दिल्ली : पीयूष रंग महोत्सव के पहले दिन “दरख़्त-ए-आज़ादे-हिंद” नाटक का मंचन - Live Aaryaavart (लाईव आर्यावर्त)

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शुक्रवार, 17 अप्रैल 2026

दिल्ली : पीयूष रंग महोत्सव के पहले दिन “दरख़्त-ए-आज़ादे-हिंद” नाटक का मंचन

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नई दिल्ली। मंडी हाउस के श्री राम सेंटर में स्वर्गीय पद्मभूषण एवं प्रख्यात विज्ञापन विशेषज्ञ पीयूष पांडे जी की 71वीं जयंती के अवसर पर उनकी बहन सुश्री रमा पांडे द्वारा उनके सम्मान में “पीयूष रंग महोत्सव” नामक दो दिवसीय नाट्य उत्सव आज दरख़्त-ए-आज़ादे-हिंद नाटक के साथ हुआ है. यह महोत्सव रतनव (रामा थिएटर नाट्य विद्या) द्वारा आयोजित किया जा रहा है. दरख़्त-ए-आज़ादे हिन्द य आधुनिक समय की एक कहानी है, जो उत्तर प्रदेश के एक गाँव में बसे एक परिवार के इर्द-गिर्द घूमती है, जिसकी ज़िंदगी एक 200 साल पुराने नीम के पेड़ के आसपास बसती है।यह पेड़ भारत की आज़ादी की लड़ाइयों और संघर्षों का साक्षी रहा है। चौधरी परिवार के लिए यह सिर्फ एक पेड़ नहीं, बल्कि एक पूर्वज की तरह था—जो उनकी रक्षा करता था और उन्हें आशीर्वाद देता था।दो सदियों से अधिक समय तक अडिग खड़े रहने के बाद, अब विकास के नाम पर इसे काटे जाने का समय आ गया।लेकिन इस बार, परिवार की मुखिया—चौधराइन—इस पुश्तैनी पेड़ की रक्षा के लिए खड़ी होती है।वह अपनी जान तक दाँव पर लगाने को तैयार है, इस “नीम महाराज” को बचाने के लिए।वह अकेली है, लेकिन अडिग और शक्तिशाली—मानो वह उन सभी स्वतंत्रता सेनानियों की शक्ति को अपने भीतर समेटे हुए हो, जिन्होंने इस धरती की रक्षा के लिए अपने प्राण न्यौछावर किए थे।


