कविता : मेरा बचपन मेरा गांव - Live Aaryaavart (लाईव आर्यावर्त)

Breaking

प्रबिसि नगर कीजै सब काजा । हृदय राखि कौशलपुर राजा।। -- मंगल भवन अमंगल हारी। द्रवहु सुदसरथ अजिर बिहारी ।। -- सब नर करहिं परस्पर प्रीति । चलहिं स्वधर्म निरत श्रुतिनीति ।। -- तेहि अवसर सुनि शिव धनु भंगा । आयउ भृगुकुल कमल पतंगा।। -- राजिव नयन धरैधनु सायक । भगत विपत्ति भंजनु सुखदायक।। -- अनुचित बहुत कहेउं अग्याता । छमहु क्षमा मंदिर दोउ भ्राता।। -- हरि अनन्त हरि कथा अनन्ता। कहहि सुनहि बहुविधि सब संता। -- साधक नाम जपहिं लय लाएं। होहिं सिद्ध अनिमादिक पाएं।। -- अतिथि पूज्य प्रियतम पुरारि के । कामद धन दारिद्र दवारिके।।

शनिवार, 25 अप्रैल 2026

कविता : मेरा बचपन मेरा गांव

Kiran-bisht-ganv-ki-awaz
मेरा गाँव, बचपन की वह मीठी यादें हैं,

जहाँ मेरा हँसता-खेलता बचपन बीता,

वहीं मेरी सारी यादें गुज़रीं हैं,

वहीं मैं पली-बढ़ी, सपनों को जिया,

जहाँ मेरा पूरा परिवार रहता था,

दादा-दादी और भाई-बहनों का साथ था,

उनके संग ही खेलती और कूदती थी मैं,

हर दिन जैसे मेरे लिए कोई त्यौहार था,

पता ही नहीं चला कब गुज़र गया बचपन,

कब बीत गया वह सुनहरा समय,

जाने कब आ गईं मुझ पर जिम्मेदारियाँ,

कब आ बैठी मेरे कंधों पर अचानक,

जब उस छोटे से बचपन में थी मैं,

सिर्फ़ खेलना-कूदना ही काम था,

न कोई चिंता थी, न कोई बोझ था,

हर दिन बस खुशियों का नाम था,

अब देखो, सारे दिन करती हूँ काम,

जिम्मेदारियों में खुद को ढूँढती हूँ,

फिर से यादों का बचपन मुस्काता है,

मेरा गाँव आज भी मुझे बुलाता है।।




किरण बिष्ट

सुराग, उत्तराखंड

टीम गांव की आवाज 

कोई टिप्पणी नहीं: