विशेष : राम सकल पटेल पर दांव, पूर्वांचल के पिछड़ा समीकरण साधने की तैयारी - Live Aaryaavart (लाईव आर्यावर्त)

Breaking

प्रबिसि नगर कीजै सब काजा । हृदय राखि कौशलपुर राजा।। -- मंगल भवन अमंगल हारी। द्रवहु सुदसरथ अजिर बिहारी ।। -- सब नर करहिं परस्पर प्रीति । चलहिं स्वधर्म निरत श्रुतिनीति ।। -- तेहि अवसर सुनि शिव धनु भंगा । आयउ भृगुकुल कमल पतंगा।। -- राजिव नयन धरैधनु सायक । भगत विपत्ति भंजनु सुखदायक।। -- अनुचित बहुत कहेउं अग्याता । छमहु क्षमा मंदिर दोउ भ्राता।। -- हरि अनन्त हरि कथा अनन्ता। कहहि सुनहि बहुविधि सब संता। -- साधक नाम जपहिं लय लाएं। होहिं सिद्ध अनिमादिक पाएं।। -- अतिथि पूज्य प्रियतम पुरारि के । कामद धन दारिद्र दवारिके।।

गुरुवार, 28 मई 2026

विशेष : राम सकल पटेल पर दांव, पूर्वांचल के पिछड़ा समीकरण साधने की तैयारी

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी में भाजपा का यह बड़ा सामाजिक संतुलन है. हंसराज विश्वकर्मा से राम सकल पटेल तक संगठन और सत्ता का नया समीकरण है. वाराणसी भाजपा में बदलाव के पीछे 2027 की रणनीति, जातीय गणित और सत्ता-संगठन का संतुलन माना जा रहा है... ऐसे में बड़ा सवाल तो यही है क्या भाजपा बैकडोर तरीके से अनुप्रिया पटेल के बढ़ते प्रभाव को संतुलित करने की कोशिश कर रही है? क्योंकि यदि संगठन, सत्ता और क्षेत्रीय नेतृत्व, तीनों स्तर पर भाजपा अपने स्वयं के पटेल चेहरों को मजबूत करती है, तो भविष्य में उसे सहयोगी दलों पर निर्भरता कम करनी पड़ सकती है। हालांकि भाजपा का आधिकारिक रुख सामाजिक संतुलन और संगठन विस्तार का ही है, लेकिन पूर्वांचल की राजनीति को करीब से देखने वाले जानकार इसे “सॉफ्ट काउंटर बैलेंसिंग” की रणनीति भी मान रहे हैं। खासकर ऐसे समय में जब 2027 विधानसभा चुनाव को लेकर भाजपा हर जातीय समीकरण को अपने नियंत्रण में रखना चाहती है


Ram-sakal-patel-varanasi
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी में भारतीय जनता पार्टी ने संगठन और सत्ता के बीच नए संतुलन का बड़ा राजनीतिक संदेश दिया है। लंबे समय तक जिलाध्यक्ष रहे विधान परिषद सदस्य हंसराज विश्वकर्मा को मंत्रिमंडल विस्तार में मंत्री बनाकर पार्टी ने जहां विश्वकर्मा समाज को साधने का प्रयास किया, वहीं उनकी जगह राम सकल पटेल को जिलाध्यक्ष बनाकर भाजपा ने पूर्वांचल की राजनीति में पिछड़े वर्गों के व्यापक सामाजिक समीकरण को साधने की रणनीति स्पष्ट कर दी है। यह बदलाव केवल संगठनात्मक फेरबदल नहीं माना जा रहा, बल्कि इसे आगामी 2027 विधानसभा चुनाव की तैयारी और पूर्वांचल में जातीय आधार पर मजबूत पकड़ बनाने की व्यापक राजनीतिक कवायद के रूप में देखा जा रहा है। वाराणसी जैसे हाई प्रोफाइल जिले में संगठन का हर निर्णय सीधे राजनीतिक संदेश देता है और इस बार भाजपा ने दो बड़े सामाजिक वर्गों, विश्वकर्मा और पटेल, दोनों को साधने की कोशिश की है।