इस अवसर पर दो विशिष्ट सम्मानों से भी विभूतियों को अलंकृत किया गया । पहला सम्मान इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र (IGNCA) के सदस्य सचिव श्री सचिदानंद जोशी को भारतीय संस्कृति के संरक्षण में उनके उल्लेखनीय योगदान के लिए ‘संस्कृतश्री फॉर प्रेज़र्विंग कल्चर ऑफ इंडिया’ पुरस्कार के रूप में प्रदान किया गया। वहीं, दूसरा ‘साहित्यश्री’ सम्मान 99 वर्षीय पद्मश्री श्रीमती शीला झुनझुनवाला को उनके साहित्यिक अवदान के लिए अर्पित किया गया। रमा पांडे ने इस मौके पर कहा, “पीयूष पांडे एक ‘वन-लाइनर मास्टर’ थे। वे एक पंक्ति लिखते थे, और उसमें पूरी ज़िंदगी उतर आती थी। उनका हर विज्ञापन अपने आप में एक संपूर्ण कविता, एक पूरा उपन्यास, एक सशक्त नाटक और एक जीवंत कहानी होता था। उनके जाने के बाद, सिर्फ एक बहन के नाते ही नहीं, बल्कि एक निर्देशक और लेखिका के रूप में भी मुझे यही लगा कि उनकी जयंती के महीने में उन्हें सबसे उपयुक्त श्रद्धांजलि ‘नाट्यांजलि’ ही हो सकती है। इसी विचार से प्रेरित होकर हमने उनके वन-लाइनर्स से कहानियाँ रचीं। हमारा नाटक ‘दरख़्त ए आज़ाद हिंद’ मेरे कहानी-संग्रह ‘सप्तपर्णी’ का प हिस्सा है, जो पिछले वर्ष विश्व पुस्तक मेले में विमोचित हुआ था। ‘सप्तपर्णी’ एक ऐसा वृक्ष है, जो शुभ माना जाता है और अशुभ भी । यह पुस्तक मैंने पिछले वर्ष 13 अप्रैल पीयूष को सालगिरह  के अवसर पर भेंट की थी और यह उसी को  समर्पित है। आज उसी पुस्तक पर आधारित यह नाटक पहले ‘पीयूष रंग महोत्सव’ में मंचित किया जा रहा है। इसके अलावा, ‘ठाकुर ज़ालिम सिंह’ भी मेरे एक पुस्तक संग्रह की एक कहानी से लिया गया नाटक है।इस रंग महोत्सव के अंतर्गत हमने दो सम्मानों की शुरुआत भी की है— पहला ‘संस्कृतश्री’ फॉर प्रिज़र्विंग कल्चर ऑफ इंडिया’ और दूसरा ‘साहित्यश्री’ सम्मान। ‘पीयूष रंग महोत्सव’ अब हर वर्ष इसी महीने में आयोजित किया जाएगा और ये सम्मान भी प्रतिवर्ष प्रदान किए जाएंगे।”


संस्कृतश्री पुरस्कार प्राप्त करने पर श्री सच्चिदानंद जोशी ने कहा कि यह सम्मान उनके लिए गर्व का विषय है। उन्होंने विनम्रता से कहा कि एक साधारण कार्यकर्ता के रूप में जो भी उनके हिस्से में आया, उन्होंने वही करने का प्रयास किया। यह पुरस्कार केवल उनका नहीं, बल्कि उन करोड़ों लोगों का भी है जो संस्कृति के क्षेत्र में समर्पण के साथ कार्य कर रहे हैं। पीयूष पांडे के बारे में बोलते हुए उन्होंने कहा कि वे एक महान व्यक्तित्व थे। उनके एक मिनट से भी कम समय के विज्ञापन कई बार 2–3 घंटे की फिल्मों से अधिक प्रभाव छोड़ जाते थे। आज विज्ञापन जगत में संवाद की जो प्रभावशाली शैली देखने को मिलती है, उसका बड़ा श्रेय पीयूष पांडे को ही जाता है। इस महोत्सव में पाँच प्रमुख कॉलेजों के छात्र-छात्राओं की भागीदारी सुनिश्चित की गई है, जिनमें सेंट स्टीफंस कॉलेज (उनका अपना शिक्षण संस्थान) भी शामिल है।महोत्सव में एक विशेष “फोटो कॉर्नर” भी बनाया जाएगा, जो पीयूष पांडे की विशिष्ट पहचान—उनकी ट्रेडमार्क मूंछों—को समर्पित होगा। साथ ही, छात्रों के लिए “कुछ मीठा हो जाए” की भावना के तहत कैडबरी डेयरी मिल्क चॉकलेट का वितरण भी किया गया।


कल का नाटक : ठाकुर ज़ालिम सिंह

यह नाटक सत्ता, लोभ और आत्मबोध की कहानी है, जो हमें अपने असली स्वरूप की ओर लौटने का संदेश देता है। कथा एक निर्दयी शासक ठाकुर ज़ालिम सिंह के जीवन के इर्द-गिर्द घूमती है, जो अपने कर्मों के परिणामों से जूझता है। क्या उसे प्रायश्चित का अवसर मिलेगा या वह विनाश की ओर अग्रसर रहेगा—यही इस नाटक का केंद्रीय प्रश्न है।

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