही नहीं दिख रहे हैं।
डॉ. राजेन्द्र प्रसाद शर्मा

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