- दुनिया की ऊर्जा राजनीति कभी-कभी नक्शे पर एक पतली सी रेखा पर टिक जाती है।
अगर होर्मुज़ में बड़ा अवरोध पैदा होता है, तो प्रभाव सिर्फ क्षेत्रीय नहीं रहेगा। वैश्विक बाजार में तेल की कीमतें तेज़ी से बढ़ सकती हैं। विश्लेषण के मुताबिक, कीमतें 130 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच सकती हैं, जो 2007-08 के ऐतिहासिक उच्च स्तर के बराबर है। इराक के उप प्रधानमंत्री ने तो इसे 200 से 300 डॉलर प्रति बैरल तक जाने की आशंका जताई है। 25 फरवरी 2026 तक ब्रेंट क्रूड पहले ही 71.40 डॉलर प्रति बैरल पर पहुंच चुका था, जो 2025 के अंत की तुलना में लगभग 19 प्रतिशत अधिक है। गैस बाजार पर भी असर गहरा हो सकता है। ऑक्सफोर्ड इंस्टीट्यूट फॉर एनर्जी स्टडीज़ के अनुसार, यदि यह जलमार्ग एक वर्ष के लिए बंद होता है, तो वैश्विक एलएनजी आपूर्ति में 15 प्रतिशत की गिरावट आ सकती है। जापान में एलएनजी की कीमतें 170 प्रतिशत तक बढ़ सकती हैं।
साल 2022 के ऊर्जा संकट के दौरान जापान में घरेलू बिजली बिल औसतन 25.8 प्रतिशत बढ़ गए थे, और सरकार को उपभोक्ताओं को राहत देने के लिए बड़े पैमाने पर वित्तीय पैकेज की घोषणा करनी पड़ी थी। यह परिदृश्य केवल ऊर्जा आपूर्ति का सवाल नहीं है। यह जलवायु और आर्थिक रणनीति का भी प्रश्न है। जीवाश्म ईंधन आधारित आयात पर अत्यधिक निर्भरता देशों को भू-राजनीतिक झटकों के प्रति असुरक्षित बनाती है। यही कारण है कि ब्रीफिंग में यह तर्क सामने आता है कि नवीकरणीय ऊर्जा और विद्युतीकरण ऊर्जा सुरक्षा का दीर्घकालिक समाधान हो सकते हैं।
यूरोप इसका एक उदाहरण है। 2022 में रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद यूरोपीय देशों ने गैस आयात में उल्लेखनीय कमी की। 2021 के 361.5 बिलियन क्यूबिक मीटर से 2025 में यह घटकर 313.5 बिलियन क्यूबिक मीटर रह गया। फ्रांस और जर्मनी ने भी गैस खपत में दो अंकों की गिरावट दर्ज की। यह परिवर्तन ऊर्जा दक्षता और नवीकरणीय ऊर्जा के विस्तार के जरिए संभव हुआ। जापान आज एक चौराहे पर खड़ा है। 2011 की फुकुशिमा दुर्घटना के बाद उसने परमाणु ऊर्जा पर निर्भरता घटाई और जीवाश्म ईंधनों का हिस्सा बढ़ाया। 2024 तक उसके ग्रिड में जीवाश्म ईंधनों की हिस्सेदारी 68.8 प्रतिशत हो गई। हालांकि 2025 की सातवीं सामरिक ऊर्जा योजना 2040 तक रिन्यूएबल ऊर्जा का हिस्सा 50 प्रतिशत तक ले जाने की बात करती है, फिर भी 30 से 40 प्रतिशत बिजली उत्पादन आयातित जीवाश्म ईंधनों पर निर्भर रहने की संभावना है।
आंकड़े बताते हैं कि जापान में यूटिलिटी-स्केल सोलर की लागत 2014 से 2023 के बीच 80 प्रतिशत से अधिक गिरकर 9.9 येन प्रति किलोवाट घंटा हो गई, जो एलएनजी आधारित बिजली उत्पादन से काफी सस्ती है। 2050 तक 140 गीगावॉट पवन क्षमता स्थापित करने से लगभग 3.55 लाख रोजगार सृजित हो सकते हैं। यह कहानी केवल समुद्री जलमार्ग की नहीं है। यह उस व्यापक सवाल की कहानी है कि ऊर्जा सुरक्षा और जलवायु कार्रवाई को अलग-अलग नहीं देखा जा सकता। होर्मुज़ की संकरी धारा हमें याद दिलाती है कि जीवाश्म ईंधनों पर निर्भर दुनिया कितनी नाजुक है। और यह भी कि स्वच्छ ऊर्जा में निवेश सिर्फ उत्सर्जन घटाने की रणनीति नहीं, बल्कि आर्थिक स्थिरता और राष्ट्रीय सुरक्षा की ढाल भी है।

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