तमाम बड़बोले दावों के बावजूद बिहार में उद्योग-धंधे चौपट हैं और रोजगार का कोई ठोस उपाय नहीं है. 65 प्रतिशत आरक्षण के सवाल पर सरकार का विश्वासघात उजागर हो चुका है और यूजीसी गाइडलाइन पर भी भाजपा-जदयू बेनकाब हो चुकी हैं. कैंपसों में जातीय उत्पीड़न पर रोक लगाने हेतु सशक्त गाइडलाइन बनाने के सवाल पर छात्र-युवा आंदोलित हैं, लेकिन सरकार इस पूरे मसले को कमजोर करने में ही लगी हुई है. दलितों, वंचितों, अल्पसंख्यकों और महिलाओं पर हमले लगातार बढ़ रहे हैं. मॉब लिंचिंग, बलात्कार, दलित उत्पीड़न, डायन बताकर प्रताड़ना जैसी घटनाएं बदस्तूर जारी हैं और शासन-प्रशासन हमलावरों के खिलाफ सख्त कार्रवाई के बजाय उन्हें संरक्षण देता नजर आता है. नीट छात्रा बलात्कार हत्याकांड ने तो सरकार की पोल ही खोल दी. महिला सशक्तीकरण के दावे के बीच सत्ता के संरक्षण में किस प्रकार ऐसे संगठित अपराध को बढ़ावा दिया जा रहा है, उसका सबूत है नीट छात्रा बलात्कार-हत्याकांड. लेकिन बुलडोजर हमले के खिलाफ पूरे बिहार में आंदोलन का शंखनाद भी हो चुका है. भाजपा यदि यह सोचती है कि सत्ता हड़प कर वह यहां कुछ भी कर सकती है तो मुगालते में है. यह बिहार है जिसने हमेशा तानाशाहों को चुनौती दी है. बिहार हमेशा से संविधान, लोकतंत्र, सामाजिक न्याय और नागरिक अधिकारों को बचाने की लड़ाई में अग्रिम मोर्चे पर खड़ा रहा है. आज एक बार फिर हमें अपनी वही ऐतिहासिक भूमिका निभानी है. भाकपा-माले का यह राज्य सम्मेलन इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है. आइए, हम सब मिलकर इस सम्मेलन को ऐतिहासिक बनाएं, इसे सफल करने में हर तरह से सहयोग करें और बिहार में बुलडोजर राज, जनादेश के अपमान और कॉरपोरेटपरस्त नीतियों के खिलाफ एक मजबूत जनआंदोलन खड़ा करें! एकजुटता ही ताकत है, संघर्ष ही रास्ता है, और अपने अधिकार हम लड़कर हासिल करेंगेे!
दरभंगा (रजनीश के झा)। आज देश और दुनिया एक गहरे संकट के दौर से गुजर रही है. अमेरिका और इजरायल द्वारा ईरान पर थोपा गया आपराधिक युद्ध पूरी दुनिया को अस्थिरता, आर्थिक तबाही और विश्व शांति के गंभीर खतरे की ओर धकेल रहा है. हम इस युद्ध की कड़ी निंदा करते हैं. हम शांति, संप्रभुता और जनता के अधिकारों के पक्ष में मजबूती से खड़े हैं. लेकिन, देश के भीतर हालात और भी चिंताजनक हैं. मोदी सरकार ने अमेरिका के सामने घुटने टेककर स्वतंत्र विदेश नीति की विरासत को कमजोर किया है और देश को ऊर्जा संकट तथा आर्थिक अस्थिरता की ओर धकेल दिया है. किसानों, मजदूरों और आम जनता के हितों को कुचलते हुए कॉरपोरेट घरानों के पक्ष में नीतियां बनाई जा रही हैं. चार लेबर कोड के जरिए मजदूरों के दशकों के संघर्ष से हासिल अधिकारों पर हमला किया गया है. यूनियन बनाने, हड़ताल करने और न्यायपूर्ण वेतन की मांग करने के अधिकारों को सीमित किया जा रहा है और काम के घंटे मालिकों की मनमर्जी पर छोड़ दिए गए हैं. किसानों की जमीन जबरन छीनी जा रही है और विकास के नाम पर उन्हें उजाड़ा जा रहा है. बिहार में भाजपा-जदयू ने दागदार एसआईआर, महिलाओं के खाते में 10 हजार और नीतीश कुमार को सामने रखकर चुनाव तो हड़प लिया, लेकिन इस बार भाजपा ने गृह व भूमि सुधार जैसे महत्वपूर्ण विभाग नीतीश कुमार से छीन लिए और महज तीन महीने के भीतर उन्हें मुख्यमंत्री की कुर्सी से हटाने के अपने साज़िश भरे खेल के जरिए बिहार में पूरी तरह बुलडोजर राज स्थापित करने की दिशा में कदम बढ़ा दिया है. यह लोकतंत्र और जनता के फैसले का सीधा अपमान है. बुलडोजर के सुनियोजित हमले तो सत्ता में आते ही दिखने लगे थे, जहां गरीबों, दलितों और वंचितों के घरों को निशाना बनाकर उन्हें उजाड़ा जा रहा है. नालंदा, बेगूसराय, समस्तीपुर, दरभंगा, गया सहित पूरे राज्य में हजारों घर तोड़े गए हैं और लाखों परिवारों को बेघर करने की तैयारी चल रही है. चुनाव के पहले 10 हजार और चुनाव के बाद बुलडोजर-हिंसा-बलात्कार - आज के बिहार की यही सच्चाई है. भूमि अधिग्रहण के नाम पर किसानों की जमीन छीन लेने की प्रवृति में काफी तेजी आई है. भारतमाला प्रोजेक्ट, राम-जानकी पथ और अन्य योजनाओं के नाम पर औने-पौने दाम पर उपजाऊ जमीन छीनी जा रही है. भागलपुर में सत्ता द्वारा अदानी समूह को कौड़ी के मोल सैकड़ों एकड़ जमीन सौंपे जाने की घटनाएं साफ दिखाती हैं कि सरकार किसके हित में काम कर रही है और किसे बेदखल कर रही है. इससे उस इलाके में बेदखली तो है ही, लाखों पेड़ों को काट देने की भी योजना है.

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