Ram-sakal-patel-varanasi
हंसराज विश्वकर्मा लंबे समय से भाजपा संगठन में सक्रिय और प्रभावशाली चेहरा रहे हैं। संगठनात्मक पकड़, कार्यकर्ताओं के बीच संवाद और पिछड़े वर्ग विशेषकर विश्वकर्मा समाज में उनकी मजबूत पैठ को देखते हुए पार्टी ने उन्हें पहले एमएलसी बनाया और अब मंत्रिमंडल विस्तार में मंत्री पद देकर बड़ा राजनीतिक संदेश दिया है। पूर्वांचल की राजनीति में विश्वकर्मा समाज तेजी से राजनीतिक रूप से संगठित हुआ है। भाजपा यह अच्छी तरह समझती है कि गैर-यादव पिछड़े वर्गों की एकजुटता ही उसकी सबसे बड़ी ताकत रही है। यही कारण है कि पार्टी लगातार ऐसे चेहरों को आगे बढ़ा रही है जिनकी जातीय और सामाजिक स्वीकार्यता मजबूत हो। मतलब साफ है हंसराज विश्वकर्मा को मंत्री बनाना केवल व्यक्तिगत राजनीतिक उन्नति नहीं, बल्कि पूर्वांचल के कारीगर और श्रमिक वर्ग को सम्मान देने का प्रतीकात्मक प्रयास भी है। भाजपा यह संदेश देना चाहती है कि संगठन में काम करने वालों के लिए सत्ता के दरवाजे खुले हैं।


राम सकल पटेल की नियुक्ति से पटेल वोट बैंक पर नजर

हंसराज विश्वकर्मा के मंत्री बनने के बाद रिक्त हुई जिलाध्यक्ष की जिम्मेदारी राम सकल पटेल को सौंपना भी भाजपा की सोची-समझी रणनीति मानी जा रही है। प्रदेश अध्यक्ष पंकज चैधरी ने जिस तरह यह जिम्मेदारी दी है, उससे साफ है कि भाजपा अब वाराणसी और पूरे पूर्वांचल में पटेल-कुर्मी समाज के बीच अपनी राजनीतिक पकड़ और मजबूत करना चाहती है। पूर्वांचल की कई विधानसभा सीटों पर पटेल समाज निर्णायक भूमिका निभाता है। वाराणसी, जौनपुर, भदोही, मिर्जापुर, चंदौली और प्रयागराज मंडल में यह वर्ग चुनावी परिणामों को प्रभावित करने की स्थिति में रहता है। समाजवादी पार्टी और अन्य क्षेत्रीय दल लगातार गैर-यादव पिछड़ों को अपने पक्ष में करने की कोशिश कर रहे हैं। ऐसे में भाजपा ने संगठन में पटेल चेहरे को आगे कर बड़ा राजनीतिक संतुलन साधने का प्रयास किया है।


भाजपा का नया फार्मूला: संगठन में सामाजिक संतुलन

भाजपा की राजनीति लंबे समय से सामाजिक इंजीनियरिंग पर आधारित रही है। पार्टी अब केवल वैचारिक मुद्दों या प्रधानमंत्री मोदी की लोकप्रियता के भरोसे चुनाव नहीं लड़ना चाहती, बल्कि हर जातीय और सामाजिक वर्ग में संगठनात्मक प्रतिनिधित्व सुनिश्चित कर रही है। वाराणसी में पहले विश्वकर्मा समाज से जिलाध्यक्ष और अब पटेल समाज से नया चेहरा सामने लाकर भाजपा ने यह स्पष्ट कर दिया है कि वह गैर-यादव पिछड़े वर्गों को अपने साथ मजबूती से बनाए रखने के लिए हर स्तर पर रणनीति बना रही है। भाजपा का यह मॉडल आगामी दिनों में अन्य जिलों में भी दिखाई दे सकता है, जहां संगठन और सत्ता दोनों में अलग-अलग सामाजिक वर्गों को प्रतिनिधित्व देकर संतुलन बनाया जाएगा।


