- जात-पात से हटकर गुरु अंगद जी ने ही लंगर की प्रथा चलाई : ज्ञानी गगनप्रीत सिंह

सीहोर। गुरु अंगददेव जी ने गुरुमुखी यानी पंजाबी लिपि का आविष्कार किया। साथ ही गुरु नानकदेव की वाणी को लेखों के रूप में संजोए रखा। जात-पात से हटकर गुरु अंगद जी ने ही लंगर की प्रथा चलाई। उक्त विचार शहर के गंगा आश्रम स्थित गुरुद्वारे में शनिवार को गुरु अंगद देव की जयंती के पावन अवसर पर ज्ञानी गगनप्रीत सिंह ने कहे। इस मौके पर श्री लक्ष्मी नृसिंह मंदिर की ओर से संत श्री माधव दास महाराज, यज्ञाचार्य पंडित कुणाल व्यास, सवारी प्रभारी सन्नी सरदार आदि ने ज्ञानी जी का सम्मान और स्वागत किया। इस मौके पर जिला संस्कार मंच मनोज दीक्षित मामा ने बताया कि इतिहास में पहली बार सिख समाज और संपूर्ण हिन्दु समाज के द्वारा आगामी 25 अपै्रल को भव्य श्रीलक्ष्मी नारायण सवारी महाकुंभ कलश यात्रा का आयोजन शहर के जगदीश मंदिर पर शाम चार बजे से किया जाएगा। इस शाही सवारी के दौरान नागा साधुओं के अलावा निहंग सरदार आदि सनातन को मजबूत करने के लिए संपूर्ण जाति के श्रद्धालु शामिल रहेंगे। शनिवार को गुरुद्वारे में लंगर में आए सभी सिख समाज और अन्य को शाही सवारी में शामिल होने का आह्वान किया। इसके अलावा 26 अपै्रल को प्राचीन सिद्धपीठ श्री नृसिंह लक्ष्मी मंदिर के तत्वाधान में भव्य पंच कुण्डात्मक श्री लक्ष्मीनारायण महायज्ञ का आयोजन किया जा रहा है। वहीं 30 अपै्रल को भव्य भंडारे का आयोजन किया जाएगा। इसके मुख्य यजमान श्रीमती नमिता अखिलेश राय है।
सिख पंथ को एक नई संगठनात्मक शक्ति प्रदान की
ज्ञानी गगनप्रीत सिंह ने कहाकि सिखों के दूसरे गुरु, गुरु अंगद देव जी का पूर्व नाम था। गुरु अंगद देव ने केवल गुरु नानक देव जी की शिक्षाओं को आगे बढ़ाया, बल्कि सिख पंथ को एक नई संगठनात्मक शक्ति प्रदान की। गुरु नानक देव ने अपने दोनों पुत्रों को छोड़कर अंगद देव को अपना उत्तराधिकारी नियुक्त किया था। गुरु अंगद देव ने गुरु नानक देव की उन सात परीक्षाओं का सामना किया। गुरु नानक देव ने उन्हे अपने गले से लगाकर कहा कि अब तेरे और मेरे में कोई अन्तर नहीं रहा। आज से तुम अंग हुए मेरे अंगद। तभी से उनका नाम अंगद देव हो गया जो सिख पंथ के दूसरे गुरु कहलाए।
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