कविता : घर के मसले - Live Aaryaavart (लाईव आर्यावर्त)

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रविवार, 26 अप्रैल 2026

कविता : घर के मसले

Anxhal-ganv-ki-awaz
मैं उनसे बहुत घबराती हूँ,

उनकी आहट से भी डर जाती हूँ,

मेरे घर में जो कमरा है मेरा,

मैं वहां अकेले रो जाती हूँ,

वो लोग मुझे समझ नहीं पाते,

ना ही मैं उन्हें समझा पाती हूँ,

मेरे मसले मेरे ही अंदर दब जाते हैं,

मैं उनको बाहर नहीं निकाल पाती हूँ,

उनकी बातें मुझे बहुत डराती हैं,

मैं अंदर ही अंदर सहम जाती हूँ,

मुझे उजाले से कहीं ज्यादा,

अब अंधेरा ही अच्छा लगता है,

क्योंकि मैं अपनी सारी तकलीफें,

किसी को भी नहीं बता पाती हूँ,

घर के मसले से अब बहुत घबराती हूँ।।





आंचल

डूंगरी, कपकोट

टीम गांव की आवाज 

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