विपक्ष के लिए बढ़ी चुनौती

भाजपा के इस कदम ने विपक्ष की चिंता भी बढ़ा दी है। समाजवादी पार्टी पीडीए फार्मूले के जरिए पिछड़ा-दलित-अल्पसंख्यक समीकरण बनाने में जुटी है, जबकि कांग्रेस भी पूर्वांचल में अपनी खोई जमीन तलाश रही है। लेकिन भाजपा ने लगातार गैर-यादव पिछड़े वर्गों में प्रतिनिधित्व बढ़ाकर विपक्ष की रणनीति को चुनौती दी है। वाराणसी में यह बदलाव केवल स्थानीय राजनीति तक सीमित नहीं माना जा रहा, बल्कि इसे पूरे पूर्वांचल के लिए राजनीतिक संदेश के रूप में देखा जा रहा है। भाजपा यह दिखाना चाहती है कि संगठन और सत्ता दोनों में सामाजिक भागीदारी ही उसकी सबसे बड़ी ताकत है।


कार्यकर्ताओं को भी दिया संदेश

इस बदलाव का एक बड़ा संदेश पार्टी कार्यकर्ताओं के लिए भी है। भाजपा नेतृत्व यह दिखाना चाहता है कि संगठन में सक्रिय और जमीन पर काम करने वाले कार्यकर्ताओं को समय आने पर बड़ी जिम्मेदारियां दी जाती हैं। हंसराज विश्वकर्मा का मंत्री बनना और राम सकल पटेल का जिलाध्यक्ष बनना इसी क्रम की कड़ी माना जा रहा है। अब सभी की नजर इस बात पर होगी कि राम सकल पटेल संगठन को बूथ स्तर तक कितनी मजबूती दे पाते हैं और भाजपा 2027 की तैयारी को किस रूप में आगे बढ़ाती है।


अनुप्रिया पटेल के प्रभाव को संतुलित करने की रणनीति भी?

राजनीतिक गलियारों में राम सकल पटेल की नियुक्ति को केवल संगठनात्मक बदलाव नहीं, बल्कि पूर्वांचल की “पटेल राजनीति” के भीतर भाजपा की दीर्घकालिक रणनीति से जोड़कर भी देखा जा रहा है। दिलचस्प तथ्य यह है कि भाजपा ने वाराणसी जिला संगठन की कमान राम सकल पटेल को सौंपी है, जबकि काशी प्रांत अध्यक्ष की जिम्मेदारी पहले से ही दिलीप पटेल के पास है। यानी संगठन के दो महत्वपूर्ण पदों पर पटेल समाज के नेताओं की मौजूदगी अब चर्चा का विषय बन गई है। भाजपा पूर्वांचल में पटेल वोट बैंक को किसी एक सहयोगी दल या चेहरे तक सीमित नहीं रहने देना चाहती। अब तक अपना दल (एस) और उसकी राष्ट्रीय अध्यक्ष अनुप्रिया पटेल पूर्वांचल में पटेल-कुर्मी राजनीति का बड़ा चेहरा मानी जाती रही हैं। लेकिन भाजपा पिछले कुछ वर्षों से लगातार अपने संगठन में भी पटेल समाज के नेताओं को आगे बढ़ा रही है, ताकि यह सामाजिक आधार सीधे भाजपा से जुड़ा रहे। इसी वजह से राजनीतिक चर्चाओं में यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या भाजपा बैकडोर तरीके से अनुप्रिया पटेल के बढ़ते प्रभाव को संतुलित करने की कोशिश कर रही है? क्योंकि यदि संगठन, सत्ता और क्षेत्रीय नेतृत्व, तीनों स्तर पर भाजपा अपने स्वयं के पटेल चेहरों को मजबूत करती है, तो भविष्य में उसे सहयोगी दलों पर निर्भरता कम करनी पड़ सकती है। हालांकि भाजपा का आधिकारिक रुख सामाजिक संतुलन और संगठन विस्तार का ही है, लेकिन पूर्वांचल की राजनीति को करीब से देखने वाले जानकार इसे “सॉफ्ट काउंटर बैलेंसिंग” की रणनीति भी मान रहे हैं। खासकर ऐसे समय में जब 2027 विधानसभा चुनाव को लेकर भाजपा हर जातीय समीकरण को अपने नियंत्रण में रखना चाहती है। पूर्वांचल की राजनीति में यह संदेश भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है कि भाजपा अब केवल सहयोगी दलों के जरिए नहीं, बल्कि सीधे अपने संगठनात्मक ढांचे के माध्यम से भी गैर-यादव पिछड़े वर्गों में स्थायी आधार तैयार कर रही है।


2027 की बड़ी रणनीति

भाजपा ने भले ही अभी से चुनावी मोड की खुली घोषणा न की हो, लेकिन संगठन में हो रहे बदलाव साफ संकेत दे रहे हैं कि पार्टी ने 2027 विधानसभा चुनाव की तैयारी प्रारंभ कर दी है। पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष पंकज चैधरी ने राम सकल को जिलाध्यक्ष नियुक्त कर पूर्वांचल की राजनीति में नए समीकरणों की चर्चा तेज कर दी है। यह नियुक्ति केवल संगठनात्मक बदलाव भर नहीं मानी जा रही, बल्कि इसके पीछे आगामी विधानसभा चुनाव, पंचायत स्तर पर पकड़ मजबूत करने की रणनीति और पिछड़े वर्ग विशेषकर पटेल-कुर्मी वोट बैंक को साधने की व्यापक तैयारी देखी जा रही है। भाजपा ने यह निर्णय ऐसे समय में लिया है, जब पूर्वांचल में जातीय आधार पर राजनीतिक गोलबंदी लगातार तेज हो रही है। सपा जहां पीडीए (पिछड़ा-दलित-अल्पसंख्यक) फार्मूले के जरिए गैर-यादव पिछड़ों को जोड़ने में जुटी है, वहीं भाजपा ने भी संगठन में सामाजिक संतुलन साधने की कवायद तेज कर दी है। राम सकल पटेल की ताजपोशी इसी रणनीति का हिस्सा मानी जा रही है।


रामसकल की चुनौतियों भी कम नहीं

वाराणसी भाजपा संगठन लंबे समय से अंदरूनी गुटबाजी और कार्यकर्ताओं की नाराजगी की चर्चाओं के कारण सुर्खियों में रहा है। ऐसे में राम सकल पटेल के सामने सबसे बड़ी चुनौती संगठन को बूथ स्तर तक सक्रिय करना और कार्यकर्ताओं के बीच समन्वय स्थापित करना होगी। माना जा रहा है कि पार्टी नेतृत्व ऐसा चेहरा चाहता था जो एक ओर पिछड़े वर्ग में मजबूत संदेश दे सके और दूसरी ओर ग्रामीण क्षेत्रों में संगठन को नई ऊर्जा प्रदान कर सके। राम सकल पटेल लंबे समय से संगठनात्मक गतिविधियों से जुड़े रहे हैं और ग्रामीण इलाकों में उनकी सक्रियता को भाजपा नेतृत्व ने गंभीरता से लिया। पार्टी सूत्रों के अनुसार, उनकी नियुक्ति में स्थानीय फीडबैक और सामाजिक स्वीकार्यता को भी प्रमुख आधार बनाया गया। मतलब साफ है भाजपा अब केवल प्रधानमंत्री मोदी की लोकप्रियता के भरोसे नहीं रहना चाहती, बल्कि जातीय और सामाजिक समीकरणों को भी समानांतर रूप से मजबूत कर रही है। यही कारण है कि संगठन में ऐसे चेहरों को आगे बढ़ाया जा रहा है जिनकी स्थानीय सामाजिक पकड़ मजबूत हो।




Suresh-gandhi


सुरेश गांधी

वरिष्ठ पत्रकार 

वाराणसी

कोई टिप्पणी नहीं: